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बुधवार, 08 जून, 2005 को 12:21 GMT तक के समाचार
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किसान, गाँव, समाज और राजनीति
सल्तनत की सुनो गाँव वालो
दो पहले पखवाड़े हमने एक नया कॉलम शुरु किया और हर पखवाड़े हिंदी की नई पुस्तक का एक अंश आप तक पहुँचाने का वादा किया था.

पहले अंक में हमने पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर की पुस्तक 'रहबरी के सवाल' के अंश प्रकाशित किए थे और दूसरे अंक में नासिरा शर्मा की पुस्तक 'कुइयाँजान' के. इस सप्ताह आपके लिए लेकर आए हैं जयनंदन का उपन्यास 'सल्तनत को सुनो गाँव वालो'

जयनंदन का यह उपन्यास एक साथ कई सामाजिक समस्याओं की चर्चा और टिप्पणी करता चलता है. इसमें खेती-बाड़ी की समस्याएँ हैं, मुस्लिम समाज और अशिक्षा की चर्चा है और हर कहीं राजनीति के घिनौने खेल का ब्यौरा है.

सल्तनत एक मुस्लिम लड़की है जो अपने परिजनों का विरोध झेलकर भी पढ़ाई करती है, परीक्षाएँ देती है. फिर एक हिंदू लड़के से प्रेम करती है और आख़िरकार किसानों की समस्या के लिए जेहाद छेड़ देती है.

राजनीतिक खींचतान के बीच वह सब कुछ झेलती हुई आख़िरकार सफल होती है. गाँव की तस्वीर बदलती है और मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था में हस्तक्षेप का रास्ता भी मिलता है.

कहने को यह लेखक की कल्पना का एक गाँव है लेकिन जो कोई भी गाँवों से परिचित हैं वो पाएँगे कि ये उनके ज़हन का गाँव भी है और ये समस्याएँ भारत के हर किसान के सामने मुँह बाए खड़ी हुई हैं.

पुस्तक का एक अंश

नहर का मुख्यालय, जहाँ उसका संचालन कार्यालय और मुख्य संयंत्र अवस्थित था, पर एक छोटा शामियाना लगाया गया और उसमें नहर के जीर्णोद्धार से संबंधित माँगों के अनेक पोस्टर और बैनर टाँके गए. नीचे एक दरी बिछाई गई जिस पर बैठकर सल्तनत ने अनशन शुरू कर दिया.

एक दिन...दो दिन...तीन दिन...चार दिन...पाँच दिन... सल्तनत बिना अन्न-पानी के बैठी रही. लोग आ-आकर नारेबाज़ी कर जाते...लेकिन आवाज़ कारगर नहीं हो रही थी. जिन कानों तक इन्हें पहुँचना था वे जंग खाए किसी पुराने कपाट की तरह बंद थे. कहीं से कोई इसकी परवाह करने वाला नहीं था. सल्तनत की हालत बिगड़ती जा रही थी. निकहत और भैरव इसकी देखभाल करने के नाम पर बस टुकुर-टुकुर ताकते रहते थे और उनकी नाड़ियों को टटोल-टटोलकर थाहते रहते थे.

यह लगभग स्पष्ट हो गया था कि सल्तनत मरे या जिए, कोई यहाँ घास डालने वाला नहीं है. लग रहा था कि पुलिस, प्रशासन और सरकार है ही नहीं इस देश में... और अगर यह सब है तो भी शायद इस क्षेत्र के लोग नागरिक ही नहीं हैं इस देश के.

