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शनिवार, 03 फ़रवरी, 2007 को 19:32 GMT तक के समाचार
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'उच्च शिक्षा 20 प्रतिशत जनता को मिले'
सैम पित्रोदा
सैम पित्रोदा मानते हैं कि कॉलेजों में तीन-चार गुना सीटें बढ़ाने की ज़रूर है
राष्ट्रीय ज्ञान आयोग के अध्यक्ष सैम पित्रोदा का कहना है कि विश्वविद्यालय स्तर की शिक्षा को छह फ़ीसदी से बढ़ाकर 20 प्रतिशत लोगों तक पहुँचाना भारत के लिए अहम चुनौती है.

उनका मानना है कि भारतीय कॉलेजों में सीटों को तीन-चार गुना बढ़ाना होगा, निजी विश्वविद्यालय कायम करने होंगे और विदेशी पूँजी निवेश भी सुनिश्चित करना होगा.

रोज़गार के संदर्भ में उन्होंने कहा कि सूचना तकनीक पर आश्रित 'बिज़नेस प्रोसेस आउटसोर्सिंग' क्षेत्र केवल तीन लाख नौकरियाँ उपलब्ध करवा पाया है लेकिन भारत के सामने हर साल सौ लाख नौकरियाँ उपलब्ध करवाने की चुनौती है.

पित्रोदा कहते हैं, "हमारे देश में 50 करोड़ लोग 25 वर्ष से कम आयु के हैं. दुनिया को अभी वही वर्कफ़ोर्स यानि श्रमशक्ति चाहिए. दुनिया में किसी और देश के पास इतनी श्रमशक्ति नहीं है. दुनिया जिस तरह से आगे बढ़ रही है, उसके साथ ही हमें इन्हें भी तैयार करना होगा. तो यह केवल हमारे लिए नहीं है, यह तो पूरी दुनिया के लिए है."

गुणवत्ता ज़रूरी

विश्व बैंक की रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत को उच्च शिक्षा का स्तर बढ़ाना होगा. अभी सिर्फ छह प्रतिशत लोगों तक ही विश्वविद्यालय तक की पहुँच है, इसे बढ़ाकर 20 फ़ीसदी करना होगा. और इसके साथ ही गुणवत्ता का भी विकास करना होगा.

ऐसा नहीं है कि ये हवाई बात है. बिल्कुल व्यावहारिक है. यह तो ऐसी चीज़ है कि जिसके बिना हम आगे बढ़ ही नहीं सकते. यह तो करना ही पड़ेगा और इसका कोई दूसरा विकल्प भी नहीं है. कितनी जल्दी कर सकते हैं और कैसे कर सकते हैं, यह हमें सोचना होगा.

कॉलेजों की संख्या बढ़ानी है, गुणवत्ता बढ़ानी है, प्राध्यापकों को प्रशिक्षित करना है, निजी विश्वविद्यालयों की तादाद बढ़ानी है और कॉलेजों में तीन-चार गुना सीटों का प्रावधान करना होगा.

पित्रोदा मानते हैं कि शिक्षा क्षेत्र में विदेशी निवेश लाना होगा, अनुबंध करने होंगे. ऐसे कई तरह के प्रयास करने होंगे.

शोध को बढ़ावा

आज़ादी के समय देश में बहुत कम विश्वविद्यालय थे. उत्पादन के लिए कोई आधार तो था नहीं.

हम पर शासन करने वाले हमारा तमाम खनिज वगैरह ले जाते थे और फिर तैयार की गई वस्तुएँ हमें ही अधिक दामों पर बेचते थे.

आज़ादी के वक्त हमारे यहाँ दाढ़ी बनाने का ब्लेड तक नहीं बनता था. साठ वर्षों में एक औद्योगिक आधार बना है, विश्वविद्यालय बने और शोध के तमाम केंद्र खोले गए.

सीएसआईआर, नाभिकीय शोध, अंतरिक्ष और रक्षा शोक्ष, कृषि और स्वास्थ्य शोध जैसी एक बड़ी सूची है.

लेकिन पिछले कुछ वर्षों में हमारे यहाँ शोध को विश्वविद्यालयों से अलग कर दिया गया.

विश्वविद्यालयों में बड़े शोध नहीं हो रहे हैं और शोधकर्ता विश्वविद्यालयों में पढ़ा भी नहीं रहे हैं. विश्वविद्यालयों में शोध को बढ़ाना होगा और शोधकर्ताओं को विश्वविद्यालयों में जगह देनी होगी ताकि विद्यार्थी शोध क्षेत्र में आगे बढ़ें.

अभी तो स्थिति यह है कि विश्वविद्यालयों से चार वर्षों की आईटी या इंजीनियरिंग की पढ़ाई के बाद युवाओं को अच्छी तनख़्वाह पर काम मिल जाता है. इससे वे शोध की ओर नहीं जा रहे हैं. हमें शोध को उनके लिए आकर्षक बनाना होगा.

तनख़्वाह बढ़ानी पड़ेगी, सुविधाएं बढ़ानी पड़ेगी और उन्हें बताना पड़ेगा कि इससे देश का भविष्य बेहतर होगा. अगर अभी शोध छात्रों को हम एक हज़ार दे रहे हैं तो स्वाभाविक है कि वे शोध क्षेत्र में नहीं जाएंगे. वे जाएं, इसके लिए हमें शायद 10 हज़ार देने पड़ेंगे.

