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गुरुवार, 02 दिसंबर, 2004 को 15:47 GMT तक के समाचार
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व्यंग्य के आवरण में विसंगतियों पर चोट

सच्चा झूठ का विमोचन
लंदन के नेहरू केंद्र में पुस्तक का विमोचन हुआ
व्यंग्यकार का उत्तरदायित्व समाज की विसंगतियों पर प्रहार करना है उसमें रस लेना नहीं है. व्यंग्य कोई मज़े लेने की चीज़ नहीं. इसलिए व्यंग्य को विनोद से बचना चाहिये.

यह विचार गौतम सचदेव की नई पुस्तक ‘सच्चा झूठ’, में व्यक्त किये गये हैं जो मौजूदा समाज में व्याप्त अन्याय और शोषण पर चोट करने के साथ व्यंग्य लेखन की धारणा पर भी टिप्पणी करती है.

हिन्दी भाषा में ब्रिटेन के इस पहले व्यंग्य संग्रह ‘सच्चा झूठ’ का इस सप्ताह लंदन के नेहरू केंन्द्र में लोकार्पण किया गया. इसके लेखक गौतम सचदेव कवि, कहानीकार व भाषाविद होने के साथ साथ पिछले 21 वर्षों से बीबीसी हिन्दी सेवा के प्रसारक रहे हैं.

 व्यंग्य मेरे लिए दुधारी तलवार है. एक धार से मैं पहले स्वयं कटता हूं . उससे उत्पन्न पीड़ा उस दूसरी धार को तीखा बनाती है, जो व्यापक रूप से अव्यवस्था, अनैतिकता और असामाजिकता पर प्रहार करती है.... व्यंग्य जीवन और समाज के गले-सड़े अंगों को काट फैंकने वाला नश्तर है...
गौतम सचदेव

'सच्चा झूठ', व्यंग्य के आवरण में समाज की विसंगतियों पर चोट करता है. कुल 20 अध्यायों वाला यह संग्रह आज की तकनीकी प्रगति के साथ लगातार बदल रहे समाज और सामाजिक मूल्यों, को एक समग्र सांस्कृतिक औऱ ऐतिहासिक पृष्ठ भूमि में देखता है.

पुस्तक का असरदार शीर्षक 'सच्चा झूठ' उत्सुकता जगाता है और पाठक को पढने के लिए आकर्षित करता है.

व्यापक दायरा

व्यंग्य रचना यूं तो लेखक के लंदन प्रवास की कृतियों का संग्रह है पर इसका दायरा मात्र लंदन, ब्रिटेन अथवा भारत केंद्रित न होकर आज की दुनिया के कई अन्तरराष्ट्रीय सरोकार उठाता है.

एक ओर यह रोज़मर्रा के संघर्ष में फंसे आम आदमी औऱ दूसरी ओर संसारिकता और ऐश्वर्य की चूहा-दौड़ में लिप्त मध्यम व अभिजातवर्गीय इंसान की ज़िंदगी में आ रहे परिवर्तनों का विश्लेषण है और दर्शाता है कि कैसे आज का आदमी अपने ही जाल में फंसकर अकेला पड़ता जा रहा है.

सच्चा झूठ
ब्रिटेन में हिंदी का यह पहला व्यंग्य संग्रह है

पुस्तक भारत की बिगड़ती सामाजिक- राजनैतिक स्थिति से उपजे मूल्यों के संकट और बढ़ते उपभोक्तावाद पर गहरी चोट करती है. राजनेताओं के बीच बढते भ्रष्टाचार और चरित्र के संकट का पर्दाफ़ाश एक ऐसी रोचक शैली में किया गया है जिसे पढ कर उपर से हंसी आती है पर भीतर से आक्रोश उमड़ता है.

व्यंग्य संग्रह में ब्रिटेन में रह रहे प्रवासी भारतीयों और दक्षिण एशियाइयों की ज़िंदगी की भी परतें खोली गई हैं. पुस्तक ब्रितानी समाज में मौजूद नस्लवाद के अलावा प्रवासी दक्षिण एशियाइयों द्वारा ब्रितानी कल्याणकारी व्यवस्था के दुहे जाने का भी पर्दाफ़ाश करती है.

पुस्तक में उठाये गये विविध विषयों औऱ सामाजिक मुद्दों के बावजूद 'सच्चा झूठ' का सबसे प्रबल पक्ष उसकी शैली का कसाव है जो पाठकों को बांधें रखता है. एक लेखक के रूप में गौतम सचदेव की मौलिकता उनकी शैली का प्रवाह है जो रोचक प्रस्तुति के आवरण के पीछे निहित सामाजिक सच्चाई की कड़ुवाहट को कम नहीं होने देती.

एक संवेदनशील पाठक के लिए 'सच्चा झूठ' एक आईना बन सकती है जिसमें उसे अपनी और अपने आसपास की तस्वीर नज़र आ सकती है.

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