 सल्तनत तोड़ दो यह अनशन...कोई तुम्हारी सुधि लेने वाला नहीं है. एक अंधी-बहरी दीवार से अपना सिर टकराकर मरने से कोई फायदा नहीं. मिलिटेंसी और टेरर की भाषा जिसके पास न हो, उसका कोई सुनने वाला नहीं है. न तुम गाँधी हो और न यह सरकार अंग्रेजों की है, इसलिए ऐसे सत्याग्रह निरर्थक हैं. चलो, घर चलें और आज ही से लग जाएँ एक नए इंतज़ाम में

भैरव को तीन-चार दिनों के बाद ही आभास हो गया था कि यह अमोध अस्त्र हर आदमी के लिए एक-सा प्रभावकारी नहीं है. उसने कहा था, “सल्तनत तोड़ दो यह अनशन...कोई तुम्हारी सुधि लेने वाला नहीं है. एक अंधी-बहरी दीवार से अपना सिर टकराकर मरने से कोई फायदा नहीं. मिलिटेंसी और टेरर की भाषा जिसके पास न हो, उसका कोई सुनने वाला नहीं है. न तुम गाँधी हो और न यह सरकार अंग्रेजों की है, इसलिए ऐसे सत्याग्रह निरर्थक हैं. चलो, घर चलें और आज ही से लग जाएँ एक नए इंतज़ाम में.”

सल्तनत ने अपनी मद्धम वाणी में उसे आश्वस्त करते हुए कहा, “हमें अब यह नहीं देखना है कि वे अंधे हैं या बहरे...जब हमने मुहिम चला दी है तो बिना अंजाम पर पहुँचे पीछे नहीं हटेंगे. तुम घबराते क्यों हो...मैं कतई मरने वाली नहीं हूँ. मैंने कहा था न कि तुम्हें देखकर तो मैं बिन अन्न-पानी के भी आसानी से जी सकती हूँ.”

भैरव का दिल दहल गया था. वह इसे कैसे मनाए? इसे कुछ हो गया तो वह भी एक जीवित लाश ही बनकर रह जाएगा...फिर तो यह मुहिम ऐसे भी नहीं चलेगी.

मनाने की कोशिश भैरव रोज ही करता रहा. छठे दिन तो मानो उसके सब्र की इन्तहा हो गई, “बस करो सल्तनत. नब्बे करोड़ की आबादी वाले इस मुल्क में तुम कीड़े-कोड़े की तरह एक मामूली इंसान हो. कोई तुम्हें पूछने, मनाने या गिलास भर जूस लेकर अनशन तोड़वाने नहीं आएगा. तुम मर जाओगी तो तुम्हारी बला से. मैं नहीं रह पाऊँगा सल्तनत तुम्हारे बिना. मेरी खातिर तुम तोड़ दो यह अनशन. तुम मेरे साथ सलामत रहोगी तो हम दूसरा उपाय निकाल लेंगे.”

“भैरव...मेरे चाँद...मेरे ख़्वाब...मेरे नूर...तुम इतना अधीर क्यों होते हो...मैं तो तुम्हारी जनम-जनम की साथी हूँ.” सल्तनत की डूबती-सी आवाज बहुत रुक-रुककर निकल रही थी. उसके अपना हाथ उठाकर भैरव के गालों को छूना चाहा, लेकिन समर्थ नहीं हो सकी. भैरव ने ख़ुद ही उसके दोनों हाथ अपने गालों से सटा लिए.

“भैरव, मैं इतना ही कह सकती हूँ कि तुम्हारा ये स्पर्श मेरे लिए दुनिया का सबसे बड़ा सुख है. इस अलौकिक स्पर्श के लिए मैं बार-बार जन्म लेना चाहती हूँ...लेकिन इसके साथ ही नहर की कीमत पर मैं बार-बार मरना भी चाहती हूँ. मैं अपने इस मन का क्या करूँ, भैरव?”

भैरव अपने लिए बनाई प्रकृति की इस सबसे बड़ी कृपा को अपलक-आवाक् देखता रह गया.

सातवें दिन की सुबह अप्रत्याशित रूप से एक सरकारी जीप आई जिससे प्रखंड विकास पदाधिकारी, अंचलाधिकारी, प्रखंड के डॉक्टर तथा चार सशस्त्र सिपाही उतरे.

डॉक्टर ने सल्तनत की नब्ज़ टटोलकर तथा स्टेथिस्कोप लगाकर जाँच की और आपस में मंत्रणा की.

