|
'कश्मीर' के हल के तीन बड़े अवसर | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
हिंदी और प्रकाशन संसार की समस्याएँ गिनाने बैठिए तो कोई सिरा ही समझ में नहीं आता कि कहाँ से शुरु करें. ज़ाहिर है कि समस्याएँ बहुत हैं और हल कम. मसलन एक बड़ी समस्या ये है कि हिंदी में कथा कहानियों और कविताओं से इतर लेखन की कोई ठोस परंपरा ही विकसित नहीं हो पाई. चाहे वो श्रीलंका में तमिल विद्रोह का मसला हो या भारत के पूर्वोत्तर राज्यों की समस्याओं का या फिर कश्मीर की समस्या का, हिंदी में किताबें नहीं के बराबर ही हैं. जो हैं भी, उनमें से ज़्यादातर अनुदित हैं. कुल मिलाकर आसरा अंग्रेज़ी का ही है. ऐसे में असाहित्यिक विषयों पर, मूलरुप से हिंदी में लिखी पुस्तकें हाथ आ जाएँ तो एक सुकून तो मिलता ही है. सुपरिचित पत्रकार और लेखक उर्मिलेश की नई पुस्तक "कश्मीर : विरासत और सियासत" इसी की एक कड़ी है. इस एक पुस्तक में कश्मीर के सामाजिक-राजनीतिक इतिहास से लेकर 'आतंकवाद' और भविष्य के सवाल तक लगभग हर उस विषय की चर्चा है जिसको लेकर किसी पाठक की सामान्य रुचि हो सकती है और जिसको जानने के लिए उसे कई पुस्तकों के पन्ने खंगालने पड़ सकते हैं. इसी पुस्तक का एक अंश, जिसमें लेखक विश्लेषण कर रहे हैं कि कश्मीर समस्या को हल करने के तीन ऐतिहासिक अवसर आए जिसे सफलता में तब्दील नहीं किया जा सका. पहला अवसर ऐतिहासिक संदर्भ में देखें तो सन् 47 के बाद तीन बड़े मौक़े आए जब कश्मीर की समस्या के समाधान की संभावनाएं प्रबल थीं. पर किसी न किसी घटना/दुर्घटना या ऐतिहासिक चूक के कारण इन मौकों का फायदा नहीं उठाया जा सका और समस्या सुलझाने की बजाए उलझती गई. पहला बड़ा मौका था सन् 1953 में. भारत और पाकिस्तान के बीच कई स्तरों की बातचीत के सार्थक दौर चले. दोनों देशों के प्रधानमंत्रियों की लंदन और फिर दिल्ली में शिखर वार्ता भी हुई. इस दौर के पाकिस्तान के गवर्नर जनरल गुलाम मोहम्मद क्रमशः दो प्रधानमंत्रियों ख्वाजा नजीमुद्दीन और उनके बाद सत्तारूढ़ हुए मोहम्मद अली का समस्या समाधान के प्रति अपेक्षाकृत सकारात्मक रुख रहा. भारतीय प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू की मोहम्मद अली से दो-दो बार गंभीर बातचीत हुई. पंडित नेहरू भी विश्वास से भरे हुए थे. दोनों प्रधानमंत्रियों की आखिरी बातचीत 17 अगस्त 1953 को दुर्भाग्यपूर्ण पृष्ठभूमि में हुई. जम्मू कश्मीर के प्रधानमंत्री शेख़ मोहम्मद अब्दुल्ला की बर्खास्तगी और गिरफ्तारी से सूबे का राजनीतिक माहौल अचानक बदल गया था.
शिखर वार्ता के महज सप्ताह भर पहले सदरे रियासत कर्णसिंह ने दिल्ली को भरोसे में लेकर शेख़ की सरकार को बर्ख़ास्त कर दी थी. शेख़ पर कई तरह के गंभीर आरोप लगाए गए. श्रीनगर में बख्शी ग़ुलाम मोहम्मद को सत्ता सौंपी गई. शेख़ पर एक गंभीर आरोप यह भी लगाया गया कि वे कुछ विदेशी ताकतों के सहयोग से कश्मीर को स्वतंत्र राष्ट्र घोषित करना चाहते थे. केवल सत्ताधारी काँग्रेस ही नहीं कम्युनिस्ट पार्टी के नेताओं ने भी शेख़ पर यह आरोप लगाया और उनकी बर्ख़ास्तगी का समर्थन किया. दोनों प्रधानमंत्रियों की कराची बैठक से पहले भी कश्मीर को लेकर तमाम तरह की अटकलों का बाजार गर्म था. कुछ अमेरिकी राजनेताओं-कूटनीतिज्ञों की शेख़ मोहम्मद अब्दुल्ला से मुलाकात को लेकर ‘‘मीडिया’’ में तरह तरह की टिप्पिणयाँ की गई थीं. यही कारण है कि कराची वार्ता से पहले भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता को बयान देना पड़ा ‘‘कुछ भारतीय और अमेरिकी अखबारों में छपी यह खबरें कि भारत और पाकिस्तान की सरकारें कश्मीर को स्वतंत्र राष्ट्र का दर्जा देकर समस्या का समाधान खोज रही हैं, वस्तुस्थिति और सच्चाई से परे हैं. भारत सरकार ने इस तरह के किसी प्रस्ताव या सुझाव पर कभी पाकिस्तान की सरकार से औपचारिक या अनौपचारिक चर्चा नहीं की.’’ कश्मीर के बदले माहौल और इससे दोनों देशों के रिश्तों में आए कसैलेपन ने वार्ता के इस महत्वपूर्ण दौर की संभावनाओं को नष्ट कर दिया. कश्मीर : विरासत और सियासत |
इससे जुड़ी ख़बरें विक्टोरिया ने किताब ना पढ़ी तो क्या17 अगस्त, 2005 | मनोरंजन मूढ़ी बेचकर साहित्य साधना24 जून, 2005 | मनोरंजन ब्रिक लेन, बांग्लादेश और ब्रिटेन22 अप्रैल, 2005 | मनोरंजन सराहा जा रहा है सरहद पार का साहित्य25 अगस्त, 2004 | मनोरंजन एक और पुस्तक विवादों के घेरे में04 दिसंबर, 2003 | मनोरंजन | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
| ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||