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शुक्रवार, 15 अक्तूबर, 2004 को 15:12 GMT तक के समाचार
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बच्चों का दाख़िला बच्चों का खेल नहीं

स्कूली बच्चे
बच्चों को कई-कई स्कूलों में दाख़िले के लिए इंटरव्यू देना पड़ता है
सबसे पहले लाइन में लगकर फॉर्म लीजिए, अपने खानदान के साथ-साथ अपनी आमदनी, दुपहिया-चौपहिया वाहन, अपने नौकर और कुत्ते तक का ब्यौरा भरिए, अगर बुलावा आए तो बच्चे के साथ जाकर इंटरव्यू दीजिए, क़िस्मत वाक़ई अच्छी हो तो बच्चे को दाख़िला मिल जाएगा.

लेकिन ऐसे माँ-बाप लाखों की तादाद में हैं जो परेशान होकर अपनी क़िस्मत को ही कोसते हैं, प्राइमरी स्कूल में अपने बच्चों के दाख़िले को लेकर तरह-तरह की शिकायतें करते हैं लेकिन उनका शायद ही कोई हल निकलता हो.

दिल्ली सरकार में शिक्षा मंत्री अरविंदर सिंह लवली का कहना है कि "इस बात के पूरे प्रयास किए जा रहे हैं कि दाख़िले के वक़्त सभी बच्चों को एक जैसे अवसर मिलें और अगर कोई स्कूल ऐसा नहीं करता है तो उसके ख़िलाफ़ शिक्षा अधिनियम के तहत कार्रवाई की जा सकती है."

 स्कूल दर स्कूल दरवाज़ा खटखटाने का सिलसिला. आज के ज़माने में कम्पीटीशन इतना बढ़ गया है कि बच्चे की बेहतरी के लिए साम, दाम, दंड, भेद सभी तरीक़े अपनाने पड़ते हैं
मुकेश कुमार, अभिभावक

दिल्ली में दाख़िले का ‘सीज़न’ माता-पिता के लिए कड़े इम्तहान का वक़्त होता है. हर अभिभावक चाहता है कि बच्चे की नींव मज़बूत हो और इस चक्कर में वो दस से पंद्रह प्रतिष्ठित स्कूलों के चक्कर लगाते हैं.

अब तैयारी चाहे सफ़र की हो या इम्तहान की, कमी तो छोड़ी नहीं जा सकती. पश्चिमी दिल्ली के एक अभिभावक मुकेश कुमार का कहना है कि "दाख़िले के फ़ार्म पचीस से पाँच सौ रुपये के बीच मिलते हैं. फिर शुरु होता है स्कूल दर स्कूल दरवाज़ा खटखटाने का सिलसिला. आज के ज़माने में कम्पीटीशन इतना बढ़ गया है कि बच्चे की बेहतरी के लिए साम, दाम, दंड, भेद सभी तरीक़े अपनाने पड़ते हैं."

वैसे सबसे बढ़िया स्कूल में दाख़िले के इंटरव्यू के लिए पत्र-पत्रिकाओं, रेडियो-टीवी के अलावा ट्यूशन का भी सहारा होता है.

कड़ी तैयारी

प्रतिष्ठित स्कूलों में दाख़िले की तैयारी के लिए तीन साल के बच्चों को ट्यूशन पढ़ाने वाली शिवानी शर्मा का कहना है कि "ये सब बच्चों के लिए अभिशाप से कम नहीं है और इसे एक तरह से अपराध ही माना जाना चाहिए."

उनका कहना है कि जो बच्चा अभी अपना नाम तक ठीक से नहीं बोल पाता उससे राष्ट्रपति और टीवी धारावाहिकों के नाम याद रखने की उम्मीद रखना बहुत ज़्यादा है.

स्कूली बच्चे
कड़ी प्रतिस्पर्धा से बच्चे कोमल मन पर बुरा असर

लेकिन माता-पिता की महत्वाकांक्षा और प्रतिष्ठित स्कूलों की इज़्ज़त के बीच पिस रहे बच्चे की चीख-पुकार सुनने का समय शायद किसी के पास नहीं है.

अब आप पास हों या फ़ेल, इन सब का एक नतीजा तो तय है मानसिक तनाव के रुप में.

सर गंगाराम अस्पताल में मनोरोग विभाग के प्रमुख डॉक्टर वधावन का मानना है कि "केवल दाख़िला ही नहीं बल्कि बच्चे पर उसके बाद कुछ कर दिखाने और माता पिता पर बच्चे को कुछ ख़ास बनाने का दबाव आजकल इतना अधिक है कि वो कई तरह की मानसिक बीमारियों का शिकार हो रहे है और बच्चों में मानसिक अवसाद या डिप्रेशन के मामले लगातार बढ़ रहे हैं."

ग़लत तरीक़ा?

बच्चों से उनके बचपन छीन कर जल्दी पढ़ाई में झोंक दिए जाने से शिक्षाशास्त्री भी चिंतित हैं. राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद के निदेशक कृष्ण कुमार का मानना है कि "ये सारी प्रक्रिया शिक्षा विज्ञान की दृष्टि से तो अतार्किक है ही, नीति के भी विरुद्घ है."

 इतनी छोटी उम्र में पढ़ाई शुरु कर देने से बच्चों का स्वभाविक विकास नहीं हो पाता और कृत्रिम अभ्यास से उन्हें ज़िदंगी में सही शुरुआत भी नहीं मिल पाती
प्रोफ़ेसर कृष्ण कुमार

उनका कहना है कि "कुछ बड़े और प्रतिष्ठित स्कूलों की भ्रांतियों और आकर्षणों के चलते विद्यार्थियों के अभिभावक उनकी ओर खिंचते हैं. इतनी छोटी उम्र में पढ़ाई शुरु कर देने से बच्चों का स्वभाविक विकास नहीं हो पाता और कृत्रिम अभ्यास से उन्हें ज़िदंगी में सही शुरुआत भी नहीं मिल पाती."

लेकिन प्रतिष्ठित स्कूलों के पास अपने तर्क हैं. दिल्ली के एक मशहूर स्कूल की प्रधानाचार्या श्यामा चौना का कहना है कि "आज की इस स्थिति के लिए माता-पिता, सरकार और स्कूल सभी ज़िम्मेवार हैं."

वे कहती हैं, "अच्छे शिक्षण संस्थान कम और दाख़िला चाहने वालों की तादाद ज़्यादा होने के कारण भी ये सब कुछ हो रहा है. बच्चे की ख़ासियतों और कमियों को जानने और अभिभावकों के बारे में परिचय प्राप्त करने के लिए इंटरव्यू या पूरी जानकारी ज़रुरी है."

लेकिन ज़रुरी यह देखना भी है कि ज़िंदगी की इस लंबी दौड़ के शुरु में ही बच्चे लड़खड़ा न जाएँ.

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