| 'खेलासराय कहाँ नहीं है..?' | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
प्रमोद कुमार तिवारी का उपन्यास 'डर हमारी जेबों में' आपातकाल के बाद की परिस्थियों में एक गाँव 'खेलासराय' की तस्वीर उकेरने की कोशिश है. यह पुस्तक एक सवाल अनायास ही खड़ा करती चलती है कि यदि यह एक गाँव की ही कहानी है तो ये गाँव कहाँ नहीं हैं. प्रमोद कुमार तिवारी एक प्रशासनिक अधिकारी हैं लेकिन समाज को देखने का उनका तरीक़ा एकदम अलग है. जैसा कि किसी लेखक का होना चाहिए. 'डर हमारी जेबों में' को लंदन स्थित संस्था कथा, यूके ने इस वर्ष के इंदु शर्मा पुरस्कार से सम्मानित करने का फ़ैसला किया है. इस पखवाड़े प्रमोद कुमार तिवारी के उपन्यास 'डर हमारी जेबों में' का एक अंश हम अपने गाँव में “चीजु का पाताल ” वाला खेल खेलते थे. वह पाताल की अनंत गहराइयों में बसा था. बीस कुओं के बराबर मिट्टी निकालने के बाद ही पहुँचा जा सकता था वहाँ. वहाँ वो सारी चीज़ें होतीं, जो मन चाहता था. पर केवल मन की गति थी वहाँ तक. पिताजी की बातें सुनकर लगा था, मैं खेलासराय नहीं, बल्कि अपने चीजू के पाताल में जा रहा था. अपने टोले के अवधेसवा को बताया भी था कि मुझे चीजू का पाताल मिल गया था. अवधेसवा का चेहरा उतर गया था. वह खेलासराय पहुँचने के तुरंत बाद का मेरा चेहरा देख लेता तो उसके चेहरे की रंगत लौट आती. निराशा के पाताल में बदल गया था मेरा “चीजू का पाताल.” कुछ भी तो नहीं दिखा था वैसा, जैसा सोचा था. मुट्ठी भर चौक; कब आया, कब खत्म हो गया, पता ही नहीं चले, ऐसा बाजार; छोटे-बड़े गड्ढों से भरी सड़कें, मानो बड़ी माता के प्रकोप से ग्रस्त हों; सड़कों के दोनों तरफ झोपड़ीनुमा दुकानें और गुमटियाँ, ठेले और खोमचेवाले. इक्की-दुक्की इमारतें दिखीं भी तो अधिकांश की बाहरी दीवारों पर प्लास्टर नहीं था. केवल गोबर हाथ देने भर की कसर रह गई थी, वरना सुखद आश्चर्य होता हमें कि कुंवरपुर से चलकर हम वापस कुंवरपुर ही पहुँच गए थे. पिताजी को कोई दूसरा उदाहरण नहीं ढूंढना पड़ता यह समझाने के लिए कि धरती गोल थी. सड़क पर टहलते लोगों को देखकर तो संसार के कुंरपुरमय होने का भ्रम हो ही रहा था. “ठीक से देखोगे तब न...! ” पिताजी ने भाँप लिया था मेरी उदासी को. लेकिन जो उदासी ठोस कारणों से पैदा हुई थी, खोखले लाड़ से कैसे जाती! मैंने रिक्शेवाले से पता कर लिया था कि वहाँ सिनेमा हॉल भी नहीं था. बन रहा ता. पर्व-त्योहार के दिनों में गोरक्षिणी में मोटर सिनेमा दिखाते थे कुछ लोग. बहुत दुख हुआ था जानकर कि पिताजी झूठ बोलते रहे थे मुझसे. ऐसा नहीं करना चाहिए था उन्हें. न झूठ बोले होते, न मन में ऊँची उड़ान भरी होती. जानता होता कि छोटे कचड़ाघर से निकलकर बड़े कचड़ाघर में जाना था तो जो भी दिखता, उसी से खुश हो जाता. जैसे माँ खुश थीं. माँ का चेहरा सुलग रहा था खुशी से. उनकी तृषार्त आँखों को मानो अब जाकर आराम मिला था. रिक्शे के पुश्त तो जोर से पकड़ रखा था माँ ने और तृप्त आँखों से निहार रही थीं खेलासराय को. सिर से बार-बार फिसल जाते आँचल को सिर पर ठीक करतीं और विभा के गाल थपथपा देतीं. विभा भी कम खुश नहीं थी. जैसे ही कोई दूसरा रिक्शा नज़र आता, खिल उठती “देखो, एक और...ज़ोर से चिल्लाती? भइया, फुलौना..., लेमनचूस...भइया, टमटम... !” रिक्शावाला भी समझ गया होगा खाँटी देहाती माल लदा हुआ था उसके रिक्शे पर. अपनी शादी के पूरे 14 साल बाद माँ कुंवरपुर से बाहर निकल पाई थीं. 