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कादरे को अंतरराष्ट्रीय बुकर पुरस्कार | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
अल्बानिया के उपन्यासकार इस्माइल कादरे को पहले बुकर अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार के लिए चुना गया है. बुकर अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार की शुरुआत इसी साल से की गई है. कादरे का नाम साहित्य के लिए दिए जाने वाले नोबल पुरस्कारों के लिए भी नामांकित हो चुका है और कहा जाता है कि आने वाले वर्षों में उन्हें किसी भी साल नोबल पुरस्कार मिल सकता है. अल्बानिया में एनवर होक्सहा की तानाशाही सरकार के दौरान कादरे का नाम चर्चा में आया लेकिन 1990 में जब वो अपना देश छोड़कर फ्रांस में जा बसे तब दुनिया की नज़र उनकी लेखनी पर गई. 1936 में ग्रीस से सटे शहर जीरोकास्टर में जन्मे कादरे पहले तिराना विश्वविद्यालय और बाद में मास्को विश्वविद्यालय में पढ़ाई की. 1960 में जब सोवियत संघ के साथ अल्बानिया ने अपने संबंध तोड़ लिए तो कादरे अपने देश लौटे और पत्रकार के तौर पर काम करना शुरु किया, 1954 में जवानी की प्रेरणा और फिर 1957 में सपने नाम से उनके कविता संग्रह प्रकाशित हो चुके थे. साठ के दशक में कादरे ने गद्य पर ध्यान देना शुरु किया और युद्ध बाद के अल्बानिया पर 1963 में उनकी पुस्तक आई जनरल ऑफ द डेड आर्मी. इस क़िताब से उन्हें अपने देश में काफ़ी नाम मिला और उन्हें विदेश जाने और वहाँ किताबें प्रकाशित करने की आज़ादी भी मिल गई. लेकिन 1975 में अधिकारियों की नाराज़गी के बाद कादरे की लेखनी पर प्रतिबंध लगा और अगले तीन साल तक वो कुछ भी प्रकाशित नहीं कर सके. शायद इसी प्रतिबंध से क्षुब्ध होकर उन्होंने 1981 में पैलेस ऑफ ड्रीम्स लिखी जिसका विषय तानाशाही और साहित्य के प्रकाशन से जुड़ा था. 1986 के बाद वो जो भी लिखते, अपने फ्रेंच प्रकाशकों को तस्करी के ज़रिए भिजवाते और फ्रांस में उनकी किताबें छपतीं. 1990 में उन्हें फ्रांस में राजनीतिक शरण मिल गई और वो फ्रांस आ गए जिसके कुछ समय बाद होक्सहा की तानाशाही का भी अंत हो गया. कादरे का कहना था कि लेखक किसी भी तानाशाह का दुश्मन ही हो सकता है. मैन बूकर पुरस्कार समिति के अध्यक्ष हार्वे मैकग्रा कहते हैं कि कादरे की किताबें अल्बानिया के बारे में बेहतरीन जानकारी उपलब्ध कराती हैं. |
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