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शुक्रवार, 01 सितंबर, 2006 को 16:47 GMT तक के समाचार
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बच्चों का भविष्य संवार रहे हैं चपरासी

कई स्कूलों में शिक्षक न होने की वजह से ताला बंद है
भारत में सरकारी स्कूलों में इमारत, पानी और दूसरी बुनियादी सुविधाओं का पूरे देश में लगभग एक ही जैसा हाल है लेकिन छत्तीसगढ़ स्कूली शिक्षा के मामले में दूसरी तरह की समस्याओं से भी जूझ रहा है.

कोरबा ज़िले के सिमगा गाँव में “पीयून गुरुजी” का संबोधन सुनने पर कोई भी चौंक जाता है. यहाँ के सरकारी स्कूल में एकमात्र शिक्षक के तबादले के बाद जब लंबे समय तक कोई नया शिक्षक नहीं आया और बच्चे स्कूल से हर रोज़ लौटने लगे तो स्कूल के चपरासी ही शिक्षक की भूमिका में आ गए.

आठवीं पास कमल यादव ही पिछले कई वर्षों से आठवीं कक्षा तक के बच्चों को पढ़ाने का काम करते हैं.

कमल कहते हैं,“यहाँ एक सर्किल प्रभारी 1995 से तैनात हैं लेकिन उनके ज़िम्मे 10 प्राथमिक और तीन माध्यमिक स्कूलों के साथ-साथ सहेली शाला की भी जिम्मेदारी है. वे यहाँ के बच्चों को पढ़ाने का समय कब निकाले?”

 यहाँ की समस्या शिक्षा विभाग के पदाधिकारियों से लेकर मंत्री तक को बताई गई है लेकिन आज तक इस दिशा में कुछ नहीं हो सका
स्कूलों के सर्किल प्रभारी

सर्किल प्रभारी एमएल गढ़ेवाल कहते हैं, “यहाँ की समस्या शिक्षा विभाग के पदाधिकारियों से लेकर मंत्री तक को बताई गई है लेकिन आज तक इस दिशा में कुछ नहीं हो सका.”

कई जगह बच्चे ही स्कूलों में झाड़ू-पोछा करते हैं, एक दूसरे को पढ़ाते हैं. और तो और दोपहर में भोजन बनाने-बाँटने का काम भी करते हैं.

आदिवासी बहुल जशपुर ज़िले के कोतबा माध्यमिक स्कूल का नज़ारा देखने लायक है. इस स्कूल में 14 शिक्षकों के मुकाबले 18 चपरासियों की नियुक्ति की गई हैं.

इस स्कूल के लगभग एक हज़ार बच्चों को विज्ञान, गणित और अँग्रेज़ी विषय पढ़ाने का ज़िम्मा उन्हीं पर है. दसवीं तक के बच्चों को अँग्रेजी पढ़ाने वाले एक चपरासी ललित भोय का कहना है कि अगर चपरासी उच्च शिक्षा प्राप्त हों तो उनसे बतौर शिक्षक काम लेने में कोई हर्ज़ नहीं होना चाहिए.

किराए के मास्टर

राज्य के कई ग्रामीण इलाकों में तैनात शिक्षक स्कूल आते ही नहीं. वे गांव के ही किसी पढ़े-लिखे युवक को किराये पर रख लेते हैं और बदले में अपने वेतन का एक छोटा-सा हिस्सा उन्हें दे देते हैं.

बच्चे दोपहर का खाना खुद ही बनाते हैं और खुद ही बाँटते हैं

कोरबा के पोड़ी उपरोड़ा में अध्यापक लच्छीराम मरावी के बजाय पिछले 10 वर्षों से दसवीं पास बृजलाल ही बच्चों का पढ़ाने का काम कर रहे हैं. बदले में मरावी उन्हें हर महीने 500 रुपए देते हैं.

इलाके में एक स्वयंसेवी संस्था में काम करने वाले राजेंद्र कहते हैं, “राज्य में शिक्षा का हाल बुरा है. हज़ारों स्कूल पेड़ के नीचे चल रहे हैं. पंचायतों ने अपनी मर्जी से भर्ती और तबादले का जो धंधा शुरु किया है, उसने कई जगह ऐसे हालत पैदा कर दिए हैं. कई इलाकों में तो बच्चे ही एक-दूसरे को पढ़ा रहे हैं.”

राज्य के शिक्षा मंत्री मेधाराम साहू भी स्वीकार करते हैं कि राज्य में सरकारी स्कूलों की हालत ख़राब है.

लगभग 20 वर्षों से स्कूली शिक्षा विभाग की ओर से स्कूलों में सहायक शिक्षकों की भर्ती बंद है. यही कारण है कि राज्य में शिक्षकों का अभाव बना हुआ है.

स्कूली शिक्षा विभाग के सचिव सीके खेतान कहते हैं, “ पंचायत और स्थानीय निकायों की ओर से किए गए तबादलों के कारण ऐसा हुआ है कि कई स्कूलों में शिक्षक नहीं हैं. लेकिन हमारी कोशिश है कि इस स्थिति में जल्द से जल्द सुधार हो.”

ज़ाहिर है, तब तक बच्चों का भविष्य चपरासियों या किराए के शिक्षकों के हवाले है. यह भी न हुआ तो भी बच्चे एक-दूसरे का भविष्य संवारने की कोशिश तो कर ही रहे हैं.

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