|
हमारे समाज में एक स्त्री का होना | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
आमतौर पर राजनीतिक समाज पर नागरिक समाज टिप्पणी करता है और दोनों समाज मानते हैं कि इसमें उनका अपना-अपना पूर्वाग्रह है. लेकिन जब कोई समाज अपने ही बारे में कुछ कहता सुनता है तो अक्सर वह सब सामने आता है जिसकी कल्पना तक नहीं होती. शायद इसीलिए सामाजिक कार्यकर्ता, मज़दूर नेता और राजनीतिज्ञ रमणिका गुप्ता के अनुभवों के संसार को उनकी कलम के माध्यम से देखना सिहरन पैदा करता है. उनकी पुस्तक 'हादसे' से ही समझ में आता है कि महिलाओं का घर से निकलना आसान क्यों नहीं होता और क्यों अक्सर महिलाएँ बाहर आने से कतराती हैं. 'हादसे' के अंश- नाच नचनिया नाच ऐसे अनेक मौक़े आए जब अपनी बात मनवाने के लिए मुझे सदन के ‘वैल’ में आना पड़ा या टेबल पर चढ़कर नारेबाजी करनी पड़ी. मुझसे पहले आमतौर से कोई स्त्री सदस्य ऐसा नहीं करती थी, पर मैंने विरोध जताने के लिए इस परंपरा की सदन में शुरूआत की अन्यथा हमारी बात कोई नहीं सुनता था. बहुत थेथर (बेशर्म) भी होना पड़ता है स्त्री सदस्य को. पुरुष सदस्य भीरत-भीतर जुझारू औरतों को बर्दाश्त नहीं करते. मुझे याद है एक बार पूरा विपक्ष सदन के ‘वैल’ में था, कर्पूरी जी भी थे, मैं भी थी. मैं टेबल पर चढ़कर अपनी बात कह रही थी क्योंकि नीचे खड़े होने पर भीड़ में भिंच जाने का ख़तरा था. इसी-बीच सत्तादल ने अपनी रणनीति बदली. वे भी सीटों से उठकर विपक्षी सदस्यों के गिर्द खड़े होकर नारेबाजी करने लगे. गर्मागर्म बहस शुरू हो गई और इसी बीच रघुनाथ झा (जो उन दिनों काँग्रेस पार्टी में थे. बाद में वे समता पार्टी के अध्यक्ष और सांसद बने और अभी राजद के सांसद हैं) मुझे संबोधित कर ताली बजा-बजाकर कहने लगे-‘नाच नचनिया नाच.’ मैं टेबल से नहीं उतरी. अगर मैं टेबल से उतर जाती और नारेबाजी बंद कर देती तो उनकी मंशा पूरी हो जाती. मैंने थेथर होकर नारेबाजी और तेज़ कर दी. विपक्ष के सदस्य नारेबाजी में मेरा साथ दे रहे थे. सत्तापक्ष ताली पीटता रहा, फब्तियाँ कसता रहा. बाद में अध्यक्ष के आदेश से ऐसी सब बातें कार्रवाई से हटा दी गईं पर मेरी स्मृतियों से इन्हें हटाना मुश्किल है. अध्यक्ष ने सदन के स्थगन की घोषणा कर दी तो सदन के भीतर सत्ताधारी व विपक्ष के सदस्यों के बीच काफी देर तक अनौपचारिक बहस चालू रही. कर्पूरी जी हमेशा मेरा हौसला बढ़ाते थे, हालाँकि मुंशीलाल राय मुझे बेहद हतोत्साहित करने का प्रयास करते थे. लालू यादव जी उन दिनों हमारी बगलवाली बेंच पर बैठते थे. उसी बेंच पर रामलखन यादव और नामधारी सिंह (जो आजकल झारखंड विधानसभा के अध्यक्ष हैं) बैठते थे.