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सल्तनत

सल्तनत ने कहा, “अभी मैं पूरी तरह ठीक हूँ...आप लोग चिंता न करें, मेरे मरने में अभी काफी देर है.”

अंचलाधिकारी ने कहा, “डीसी की ओर से नहर के बारे में पूरी रिपोर्ट लिखकर सरकार को भेजी जा चुकी है. कार्रवाई जल्दी ही शुरू होगी...आप अनशन खत्म कर दें.”

भैरव ने सहमत होते हुए कहा,“सल्तनत, ये लोग कह रहे हैं कि कार्रवाई जल्दी ही शुरू होगी...अनशन तोड़ दिया जाए.”

सल्तनत ने कराहते स्वर में पूछा, “सच-सच बताना...तुम्हें इनके कहने पर भरोसा है?”

भैरव ने अपनी गर्दन नीचे झुका ली.

सल्तनत ने फिर कहा, “मैं यह अनशन तभी तोड़ सकती हूँ जब डीसी लिखकर आश्वासन दें कि एक महीने में कार्रवाई पक्के तौर पर शुरू हो जाएगी. मैं जानती हूँ इनका इस तरह गोल-मटोल कहना एक धोखा है.”

वीडीओ ने अफसरी अंदाज़ अख्तियार कर लिया, “जो हमें कहना था हम कह चुके. हम आप लोगों को कल दोपहर तक का समय देते हैं...अगर आप लोगों ने अनशन खुद ही समाप्त नहीं कर दिया तो शाम को प्रशासन बल प्रयोग करने के लिए मजबूर हो जाएगा.”

जीप धूल उड़ाती हुई चली गई.

सल्तनत के होठों पर व्यंग्य की एक अस्फुट-सी मुस्कान तिर आई. पूछा उसने, “हुँह...धमकी देकर चले गए न.” उसकी दृढ़ता जैसे और भी पुख्ता हो गई.

भैरव को लगा कि यह एक नुस्खा हो सकता है उसे डिगाने का, “धमकी नहीं सल्तनत. ठीक ही कहा उन्होंने. कार्रवाई वे ज़रूर करेंगे, तुम अब मान जाओ. इनके आने से हमारी इज्ज़त भी बच गई. कोई यह तो नहीं कहेगा कि सरकार ने हमारी नोटिस तक नहीं ली.”

“भैरव, मैं जानती हूँ कि मुझे बचाने के लिए इन झूठों, फरेबियों और धोखेबाज़ों का समर्थन कर रह हो. महज खानापूरी करने आए थे ये लोग. मैंने अनशन ढोंग या दिखावा करने के लिए या किसी लोभ-लालच में नहीं किया है कि इज्जत बचाने के नाम पर किसी के मुँह छूने भर से पिंड छुड़ाकर राहत की साँस ले लूँ. मेरे अनशन तोड़ देने से इतने दिनों तक किए गए संघर्ष का कोई मतलब नहीं रह जाएगा. फिर तो अनशन का न शुरू होना ही अच्छा था.”

सल्तनत ने बहुत ठहर-ठहरकर अपनी बातें कही थीं, जिससे लगता था कि बोलने की एक-एक बूँद ऊर्जा उसे निस्पंद पड़ रहे जिस्म से निचोड़ती पड़ रही है. भैरव सहमत था कि उसकी कही सारी बातें ठीक हैं लेकिन इस समय वह चाहता था किसी भी तरह सल्तनत को आत्मघाती जुनून से उबार लिया जाए. तौफ़ीक को फोन पर उसने सब कुछ बता दिया था और कह दिया था कि वे जल्दी से जल्दी चले आएँ. वह मन ही मन कामना करने लगा कि उसके आने तक सल्तनत को कुछ न हो. वे अगर आ गए तो निश्चय ही सल्तनत को राजी करके अनशन खत्म करवा देंगे.

तौफीक एक मजदूर प्रतिनिधिमंडल के साथ किसी सम्मेलन में भाग लेने काठमांडू चले गए थे. उन्होंने बगल के शहर के एक दोस्त को फोन करके ख़बर की थी कि वे सम्मेलन खत्म होते ही नेपाल से सीधे ही पहुँचेंगे.