उच्च शिक्षा की गुणवत्ता और संख्या, दोनों को ही बढ़ाना है. अगले 10 वर्षों में हम दुनिया में सबसे मज़बूत स्थिति में होंगे क्योंकि हमारे पास ऐसे युवाओं की सबसे बड़ी तादाद होगी. अगर इनके स्तर में सुधार नहीं होता है तो इससे पूरी दुनिया को नुकसान होगा.

आउटसोर्सिंग का चर्चा

आजकल मीडिया में आउटसोर्सिंग की चर्चा है, इसलिए हर किसी को लगता है कि देश इसी में लगा हुआ है. कोई अंतरिक्ष अनुसंधान या स्वास्थ्य, जैव प्रौद्योगिकी, ऊर्जा आदि में शोध की बात ही नहीं कर रहा है.

यह सारा काम चल रहा है पर न तो वह बहुत शहरी तरह का है और न ही बहुत आधुनिक है.

बीस वर्ष पहले पूरे देश में 20 लाख फ़ोन कनेक्कशन थे औऱ अब हर महीने 50 लाख फ़ोन लग रहे हैं. हम लोग कहाँ से कहाँ तक आ गए हैं.

और भी क्षेत्रों में भी तरक्की हुई है पर आउटसोर्सिंग पर जो ध्यान दिया जा रहा है, वह थोड़ा ज़्यादा हो रहा है.

आउटसोर्सिंग आईटी सेक्टर की देन है. जहाँ-जहाँ संस्थागत रूप से आईटी सेक्टर बढ़ा है, वहाँ आउटसोर्सिंग का काम भी बढ़ा है.

बंगलौर में आईटी इंडस्ट्री काफ़ी बढ़ा इसीलिए वहाँ आउटसोर्सिंग को भी बढ़ावा मिला. पर यह ध्यान रखना होगा कि प्रति वर्ष देश में एक करोड़ रोज़गार पैदा करने होंगे. अगर ऐसा नहीं हो पाता है तो हम युवा लोगों को काम का अवसर नहीं दे सकेंगे.

पित्रोदा कहते हैं, "ज़रूरत प्रतिवर्ष एक करोड़ रोज़गार की है पर आईटी सेक्टर से केवल तीन लाख लोगों को काम मिल पा रहा है. हमें स्वास्थ्य, निर्माण, कृषि, शिक्षा जैसे क्षेत्रों में रोज़गार निर्माण करना है. हम आउटसोर्सिंग में कभी एक करोड़ काम पैदा नहीं कर पाएंगे."

यह बात सही है कि हमारे शहर दुनिया के आउटसोर्सिंग सेंटर के रूप में विकसित हो रहे हैं.

इसी तरह हमारे शहरों के लिए आउटसोर्सिंग का केंद्र हमारा गाँव होना चाहिए. दिल्ली जैसे शहर ही तमाम बड़ी कंपनियों के केंद्र क्यों हैं. हमारे गाँव न्यूयार्क का आउटसोर्सिंग सेंटर नहीं बनेंगे पर मुंबई का तो बन ही सकते हैं.

प्रतिस्पर्धा

दुनियाभर में प्रतिस्पर्धा तो है, लोग वैश्विक स्तर पर नतीजों को देखते हैं.

अगर हम प्रतिस्पर्धा में आगे नहीं रहे तो चीन और फ़िलिपींस जैसे देश आगे निकल जाएंगे.

हमें रोज़गार के और विकल्प भी ढूंढने होंगे. देश केवल आउटसोर्सिंग से नहीं चलेगा. फिर आउटसोर्सिंग से तो हम दूसरों की तकलीफ़ मिटाते हैं पर हमें अपनी भी समस्याएं हल करनी होंगी.

पानी, सफ़ाई, ऊर्जा, निर्माण, स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों में भारत आउटसोर्सिंग नहीं कर सकता है. ऐसा नहीं सोचना चाहिए कि दुनियाभर का आउटसोर्सिंग केवल भारत में ही आएगा. यह ग़लत धारणा है.

ज्ञान आयोग शिक्षा, शोध, विज्ञान, ज्ञान का इस्तेमाल, कृषि और स्वास्थ्य पर ध्यान दे रहा है. साथ ही इस पर भी जोर दिया जा रहा है कि ई-गवर्नेंस के इस्तेमाल से कैसे सरकार के काम को और तेज़ी दी जा सकती है.

कैसे और कहाँ ज्ञान का इस्तेमाल हो. देश में इस बात की शुरुआत हुई है, यही एक बड़ी बात है. हम बीज डालेंगे और 10-20 वर्षों में नतीजे सामने आने लगेंगे.

(बीबीसी हिंदी के पिछले साल फ़रवरी में प्रसारित कार्यक्रम आपकी बात, बीबीसी के साथ में दिल्ली से नगेंदर शर्मा और बंगलौर से सुनील रामन के साथ सैम पित्रोदा के श्रोताओं के सवाल-जवाब पर आधारित.)

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