लालू जी मेरी मुख़ालफ़त नहीं करते थे. हाँ, उनके प्रिय साथी गणेश यादव (जो बाद में उन्हें छोड़ गए) मेरी बहुत मुख़ालफ़त करते थे. वृषिण पटेल भी गणेश यादव के साथ हो लेते थे. दरअसल मुंशीलाल राय भीरतर से सदैव कर्पूरी जी के विरोधी रहे. वे उनके साथ रहकर उनके साथ घात करते थे. उन दिनों शिवनन्दन पासवान बहुत ईमानदार दलित नेता माने जाते थे. उन्हें कर्पूरी जी विधानसभा का उपाध्यक्ष बनाना चाहते थे लेकिन मुंशीलाल राय की लॉबी हिमांशु जी को उपाध्यक्ष बनाने की पक्षधर थी. हम लोग कर्पूरी जी के साथ थे. मैं जुझारू थी और वाचाल भी, इसलिए मेरा विरोध भी अधिक होता था. उधर श्रीबाबू (श्रीकृष्ण सिंह) का पुत्र नरेन्द्र मेरा विरोधी था चूँकि उसके पिता श्रीकृष्ण सिंह को मैंने अपनी यूनियन से निकाल दिया था. वह गोपाल सिंह से मिलकर मेरी मुख़ालफ़त करता था. प्रणव चटर्जी जब तक जीवित रहे, हमें पर्याप्त संरक्षण देते रहे, उसके बाद कर्पूरी जी काफी अकेले पड़ गए. उनके साथ विशाल जन-समर्थन था पर चंद तिकड़मी लोग उनसे चिढ़ते थे. कुछ लोग अपने को बहुत विद्वान समझते थे और इसलिए भी जलते थे कि वे अपनी विद्वता के बल पर कर्पूरी जी को मात क्यों नहीं दे पाते ? नेतृत्व के लिए विद्वता काफी नहीं होती. उसके लिए जोख़िम उठाने की क्षमता और प्रतिबद्धता का होना भी लाज़मी होता है. दरअसल, पार्टी के ये विद्वान-सामंत अधिक थे, विद्वान कम, जननायक तो बस एकमात्र कर्पूरी जी ही थे. उनके बाद बिहार को कोई जननायक नहीं मिला. यह तो शुक्र है कि लालूजी के रूप में बिहार को एक जननेता मिल गया नहीं तो बिहार कौरव-पांडव का युद्धस्थल बन गया होता या दस्यु-युग में बदल जाता. वैसे बिहार नरसंहारों की भूमि तो बन ही गया है पर यह शुभ है कि बिहार की जनता जाग गई है और उच्च जातीय, उच्चवर्गीय सामंती नेताओं को टक्कर दे रही है. यह विश्वास जनता के मंडल कमीशन के निर्णय से, लालू यादव और नक्सली आंदोलन की मिली-जुली शक्तियों के प्रभाव के कारण पाया है. आज़ादी के बाद छप्पन वर्ष तक राज करने वाली काँग्रेस दलित-पिछड़ी जनता में आत्मसम्मान और आत्मविश्वास नहीं जगा पाई थी. सोशलिस्टों ने भी ‘पिछड़े पावें सौ में साठ’ का नारा देकर बिहार में अधूरी ही सही पर सामाजिक न्याय की प्रक्रिया तो शुरू कर ही दी थी लेकिन लोहिया जी के ही शब्दों में-‘एहतियात नहीं बरतने पर इस जातिनीति को पिछड़ों में दबंग जातियाँ हाइजैक कर लेंगी.’ बिहार में यही हुआ. हालाँकि ‘पिछड़े पावें सौ में साठ’ में दलित शामिल थे पर व्यवहार में वे उपेक्षित ही रहे. मंडल के मामले में बिहार में लालू जी ने जो उच्चवर्गीय लोगों को ख़िलाफ़ अभियान चलाया उसमें उनके साथ दलित शामिल थे. हालाँकि बाद में पिछड़े और दलित अपने-अपने जाति समूहों की ताक़त बढ़ाने में जुट गए और पिछड़े या दलित का सामूहिक ढंग का जाति-विहीन आंदोलन गौण हो गया और जाति-उन्नयन का आंदोलन सशक्त होने लगा. पर यह तो मानना ही पड़ेगा कि इनमें आत्मविश्वास भरने का काम लालू जी ने किया. लालू जी के खेमें में हालाँकि वही लोग अधिक गए जो पहले कर्पूरी जी का विरोध करते थे. बाद में लालू जी स्वयं ही कर्पूरी जी के खेमे में शामिल हो गए. उनके साथी भी उनके साथ कर्पूरी जी के खेमें में चले गए लेकिन कई उन्हें छोड़ भी गए. -------------------------- |
इससे जुड़ी ख़बरें अडूर का रचना संसार: एक झलक19 जून, 2006 | मनोरंजन 'खेलासराय कहाँ नहीं है..?'20 जुलाई, 2005 | मनोरंजन आकाशवाणी और दूरदर्शन का रोचक इतिहास18 जून, 2005 | मनोरंजन किसान, गाँव, समाज और राजनीति08 जून, 2005 | मनोरंजन ब्रिक लेन, बांग्लादेश और ब्रिटेन22 अप्रैल, 2005 | मनोरंजन | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
| ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||