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शुक्रवार, 01 अक्तूबर, 2004 को 13:18 GMT तक के समाचार
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गाँधीजी और मीराबेन के रिश्ते पर सवाल

गाँधीजी
गाँधीजी को अपना आदर्श मानती थीं मीराबेन
लेखक सुधीर कक्कड़ का मानना है कि महात्मा गाँधी और उनकी विदेशी शिष्या मीराबेन के बीच गहरे रिश्ते थे.

महात्मा गाँधी और मीराबेन के रिश्तों को लेकर लिखी गई सुधीर कक्कड़ की किताब ‘मीरा एंड द महात्मा’ में इन रिश्तों की विस्तारपूर्वक चर्चा की गई है.

महात्मा गाँधी के मीराबेन को लिखे पत्रों तथा मीराबेन के महात्मा गाँधी और पृथ्वी सिंह को लिखे पत्रों के आधार पर सुधीर कक्कड़ ने यह किताब लिखी है.

इस किताब में प्रकाशित पत्रों के आधार पर कक्कड़ कहते हैं कि दोनों रात में बैठकर बातें किया करते थे. इस बातचीत के दौरान दोनों के मन में यौनेच्छा भी जागृत होने लगी थी और दोनों एक दूसरे के क़रीब आना चाहते थे.

सुधीर कक्कड़ मानते हैं कि इस मनोस्थिति से महात्मा गाँधी को परेशानी होने लगी थी और वे इससे बचना चाहते थे, इसीलिए उन्होंने बाद में मीराबेन से दूरी बना ली थी.

किताब में प्रकाशित पत्रों के अनुसार मीराबेन ने लिखा है कि वे गाँधीजी की त्वचा को नर्म और लचीला बनाने के लिए वे घी से मालिश किया करती थीं.

किताब का आवरण
मीराबेन से सुधीर कक्कड़ 1968 में मिले थे

दूसरी ओर गाँधीजी ने भी मीराबेन को अपने पत्र में लिखा है, “तुम मेरे ख़यालों में हो, मैं अपने बारे में सोचता हूँ और तुम्हारी याद आती है. मैं चरखा खोलता हूँ तो तुम्हारी याद आती है.”

इसी पत्र में उन्होंने मीराबेन से कहा है कि वे महात्मा गाँधी की सेवा के लिए अपने देश को छोड़कर नहीं आईं हैं वे एक उद्देश्य से यहाँ आई हैं और उन्हें यही करना चाहिए.

इस किताब से ज़ाहिर होता है कि गाँधीजी और उनकी पत्नी कस्तूरबा गाँधी यानी बा के संबंधों पर भी असर पड़ने लगा था और आख़िरकार गाँधीजी को मीराबेन को अपने से दूर हो जाने के लिए कहना पड़ा था.

एक अंग्रेज़ी अख़बार से बात करते हुए सुधीर कक्कड़ ने कहा, “मीराबेन और बापू की नज़दीकी से बा को तकलीफ़ होने लगी थी और उन्होंने महसूस किया कि बापू कोई महात्मा नहीं हैं.”

एडमिरल की बेटी

मीराबेन एक अंग्रेज़ एडमिरल की बेटी थीं और उनका असली नाम मैडेलिन स्लेड था.

लेखक का मत
 मीराबेन और बापू की नज़दीकी से बा को तकलीफ़ होने लगी थी और उन्होंने महसूस किया कि बापू कोई महात्मा नहीं हैं
सुधीर कक्कड़

1925 में 33 साल की उम्र में वे गाँधीजी के साथ काम करने के लिए भारत आ गई थीं और उस समय गाँधीजी की उम्र 56 साल थी.

बाद में वे इंग्लैंड वापस लौट गईं और फिर ऑस्ट्रिया के वियना में एकाकी जीवन व्यतीत कर रही थीं. वहीं 1968 में सुधीर कक्कड़ ने उनसे मुलाक़ात की थी.

सुधीर कक्कड़ ने अपनी किताब में इन पत्रों को आधार बनाया है और कुछ वास्तविक घटनाओं के अलावा मीराबेन की कल्पित डायरी और रोम्याँ रोलाँ को लिखे उनके कल्पित पत्रों का सहारा लिया है.

मीराबेन और गाँधीजी के रिश्तों को नज़दीकी बताते हुए कक्कड़ कहते हैं कि गाँधीजी ने मीराबेन को 350 पत्र लिखे जो किसी भी व्यक्ति को लिखे गए पत्रों में सबसे अधिक है.

हालांकि गाँधीजी के बारे में इस तरह की बातें कोई नई बात नहीं है.

स्वयं गाँधीजी ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि अपने जीवन के आरंभिक दिनों में उनकी यौनेच्छा उन पर हावी थी.

आत्मसंयम के उनके प्रयोग भी विवादास्पद रहे हैं.

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