14 साल उस नरक में! माँ इस बात का जिक्र आते ही ऐसी बेचैनी से भर जातीं मानो उनका वश चलता तो अपनी ज़िंदगी की किताब से उन चौदह सालों के पन्नों को फेंक डालतीं फाड़कर. अकूत वेदना से भर जाती. ज़रूर कोई बहुत बड़ा पाप किया होगा पिछले जन्म में कि भगवान ने अच्छा पति भी दिया तो उसकी बुद्धि भ्रष्ट कर दी जाती थी. माँ एक गहरी तृषा से भर जातीं. कितने खुशगवार हो सकते थे वो 14 साल! बाद में मैं उन्हें उकसाने के लिए कहता कि पिताजी को गाकर क्यों नहीं समझाती थीं “मोरा नादान बालमा ना जाने दिल की बात! ” “पूछ लो, अपने बाप से. एक रेडियो भी तो न था हमारे पास कि दिन-रात कांव-कीच सुनने के बाद मन करता तो गाना भी सुन लेते... ” माँ का विक्षोभ. माँ बताने लगतीं कि पिताजी छोटी-छोटी बातें भी नहीं बताते थे उन्हें. माँ नहीं जानती थीं कि उनके पति को हरेक माह कितना वेतना मिलता था. यह जानने का तो सवाल ही नहीं था कि उसमें से वे कितना भाइयों को दे देते और कितना अपने बाल-बच्चों के लिए बचाते थे. पूछने पर नाराज हो जाते पिताजी. बोलना-चालना बंद कर देते. दुआर पर ही खाना खा लेते और दालानवाली कोठरी में सो जाते. “यही सब बताया जाता है बच्चों को ?” पिताजी कोलाज लगने लगती थी माँ की बातें सुनकर. “वाह रे वाह ! हम जिस दुख को 14 साल झेले हैं उसको सुनना भी नहीं चाहते आप?” माँ का दुख धीरे-धीरे गुस्से का रूप ले लेता – सब इन्हीं के कारण... भगवान ऐसा मर्द किसी को मत...” पिताजी छुट्टियों में गाँव आते और घर में एक बड़े कोहराम की सुगबुगाहट शुरू हो जाती. माँ जैसे ही “बहरा” जाने का मुद्दा उठातीं, दोनों चाची लोग आसमान सिर पर उठा लेतीं. गालियों और बद्दुआओं का घटाटोप छा जाता आँगन में.
माँ रोने लगतीं लड़ते-लड़ते तो उनके साथ मैं भी रोने लगता. दिखाना चाहता कि परिवेश और पिताजी की संवेदनहीनता के ख़िलाफ़ माँ के युद्धों मैं उनके साथ खड़ा था. दोनों चाचा लोग माँ की “बहरा” जाने की इच्छा को एक महान नैतिक और सामाजिक संकट का रूप दे देते. दुआर पर आने वाले हर आदमी को सुनाते कि अलखबो घर की एकता में आग लगाने पर आमादा हो गई है. लोग उनकी बातें सुनकर चिंता व्यक्त करते गाँव में “घरफोड़नी ” औरतों की बढ़ती तादाद पर. केवल टेंगर सिंह रामचरितमानस का हवाला देकर कहते कि पत्नी की सही जगह पति के पास ही होती है-जहाँ राम, वहीं सीता. लेकिन टेंगर सिंह को डपट देते चाचा लोग-“नहीं भागोगे यहाँ से...करीया अच्छर भईस बराबर...रामायन बुझवाने चले हैं...” टेंगर सिंह की बातों को गंभीरता से नहीं लिया जाता. लोग कहते कि हाड़े हरदी नहीं लगी थी, इसलिए टेंगर सिंह को औरत से बड़ा भगवान भी नहीं लगता था. “टेंगर भइया का जोगाड़े गड़बड़ा गया है, नहीं तो मेहरारू को पिठ्इयाँ घुमाता...” उन्हें चिढ़ाने के लिए कहते लोग. और टेंगर सिंह तड़प उठते थे कि ऐसी बातें सुनकर. ईंट का जवाब पत्थर से देने लगते. अपशब्दों की आँधी-सी आ जाती-“हम ऊ आदमी नहीं हैं कि अलोता में पकड़कर छाती से चिपकाएंगे और दुआर पर बैठकर छीनरी-मनरी कहेंगे...टेंगर सिंह धरम का बात करते हैं... मुंहदेखल नहीं बतियाते... औरतीया सबका हाथ-गांड़ बंधा हुआ है, इसका माने ई नहीं है कि जिसको जो मन करे बोल दे...