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सोमवार, 30 जुलाई, 2007 को 11:03 GMT तक के समाचार
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पढ़ाई अब ज्ञान नहीं, रोज़गार के लिए

विद्यार्थी
अभी भी भारत में कई बच्चे प्राथमिक शिक्षा तक से वंचित हैं
मेरे जन्म के कुछ महीने बाद ही देश को आज़ादी मिली. मैं तब के प्रजातंत्र और अब के प्रजातंत्र के स्वरूप में बहुत ज़्यादा फ़र्क महसूस करता हूँ.

जिन दिनों मैं स्कूल में पढ़ने जाता था तो उस समय शिक्षा में ट्यूशन जैसी कोई बात नहीं थी और तब आज की तरह कोचिंग सेंटर नहीं होते थे.

शिक्षक ट्यूशन पढ़ाते ही नहीं थे. वे कक्षाओं में ही इतने अच्छे ढंग से समझाते थे कि किसी को ट्यूशन करने की ज़रूरत ही नहीं होती थी.

(भारत की आज़ादी के 60 बरस पूरे होने पर हम ऐसे लोगों से आपको रूबरू करवा रहे हैं जो भारत की आज़ादी के साथ-साथ ख़ुद भी 60 वर्ष के हो चुके हैं. इसी श्रंखला में पढ़िए शिक्षा के क्षेत्र में पिछले 60 बरसों के दौरान हुए परिवर्तनों पर प्रोफ़ेसर सचिंद्र नारायण की समीक्षा और दीजिए अपनी राय..)

आज उस तरह के शिक्षक नहीं हैं. मुझे लगता है कि यह शिक्षा और शैक्षिक परिवेश में आया एक बहुत बड़ा बदलाव है.

उस समय ऐसे लोग ही राजनीति में आते थे जिन्हें जनता की सेवा करनी होती थी और वे बाकायदा पढ़े-लिखे भी होते थे. तब कोई भी नेता राजनीति को व्यापार की नज़र से नहीं देखता था.

समय के साथ लोगों की मानसिकता में बदलाव भी आया है, इससे लगता है कि सामाजिक चेतना लुप्त हो गई है और समाज मे विकृति आ गई है.

अब जबकि हम आज़ादी के साठ साल पूरे कर रहें हैं तो हमें सामाजिक मुद्दों पर भी उतना ही ज़ोर देने की ज़रूरत है जितना ज़ोर हम आधारभूत संरचना पर देते हैं.

शिक्षाः बदलते आयाम

एक छात्र और फिर एक शिक्षक के दो रूपों में मैनें समाज में बहुत परिवर्तन देखा और महसूस किया है. यह सारा बदलाव बड़ा ही स्वाभाविक था.

 अब पढाई ज्ञानोन्मुखी न होकर रोज़गारोन्मुखी रह गई है लेकिन इस तरह का बदलाव कोई ग़लत परिवर्तन नहीं है. हालांकि इसके चलते छात्र और शिक्षक के संबंधों में जो परिवर्तन आया है वह ज़रुर ग़लत है

पहले का छात्र अधिक से अधिक पढना चाहता था और ज़्यादा से ज़्यादा विषयों का ज्ञान प्राप्त करना चाहता था लेकिन आज ऐसा नहीं हैं.

अब छात्र ज्ञान हासिल करने की बजाए ऐसे विषय लेना चाहता जिसके ज़रिए उसे रोज़गार प्राप्त हो सके.

अब पढाई ज्ञानोन्मुखी न होकर रोज़गारोन्मुखी रह गई है लेकिन इस तरह का बदलाव कोई ग़लत परिवर्तन नहीं है. हालांकि इसके चलते छात्र और शिक्षक के संबंधों में जो परिवर्तन आया है वह ज़रुर ग़लत है.

विकास एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है. भारत में काफ़ी विकास हुआ है. मसलन पहले हम लोग बाँस से कलम बनाते थे और उससे लिखते थे.

उस समय कलम मँहगी होती थी और ख़रीदना कठिन होता था. अब मामूली दामों में कलम मिल जाती है.

आज हमने तकनीक, विज्ञान, कॉमर्स के क्षेत्र में ख़ासी तरक्की हासिल की है. इनसे संबंधित अच्छे पाठ्यक्रम कई कॉलेजों में पढ़ाए जा रहे हैं पर साथ ही कला, साहित्य, भाषा और सामाजिक अध्ययन से जुड़े विषयों के प्रति नई पीढ़ी की रुचि घटी है जो चिंताजनक है.

(बीबीसी संवाददाता मणिकांत ठाकुर से बातचीत पर आधारित)

बीबीसी ब्लॉग
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