सुबह-शाम दूर-दूर से जाति-संप्रदाय से ऊपर उठकर बड़ी संख्या में लोग आ रहे थे और अपना समर्थन जता रहे थे. सिर्फ़ एक जाति थी टेकमल की जिसके लोग इक्के-दुक्के ही आ रहे थे. पता नहीं कौन क्या कहकर उन्हें बरगलाए जा रहा था. शायद टेकमल और उसके लोग समझते थे कि जिसमें टेकमल का प्रतिनिधित्व न हो वह आंदोलन नाजायज़ है और साथ ही उनके खिलाफ भी.

 एक बहादुर आदमी से बड़ी चीज़ के खो जाने पर भी पस्त नहीं होता. इस आंदोलन को रुकना नहीं चाहिए. नहर में पानी आ जाए तो उस पानी से मुझे जलांजलि देना, मेरी आत्मा तृप्त हो जाएगी

अनशन की सातवीं रात ठीक-ठाक गुजर गए, भैरव मन ही मन इसकी प्रर्थना करता रहा. निकहत सारी रात जागकर सल्तनत का सिर सहलाती रही और सिर पर पानी थापती रही. सल्तनत ने उससे अर्द्धचेतनावस्था में बड़बड़ाते हुए कहा था, “निकहत! नहर में पानी आ जाए तो मतीउर को ज़रूर खबर कर देना... खेतों का आदमी है वह...वहाँ कुली-कबाड़ी का काम कर रहा होगा... ज़रूर मन नहीं लग रहा होगा उसका...इंतजार होगा उसे हमारे ख़त का.”

सल्तनत ने थोड़ी देर बाद भैरव को पुकारा,“भैरव, देखो, नहर के लिए कितने लोग बेचैन हैं. तुम्हारा प्यार अगर इतने बड़े मकसद के लिए बलि चढ़ जाए तो यह कोई बड़ी कीमत नहीं.”

“नहीं सल्तनत, नहीं,” भैरव की करूण व्यग्रता तीव्र हो गई थी,“यह मेरे साथ सरासर नाइंसाफी होगी. तुम मेरी जिंदगी हो...मेरी दुनिया हो. तुम नहीं रहोगी तो मेरी दुनिया ही खत्म हो जाएगी.”

सल्तनत भीतर से पूरी तरह जैसे तरह हो गई, “मेरे दोस्त...मेरे सनम...मेरे हमदम...मेरे महबूब.” क्षीण-सी हँसी हँसते हुए सल्तनत जैसे किसी शांत-स्निग्ध जलधारा की तरह बहने लगी, “एक बहादुर आदमी से बड़ी चीज़ के खो जाने पर भी पस्त नहीं होता. इस आंदोलन को रुकना नहीं चाहिए. नहर में पानी आ जाए तो उस पानी से मुझे जलांजलि देना, मेरी आत्मा तृप्त हो जाएगी.”

अपने फेफड़े में कुछ साँसें सँजोकर उसने निकहत को पुकारा, “मेरी बहन...एक जिम्मेवारी सौंप रही हूँ. तुम भैरव को सँभालना...इसकी आग बुझने न पाए...इसे सुलगाकर रखना.”

सल्तनत के निस्तेज और धीमा होकर बोलने के अंदाज से साफ लग रहा था कि अब उसके टिके रहने की उम्मीद तेज़ी से धुँधली पड़ने लगी है. भैरव खुद को रोक न सका और उसकी आँखें जार-जार बहने लगीं. बहुत सारे कार्यकर्ता भी टेंट में मौजूद थे...सबके रोएँ एक आसन्न अनिष्ट को देखकर सिहर गए.