टेंगर सिंह के सामने जो बोलेगा ऊ सुनेगा...” सभी बोलते कुछ न कुछ. केवल पिताजी परमहंसों-सी निस्संगता ओढ़ लेते. अजीब करते थे पिताजी भी. माँ अकेले जूझती होतीं अपनी दोनों गोतनियों से, चाचा लोग हाँफते-हूँफते होते माँ की जली-कटी सुनकर और पिताजी बाहर दालान या पीछे खंडी में चौकी या खटोले पर बैठे ठेका लगाते होते या गाँव के किसी आदमी से बतकही में मगन रहते. अच्छी नहीं लगती थी उनकी यह बेगानगी, पर कभी-कभी जब नाकाबिलेबरदाश्त हो जाता था गालियों और बद्दुआओं से खदकता हुआ आँगन, मैं भी आकर उन्हीं के पास बैठ जाता. अकेले बैठे होते तो रामचरितमानस के छंद याद कराते –नामामीशमीशन निर्वाण रूपं विभूं व्यापकं ब्रह्म वेदस्वरूपं...या किसी के साथ बतकही में लगे होते तो कॉपी-किताब वहीं लाकर कुछ पढ़ने-लिखने को कह देते. यह नहीं पूछते कि आँगन में मचे धूमगजर की वजह क्या थी. आजी पिताजी की इस आदत की बहुत तारीफ करती थीं. गर्व से कहती कि इनके बेटे को मेहरूइ कुकुरघाउंच से कोई मतलब नहीं रहता. मधुकर सिंह, जो एक हाईस्कूल में हिंदी पढ़ाते थे, पिताजी को उनकी इसी आदत के कारण एक “गहरा और ठहरा हुआ” आदमी कहते. कहा जाता-पिताजी जैसे ही कुछ लोग थे कि अपने फन पर धरती को संभाले रखने का साहस मिल रहा था शेषनाग को, वरना गाँव ने नवहों का तो यह हाल हो गया था कि औरतों से पहले ही छान-पगहा तुराने लगे थे अलग होने के लिए. पूरे कुंवरपुर में तारीफ होती पिताजी की स्थिरता और गंभीरता की. बेचारी माँ एकदम अकेली पड़ जातीं. उनके साथ कोई होता तो केवल मैं-अपनी दुइन्नी औकात के साथ. पिताजी जब भी गाँव आने वाले होते, माँ मुझे उनके सामने अपने स्कूल की शिकायत करने और उनके साथ शहर चलने की जिद्द करने को सिखातीं. उनकी सिखाई हुई बातें मैं कहता भी था पिताजी से, पर जल्दी ही बहल भी जाता था इधर-उधर की बातों से. पिताजी का आना ही इतना अच्छा लगता कि मन अघाया हुआ रहता. घर के सभी बच्चों के लिए बतासा, बेलगरमी या मोतीचूर तो आता ही था, पर मेरे लिए वे अलग से बिस्कुट या चाकलेट का डिब्बा भी लाते थे. माँ का एकमात्र क्षणिक लालच और भावुकता की चपेट में आ जाता. पिताजी के अनेक दूसरे सरोकार थे गाँव में. पहुँचते ही चाचा लोग खेती-बाड़ी और अपनी दुर्दशा की अकथ कथा आरंभ कर देते. किसी के घर में बँटवारे का झगड़ा चल रहा होता तो पंचायत के लिए पिताजी को ले जाता. फिर गाँव की सामूहिक समस्याओं को लेकर चिंतित रहने वाले लोग इंतजार करते रहते थे पिताजी के आने का. काली माई मंदिर में पोचाड़ा कराना है...फुटबॉल की फील्ड ठीक करवानी है... वालीबॉल का नेट गड़वाना है...शिवाले पर गान-गवनई के लिए ढोलक-झाल का इंतजाम करना है... उन्हें विश्वास था कि अलखसिंहवा “ना” कहने वाला आदमी नहीं है. दिन-भर घेरे रहते थे लोग पिताजी को. आजी की खुशी का ठिकाना नहीं रहता दुआर पर लगी भीड़ को देखकर. लोर भर जाती थी उनकी आँखों में. कहतीं कि बाबा के समय में जो शोभा दुआर की थी, पिताजी के गाँव आने पर लौट आती थी. माँ को चिढ़ थी इस शोभा से. आजी के साथ कभी-कभी इस बात पर जोर की बक-झक हो जाती उनकी. आजी फुफकारने लगतीं-“मेहरारू सबका बस चले तो मरद-मानुस को फुफती में फुलवाकर रख ले...” आजी तो जिस-तिस को सुना आतीं. माँ किससे कहतीं अपने मन का दुख! पिताजी तैयार नहीं थे सुनने को. उनके वापस लौटने का दिन आ जाता और माँ अपने दुख के साथ अकेली रह जातीं. टेंगर सिंह कहते थे “मनुज बली नहीं होत है, समय होत