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अडूर का रचना संसार: एक झलक | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
सत्यजित रे के बाद भारत के सबसे सशक्त फ़िल्मकार अडूर गोपालकृष्णन पर लंदन से छपी पहली अंग्रेज़ी पुस्तक ‘ए डोर टु अडूर’ दुनिया भर के पाठकों के लिए अडूर के रचना संसार का द्वार खोलती है. केरल में जन्मे अडूर गोपालकृष्णन ने पुणे के फ़िल्म संस्थान से प्रशिक्षण पाने के बाद पिछले चार दशकों में नौ फ़ीचर फ़िल्में और बीस से अधिक वृत्तचित्र बनाए हैं. उनकी सभी फ़िल्में मलयाली भाषा में हैं और केरल के समाज की विसंगतियों को प्रतिबिंबित करती है. लेकिन उनके पात्रों और कथानकों में कुछ ऐसी विशेषता पाई जाती है कि वे हर देश और काल के दर्शक को प्रासंगिक लगते हैं. अडूर गोपालकृष्णन को भारत के सर्वोच्च सिने-सम्मान दादा साहेब फाल्के पुरस्कार समेत ढेरों राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार मिल चुके हैं. इसलिए समीक्षकों और मलयाली सिनेमा रसिकों के लिए अडूर कोई अनजाना नाम नहीं है. फिर भी ग़ैर-मलयाली फ़िल्म प्रेमियों और पाठकों के लिए अडूर अभी तक एक पहेली बने हुए थे. अडूर को जानिए ललित मोहन जोशी और सी एस वेंकटेश्वरन की नई पुस्तक ‘ए डोर टु अडूर’, ऐसे ही फ़िल्म प्रेमियों के लिए अडूर के सिने संसार की पहेली को खोलती है. ‘ए डोर टु अडूर’ (अडूर का द्वार) एक निबंध संकलन है जिसमें पाथेर पांचाली की अभिनेत्री शंपा बनर्जी के एक संस्मरण समेत सात निबंध हैं और अडूर का एक लंबा इंटरव्यू है. जाने-माने फ़िल्मकार श्याम बेनेगल ने प्राक्कथन लिखा है और मृणाल सेन और गिरीश कासरवल्ली ने भी अडूर के योगदान पर अपने-अपने विचार रखे हैं. पुस्तक की आत्मा इसके सह-संपादक और मीडिया समालोचक सी एस वेंकटेश्वरन और अडूर की 59 पृष्ठ लंबी बातचीत ‘ए डोर टु अडूर’ है जो किसी फ़िल्म की तरह अडूर के रचना संसार से आपका परिचय कराती है. बातचीत के दौरान अडूर ने अपनी सभी फ़िल्मों की रचना प्रक्रिया के साथ-साथ उन सभी प्रमुख घटनाओं, व्यक्तियों और सामाजिक दशा पर भी प्रकाश डाला है जिनकी छाया उनकी फ़िल्मों में नज़र आती है. लेकिन इससे भी दिलचस्प अडूर की वे टिप्पणियाँ हैं जो उन्होंने भारतीय समाज की कलात्मक अभिरुचियों, हीन भावनाओं और पश्चिम में भारतीय सिनेमा की अवहेलना पर की हैं.
अडूर कहते हैं... उनका मानना है, “भारत और उसकी कला में दूसरे देशों की दिलचस्पी नहीं है और भारत के लोग भी अपनी संस्कृति और कला में गौरव नहीं रखते. यह उपनिवेशकालीन मानसिकता से उपजी हीन भावना का परिणाम है.” पुस्तक का दूसरा बड़ा आकर्षण सिनेमा विशेषज्ञ सुरंजन गांगुली और फ़िल्म समीक्षक मैथिली राव के लेख हैं जो अडूर की रचनाओं में छिपे सामाजिक दर्शन की व्याख्या करते हैं. सुरंजन गांगुली ने अपने लेख, ‘नेरेटिव्स ऑफ़ डिस्लोकेशन’ में अडूर की नौ फ़िल्मों के पात्रों और कथानकों की समीक्षा करते हुए सिद्ध किया है कि ये फ़िल्में ऐसे लोगों की कहानी कहती हैं जो शारीरिक या मानसिक रूप से समाज की मुख्य धारा से बाहर हो चुके हैं. अडूर की फ़िल्में मूल रूप से विस्थापन की कहानियाँ हैं. मैथिली राव ने अपने लेख में दिखलाया है कि किस तरह अडूर ने मानवतावादी शैली में फ़िल्में बनाने के बावजूद अपने आप को राजनीतिक विचारधाराओं से अछूता रखा है. सीधे-सच्चे पात्र उनकी फ़िल्मों के पात्र और कथानक सामाजिक यथार्थ में जीते हैं लेकिन किसी वाद के विवाद में नहीं उलझते. “उन्होंने बार-बार यह साबित किया है कि जिसकी अपने यहाँ के लिए प्रासंगिकता होती है वही दुनिया के लिए भी प्रासंगिक बनता है.” पुस्तक में अडूर की पहली फ़िल्म स्वयंवरम् और नवीनतम फ़िल्म निड़ालकुथ् की समीक्षाएँ भी हैं जो दोनो संपादकों, सी एस वेंकटेश्वरन और ललितमोहन जोशी ने लिखी हैं.
कलात्मक दृष्टि से निड़ालकुथ् अडूर की सबसे परिष्कृत फ़िल्म मानी जाती है और जिस सहजता से अडूर, दर्शकों को इस फ़िल्म के नायक कलियप्पन की द्वंद्व भरी मानसिक दुनिया में उतारते हैं लगभग उसी सहजता से ललितमोहन जोशी ने पाठकों को अडूर की रचना प्रक्रिया की गहराइयों में उतारा है. लेकिन ये समीक्षाएँ जहाँ इन दोनों फ़िल्मों को और अडूर की फ़िल्मकला के विकास को समझने में पाठक की मदद करती हैं, वहीं यह सवाल भी उठाती हैं कि उनकी शेष सात फ़िल्मों की समीक्षाओं को जगह क्यों नहीं दी गई? पुस्तक का उद्देश्य अडूर की कला को भाषा और क्षेत्र की सीमाओं से बाहर दुनिया भर के पाठकों तक पहुँचाना था जिसमें वह काफ़ी हद तक कामयाब हुई है. लेकिन अगर अडूर की फ़िल्मों का दुनिया की दूसरी सशक्त फ़िल्मों के साथ तुलनात्मक अध्ययन भी किया जाता तो शायद पाठक को और सुविधा होती. अडूर स्वयं मानते हैं कि “फ़िल्म की सारी बारीकियों को उसके समाज और संस्कृति के थोड़े अनुभव के बिना नहीं समझा जा सकता,” इसलिए केरल के समाज पर एक परिचयात्मक लेख की कमी भी महसूस होती है. ए डोर टु अडूर |
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