BBCHindi.com
अँग्रेज़ी- दक्षिण एशिया
उर्दू
बंगाली
नेपाली
तमिल
शुक्रवार, 17 मार्च, 2006 को 04:23 GMT तक के समाचार
मित्र को भेजेंकहानी छापें
दान के चावलों से चलता एक स्कूल

स्कूल
यह स्कूल गाँववालों के दान के चावलों के सहारे चलता है
सरकारी अनुदान व निजी संस्थाओं की आर्थिक सहायता से स्कूल चलने की बात तो आम है.

लेकिन क्या भीख में मिलने वाले चावल के सहारे भी कोई स्कूल चल सकता है? इसका जवाब है-हां.

इस अनूठे स्कूल को देखने के लिए आपको पश्चिम बंगाल के बर्दवान जिले के कटवा कस्बे से सटे गोवाई गांव तक आना होगा.

राजधानी कोलकाता से कोई दो सौ किलोमीटर दूर इस गाँव के दक्षिणपाड़ा के रहनेवाले प्रशांत कन्फार्मर ने अपने पिता के नाम पर इस प्रेमानंद स्कूल की स्थापना की है.

कभी नक्सली आंदोलन में शामिल रहे प्रशांत ने इस स्कूल के लिए अपने दो मंजिले पक्के मकान को दान कर दिया है.

दो साल पहले शुरू इस स्कूल में पहले महज सात छात्र थे. लेकिन अब इनकी तादाद 50 से ऊपर पहुंच गई है. इनमें से 15 ऐसे हैं जो पहले पढ़ाई छोड़ चुके थे.

प्रशांत बताते हैं, '' मैंने देखा कि आसपास के गांवों में गरीबी के चलते बच्चे या तो स्कूल नहीं जा रहे हैं या फिर बीच में ही पढ़ाई छोड़ देते हैं. इन बच्चों को साक्षर बनाने के मकसद से ही अपने घर में यह स्कूल खोलने का फैसला किया.''

वे कहते हैं कि '' कुछ दिन तक तो सब ठीक चला. लेकिन छात्रों की तादाद बढ़ने लगी तो घर की फसल व नकदी से स्कूल चलाना मुश्किल हो गया.''

स्कूल के लिए धन जुटाने की उधेड़बुन में फंसे प्रशांत को अचानक एक नया विचार सूझा.

उन्होंने स्कूल की ओर से कटवा कस्बे व आसपास के चार गांवों के लगभग डेढ़ सौ घरों में मिट्टी की एक-एक हांड़ी रखवा दी.

वे बताते हैं,'' मैंने गांववालों से अपील की कि छात्रों के हितों को ध्यान में रखते हुए वे इस हांड़ी में रोज एक मुठ्ठी चावल डाल दें. इसका काफी असर हुआ.''

लोगों का सहयोग

कटवा की एक महिला शाहीना बेगम कहती है कि ‘गांव वाले विभिन्न तरीके से प्रशांत बाबू की सहायता करते हैं. यह सोच कर मन को तसल्ली मिलती है कि मेरे दिए मुठ्ठी भर चावल से छात्रों को साक्षर बनाने में सहायता मिल रही है.’

 मैंने गांववालों से अपील की कि छात्रों के हितों को ध्यान में रखते हुए वे इस हांड़ी में रोज एक मुठ्ठी चावल डाल दें. इसका काफी असर हुआ
प्रशांत, स्कूल संचालक

क्या आप अनुमान लगा सकते हैं कि यह एक मुठ्ठी चावल महीने के आखिर में कितना हो जाता है?

पूरे दो क्विंटल! इसमें से आधा तो छात्रों को दोपहर का भोजन कराने में खर्च हो जाता है. बाकी चावल को बेचकर उससे मिलने वाली रकम से छात्रों को कापी-किताब व कलम खरीद कर दी जाती है.

कक्षाएं शुरू होने के पहले छात्रों को हल्का नाश्ता देने की भी व्यवस्था है. हर हफ्ते स्कूल की ओर से उनके स्वास्थ्य की जांच भी कराई जाती है.

प्रशांत की लगन देख कर अब आसपास के गांवों के कई युवक-युवतियां भी उनकी सहायता के लिए आगे आए हैं.

इनमें से कोई पढ़ाता है तो कोई खाना पकाता है. स्थानीय लोग भी प्रशांत के इस अभियान से खुश हैं.

वे कहते हैं कि ‘यह स्कूल बिना किसी सरकारी सहायता के ही सर्वशिक्षा अभियान को हकीकत का जामा पहना रहा है.’

स्कूलतेरह साल का हेडमास्टर
स्कूल के हेडमास्टर की उम्र तेरह साल और छात्र हैं 87. लेकिन पढ़ने के शौक़ीन.
स्कूली छात्रबच्चों का इंटरव्यू नहीं..
दिल्ली उच्च न्यायालय निजी स्कूलों में दाखिला इंटरव्यू के ज़रिए नहीं चाहता.
इससे जुड़ी ख़बरें
हेडमास्टर की उम्र तेरह साल
25 जुलाई, 2005 | भारत और पड़ोस
अमरीका के 'इंडिया संडे स्कूल'
08 जनवरी, 2006 | भारत और पड़ोस
सुर्ख़ियो में
मित्र को भेजेंकहानी छापें
मौसम|हम कौन हैं|हमारा पता|गोपनीयता|मदद चाहिए
BBC Copyright Logo^^ वापस ऊपर चलें
पहला पन्ना|भारत और पड़ोस|खेल की दुनिया|मनोरंजन एक्सप्रेस|आपकी राय|कुछ और जानिए
BBC News >> | BBC Sport >> | BBC Weather >> | BBC World Service >> | BBC Languages >>