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दान के चावलों से चलता एक स्कूल | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
सरकारी अनुदान व निजी संस्थाओं की आर्थिक सहायता से स्कूल चलने की बात तो आम है. लेकिन क्या भीख में मिलने वाले चावल के सहारे भी कोई स्कूल चल सकता है? इसका जवाब है-हां. इस अनूठे स्कूल को देखने के लिए आपको पश्चिम बंगाल के बर्दवान जिले के कटवा कस्बे से सटे गोवाई गांव तक आना होगा. राजधानी कोलकाता से कोई दो सौ किलोमीटर दूर इस गाँव के दक्षिणपाड़ा के रहनेवाले प्रशांत कन्फार्मर ने अपने पिता के नाम पर इस प्रेमानंद स्कूल की स्थापना की है. कभी नक्सली आंदोलन में शामिल रहे प्रशांत ने इस स्कूल के लिए अपने दो मंजिले पक्के मकान को दान कर दिया है. दो साल पहले शुरू इस स्कूल में पहले महज सात छात्र थे. लेकिन अब इनकी तादाद 50 से ऊपर पहुंच गई है. इनमें से 15 ऐसे हैं जो पहले पढ़ाई छोड़ चुके थे. प्रशांत बताते हैं, '' मैंने देखा कि आसपास के गांवों में गरीबी के चलते बच्चे या तो स्कूल नहीं जा रहे हैं या फिर बीच में ही पढ़ाई छोड़ देते हैं. इन बच्चों को साक्षर बनाने के मकसद से ही अपने घर में यह स्कूल खोलने का फैसला किया.'' वे कहते हैं कि '' कुछ दिन तक तो सब ठीक चला. लेकिन छात्रों की तादाद बढ़ने लगी तो घर की फसल व नकदी से स्कूल चलाना मुश्किल हो गया.'' स्कूल के लिए धन जुटाने की उधेड़बुन में फंसे प्रशांत को अचानक एक नया विचार सूझा. उन्होंने स्कूल की ओर से कटवा कस्बे व आसपास के चार गांवों के लगभग डेढ़ सौ घरों में मिट्टी की एक-एक हांड़ी रखवा दी. वे बताते हैं,'' मैंने गांववालों से अपील की कि छात्रों के हितों को ध्यान में रखते हुए वे इस हांड़ी में रोज एक मुठ्ठी चावल डाल दें. इसका काफी असर हुआ.'' लोगों का सहयोग कटवा की एक महिला शाहीना बेगम कहती है कि ‘गांव वाले विभिन्न तरीके से प्रशांत बाबू की सहायता करते हैं. यह सोच कर मन को तसल्ली मिलती है कि मेरे दिए मुठ्ठी भर चावल से छात्रों को साक्षर बनाने में सहायता मिल रही है.’ क्या आप अनुमान लगा सकते हैं कि यह एक मुठ्ठी चावल महीने के आखिर में कितना हो जाता है? पूरे दो क्विंटल! इसमें से आधा तो छात्रों को दोपहर का भोजन कराने में खर्च हो जाता है. बाकी चावल को बेचकर उससे मिलने वाली रकम से छात्रों को कापी-किताब व कलम खरीद कर दी जाती है. कक्षाएं शुरू होने के पहले छात्रों को हल्का नाश्ता देने की भी व्यवस्था है. हर हफ्ते स्कूल की ओर से उनके स्वास्थ्य की जांच भी कराई जाती है. प्रशांत की लगन देख कर अब आसपास के गांवों के कई युवक-युवतियां भी उनकी सहायता के लिए आगे आए हैं. इनमें से कोई पढ़ाता है तो कोई खाना पकाता है. स्थानीय लोग भी प्रशांत के इस अभियान से खुश हैं. वे कहते हैं कि ‘यह स्कूल बिना किसी सरकारी सहायता के ही सर्वशिक्षा अभियान को हकीकत का जामा पहना रहा है.’ |
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