 भैरव के लिए रात बहुत भारी होकर गुजरी. एक-एक पल पहाड़ जैसा साबित हो रहा था. सल्तनत की बिगड़ती हालत और धीरे-धीरे मौत के मुँह में सरकते जाने की खबर जंगल में आग की तरह पूरे इलाक़े में फैल गई. सुबह प्रभुदयाल, मिन्नत, ज़कीर की अम्माँ सहित हजारों कार्यकर्ता और शुभचिंतक उमड़ आए. सबकी एक ही ख्वाहिश थी...तौफ़ीक जल्दी से जल्दी आ जाएँ और सल्तनत को समझा लें... सल्तनत अनशन तोड़ दे...इस तरह बेमौत मरने से कोई फायदा नहीं

भैरव के लिए रात बहुत भारी होकर गुजरी. एक-एक पल पहाड़ जैसा साबित हो रहा था. सल्तनत की बिगड़ती हालत और धीरे-धीरे मौत के मुँह में सरकते जाने की खबर जंगल में आग की तरह पूरे इलाक़े में फैल गई. सुबह प्रभुदयाल, मिन्नत, ज़कीर की अम्माँ सहित हजारों कार्यकर्ता और शुभचिंतक उमड़ आए. सबकी एक ही ख्वाहिश थी...तौफ़ीक जल्दी से जल्दी आ जाएँ और सल्तनत को समझा लें... सल्तनत अनशन तोड़ दे...इस तरह बेमौत मरने से कोई फायदा नहीं.

शुक्र है सबकी दुआ काम आ गई. तौफीक आ गए और बगल के शहर से अपने साथ एक डॉक्टर भी लेते आए. आते ही उन्होंने सल्तनत के सामने अपना इरादा दृढ़ता और बेबाकी से रख दिया,“एक गूँगी, बहरी और नकारा व्यवस्था के समक्ष इस तरह मरना कोई मूल्य नहीं है. सल्तनत...यह सरासर एक पागलपन है. तुम्हारे इस तरह फना हो जाने से कुछ भी हासिल नहीं होने वाला है...बल्कि कुछ हासिल करने के लिए तुम्हारा जीना ज़्यादा ज़रूरी है.”

सल्तनत ने आँखें खोलीं...तौफीक को देखा और फिर स्वतः ही उसकी आँखें बंद हो गईं. जैसे उसने अपने मामू को तस्लीम किया और फिर से अपने इरादे पर डट गई.

तौफीक ने उसकी मंशा ताड़ते हुए कहा,“ सल्तनत...अगर तुम मेरा कहा नहीं मानोगी तो देखो तुम्हारे पहले मैं और यह भैरव मौत को गले लगा लेंगे. तुम्हें मरते हुए हम देखें, इसके पहले तुम्हें देखना होगा हमें मरते हुए.”

सल्तनत ने फिर आँखें खोलीं और बहुत मोह से निहारा अपने अज़ीज़ मामू को...भैरव को...अम्मी को...प्रभुदयाल को...ज़कीर की अम्माँ को. सबके चेहरे पर एक ही आरज़ू थी... एक ही ख़्वाहिश थी...एक ही ललक थी कि तौफीक का कहा वह मान ले. हल्का-सा उसने मुस्कराते हुए अपनी आँखों में कृतज्ञता का भाव भर लिया कि उसे इतने-इतने लोग चाहने वाले हैं. गर्दन हिलाकर सबकी भावनाओँ के अनुकूल अपनी रज़ामंदी ज़ाहिर कर दी.

“डॉक्टर, आप ग्लूकोज चढ़ाइए....” तनिक मुदित होतेहुए कहा तौफीक ने. चिंतातुर भैरव के सामने जैसे बिछा हुआ एक अंतहीन अंधेरा एकबारगी छँट गया. सबके चेहरे के मातमी रंग काफूर होने लगे. सभी चाहते थे सल्तनत को बचाना. सल्तनत बच गई.

(पृष्ठ 68 से 72 तक)
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पुस्तक - सल्तनत को सुनो गाँव वालो
लेखक - जयनंदन
पृष्ठ - 144
प्रकाशक - वाणी प्रकाशन, 21-ए, दरियागंज, नई दिल्ली - 110 002
मूल्य - 175 रुपए

66पखवाड़े की किताब
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