बलवान.” सचमुच एक दिन वह दिन भी आया कि पिताजी के पास केवल माँ की बातें सुनने का ही समय था. उस बार दशहरा की छुट्टियों में आए तो पता नहीं क्यों पिताजी को मेरी पढ़ाई-लिखाई के बारे में व्यक्त की गई माँ की चिंताओं की जाँच-परख की ज़रूरत महसूस हुई. और ज़्यादा समय नहीं लगा था उन्हें इस प्रतीति तक पहुँचने में कि मैं पूर्णरूपेण अपने गाँव के गदहिया गोल का सदस्य हो चुका था. कुंवरपुर के अपने स्कूल में मैं ही सबसे तेज़ लड़का था और मुझे नहीं मालूम था कि प्रधानमंत्री देश में होता है कि प्रांत में. मात्र डेढ़ महीने बाद ही मुझे पाँचवीं की सालाना परीक्षा में बैठना था और ऐकिक नियम का एक भी सवाल नहीं बता पाया था मैं. “भैंस चराएगा हट्ट-हट्ट करते हुए तब जाकर आपका कलेजा ठंडा होगा...” माँ ने रोना शुरू कर दिया था. दो-तीन करारे तमाचों के साथ ही जाँच-परख का काम समाप्त हो गया था. माँ ने मुझे छाती से चिपका लिया था और हम दोनों साथ-साथ रोने लगे थे. पिताजी मुँह चोखा जैसा बनाए, सिर झुकाए हुए कमरे से बाहर चले गए थे. रात को गाँव घूमकर लौटे तो घोषणा की कि उनके साथ हम भी चल रहे थे शहर. पूत के कुपूत हो जाने का डर काँव-काँव करने लगा था उनके अंदर. और तब माँ की सारी अड़चनें निःशेष हो गई थीं. उनके रास्ते के सारे अवरोध बेमानी हो गए थे. “यह मत कहिएगा कि हमको बहरा ले जा रहे हैं... आप अपने बेटा-बेटी को ले जा रहे हैं...” माँ का यह गुस्सा बनावटी था. दिखावा भर था. वरना खुशी के मारे यह हाल था उनका कि बोलने के लिए मुँह खोलतीं तो दाँत बजने लगते. बाद में उस दिन को याद करतीं माँ तो कहतीं, “आखिर बुढ़िया कइलस भतार, बाकी जन्म गाँव के.” पिताजी के चेहरे पर वैसी ही नोरम मुसकान फैल जाती, जैसी उस रात को फैली हुई थी. हम एक अलग परिवार के रूप में गाँववाले घर के अपने कमरे में दोनों चौकियाँ सटाकर बैठे हुए थे और पिताजी उस शहर के बारे में बता रहे थे, जहाँ कुछ ही दिनों में पहुँचने वाले थे हम. माँ के “बहरा” जाने की खबर ने आँगन को जगा दिया था. दोनों चाची लोग भूत खेलाने लगी थीं. चीख़-चीख़कर अपने पतियों से अपील कर रही थीं कि खेती-बाड़ी को ताल मारें और किसी अच्छे शहर में किराए का मकान ढूंढे. उन्हें भी नहीं रहना था गाँव में. उन्हें भी अपने बच्चों को पढ़ाना था अच्छे स्कूलों में. उनके पिताओं ने उन्हें इसलिए नहीं ब्याहा था इस खानदान में कि लउंडी या गोबरपथनी का काम करें. “ऐ परसीयावाली, तोर भागे फूटल...” छोटी चाची दोनों हाथों से अपना माथा पकड़े हुए अपने कमरे की चौखट पर बैठ गई थीं और विलाप कर रही थीं. जब गुस्से में होतीं तो वह ख़ुद को “परसीयावाली ”कहती थीं. “अरे बेटीफोरवनी कहीं की, तू क्या समझती है कि हम भी हाकिम हैं...” बड़े चाचा हंकड़े और पति-पत्नी के बीच वाक्युद्ध शुरू हो गया. गालियाँ वे एक-दूसरे को दे रहे थे, पर निशाना माँ और पिताजी थे. इसी तरह की स्थिति जब पहले उत्पन्न हो जाया करती थी, पिताजी विचलित होकर बाहर चले जाते थे. पर उस वार चाचा और चाची लोगों की नौटंकी बेअसर सिद्ध हुई थी. पिताजी ने न ख़ुद एक शब्द कहा, न माँ को कहने दिया, पर कमरे से बाहर नहीं गए. आँगन में मचे हल्ले से हमारा ध्यान हटाने के लिए इधर-उधर की बातें करते रहे. ----------------------------- पुस्तक - डर हमारी जेबों में |
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