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हेडमास्टर की उम्र तेरह साल | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
नाम बाबर अली, उम्र 13 वर्ष और करते क्या हैं. आप सोचेंगे पढ़ाई की उम्र है पढ़ते होंगे. आप ग़लत हैं क्योंकि पढ़ाई के साथ-साथ ये पढ़ाते भी हैं और इस समय आनंद निकेतन स्कूल के हेडमास्टर हैं. स्कूल के सहायक प्रधानाचार्य आशुतोष घोष की उम्र भी अभी 14 वर्ष ही है. यह किसी नाटक का हिस्सा नहीं, बल्कि सच्चाई है. पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद ज़िले के सुदूर गंगापुर-घोषपाड़ा गांव में इन दोनों के अलावा स्कूल में पढ़ाने वाले तीसरे शिक्षक हैं हसनुज्जमान, जिनकी उम्र भी 13 साल है. ये लोग ख़ुद आठवीं कक्षा के छात्र हैं. लेकिन अपनी पढ़ाई के बाद वे लोग गाँव के उन ग़रीब बच्चों को पढ़ाते हैं जिनके मां-बाप ग़रीबी के कारण स्कूलों की फ़ीस नहीं भर सकते. आनंद निकेतन नाम का उनका यह स्कूल पिछले तीन वर्षों से चल रहा है. स्कूल का नाम तो है लेकिन स्कूल का अपना भवन तो दूर कोई झोपड़ी तक नहीं है. गर्मी के दिनों में गाँव के ही अमीर हुसैन के आम के बगीचे और जाड़ों में ज़फ़र शेख़ के घर के सामने खुले मैदान में कक्षाएँ होती हैं. बाबर अली कहते हैं, "शुरू में इस स्कूल में सिर्फ़ 10 छात्र थे. अब पहली से पांचवी कक्षा तक कुल 87 छात्र हैं. इस साल से हमारे तीन और मित्रों ने पढ़ाने का वादा किया है." भरपाई लेकिन बारिश होने पर कक्षाएँ नहीं हो पाती. इस नुक़सान की भरपाई के लिए रविवार को भी पढ़ाई होती है. ख़ुद बाबर और उनके दोनों मित्र दूसरे स्कूल में पढ़ते हैं. सहायक प्रधानाचार्य आशुतोष बताते हैं कि अगर यह स्कूल नहीं होता तो गाँव के कई बच्चे निरक्षर ही रह जाते. गाँव के मोहम्मद जलालुद्दीन कहते हैं, "मैंने अपने बेटे को साल भर तक सरकारी स्कूल में पढ़ाया. लेकिन वहाँ वह क,ख,ग,घ भी नहीं सीख सका था. अब आनंद निकेतन में वह काफ़ी कुछ सीख गया है." आख़िर यह स्कूल खोलने का विचार आया कैसे? बाबर को उनके पिता और गाँव के कुछ लोग कहते थे कि तुम लोग कभी-कभार गाँव के लड़कों को पढ़ा दिया करो. वरना वे लोग निरक्षर ही रह जाएँगे.
इसके बाद ही यह अवैतनिक स्कूल शुरू हुआ. बाबर और उनके दोनों मित्र ज़िले के कासिम बाज़ार स्थित राजगोविंद सुंदरी विद्यापीठ में पढ़ते हैं. स्कूल के शिक्षक सुब्रत मंडल बताते हैं, "हमें पता ही नहीं था कि उन्होंने गाँव में स्कूल खोला है. तीनों काफ़ी मेधावी हैं." उन्होंने बताया कि स्कूल का पता चलने के बाद वहाँ सौ से ज़्यादा पुस्तकें भिजवा गई हैं. बाबर के पिता मोहम्मद नसीरुद्दीन और आशुतोष के पिता चैतन्य घोष अपने बेटों के इस काम से काफ़ी ख़ुश हैं. वे कहते हैं कि अब उनको अपनी पढ़ाई पर भी ध्यान देना चाहिए. दो साल बाद 10वीं की परीक्षा है. लेकिन बाबर और उनके मित्र तो फ़ुरसत मिलते ही बच्चों को जुटाकर पढ़ाने लगते हैं- दो एकम दो, दो दुनी चार----. |
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