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बुधवार, 30 जून, 2004 को 16:20 GMT तक के समाचार
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इम्तहान ले रहे हैं दाख़िले के फॉर्म

बड़े बड़े फॉर्म, लंबी कतारें - मन में एक सवाल -" दाख़िला मिलेगा या नहीं."
गार्गी कॉलेज में छात्राएँ और अभिभावक
क्या आपको गोद लिया गया है? जन्म के समय आपकी लंबाई कितनी थी, आपका वज़न कितना था, आपका सीना बिना फुलाए और फुलाने के बाद कितना है, रक्तचाप, धड़कन, साँस लेने की रफ़्तार, रोग प्रतिरक्षण का विवरण, टीका विवरण, एलर्जी, सोने की आदत - इन सबका ब्यौरा दें.

ये सारे सवाल दिल्ली विश्वविद्यालय के गार्गी कॉलेज में दाख़िले के फॉर्म में पूछे गए हैं. प्रवेश पत्र का ये भाग छह पन्नों का है.

इसमें कुछ और भी रोचक प्रश्न हैं. जैसे, आपके माता पिता अपने हैं या सौतेले? आप चश्मा पहनते हैं या फिर कॉन्टैक्ट लेंस? आपके अभिभावकों के सबसे नज़दीक कौन-सा हवाई अड्डा है? आपकी बीमारियों का इतिहास और साथ ही पूरे परिवार की चिकित्सा का इतिहास माँगा गया है.

पहले ही दिन कॉलेज में दाख़िले के लिए आने वाली छात्राओं की तो परेड ही हो गई. किसी ने अपनी माँ को याद किया तो किसी ने नानी को.

इस बारे में कॉलेज की डीन डॉक्टर हेमा एस राघवन का कहना था कि यह जानकारी वे इसीलिए ले रही हैं कि कॉलेज की छात्राओं को स्मार्ट-कार्ड दिया जा सके.

 ये हिंदी माध्यम की छात्राओं को अपमानित करना नहीं तो क्या है. ये तो सीधे-सीधे भेदभाव है
सलमा अली, छात्रा

डॉक्टर हेमा राघवन कहती हैं कि ऐसा करने वाला गार्गी पहला कॉलेज है, “हम लोग इंट्रा कनेक्टिविटी सिस्टम पर काम कर रहे हैं. इसके ज़रिए छात्राएँ अपने काम को ऑनलाइन भी जमा करवा सकेंगी."

वे कहती हैं, "इससे कॉलेज की छात्राओं और स्टाफ़ को बहुत फ़ायदा होगा. एमरजेंसी में ब्लड ग्रुप की जानकारी बड़ी उपयोगी हो सकती है."

स्मार्ट-कार्ड

जहाँ छात्राएँ इस बात से खुश हैं कि उन्हें दाख़िला मिलने पर स्मार्ट-कार्ड भी मिलेगा वहीं वो ये भी पूछती हैं कि जितने सवाल दाख़िले के वक़्त उनसे पूछे जा रहे हैं वो तो बैंकों के स्मार्ट-कार्ड देने वाले भी नहीं पूछते.

हेमा एस राघवन
हिंदी माध्यम के छात्रों के साथ भेदभाव के आरोप से इनकार

फ़ॉर्म भरने वाली एक छात्रा अनीता अवस्थी का कहना है कि मेरे अभिभावकों के सबसे नज़दीक कौन सा रेलवे स्टेशन है, कौन सा हवाई अड्डा है. ऐसे सवालों से वक़्त की बर्बादी नहीं होती तो क्या होता है?

जब हमने कॉलेज की प्रिंसिपल से ये सवाल पूछा तो उन्होंने माना कि कुछ प्रश्न ऐसे ज़रूर हैं जिन्हें हटाया जा सकता है और जिनकी फ़ॉर्म में ज़रूरत नहीं है.

बारहवीं पास करके आईं छात्राओं के लिए फ़ॉर्म भरने की क़वायद तो पहली सीढ़ी है– दाख़िले के लंबे सफ़र की ओर. कॉलेजों में प्रवेश पाना कोई खेल नहीं.

प्रवेश के नियमों को लेकर भी कई सवाल उठाए जा रहे हैं. शायद इनमें सबसे बड़ी आवाज़ है – हिंदी माध्यम के छात्रों की.

भेदभाव

गार्गी कॉलेज में दाख़िला लेने आईं हिंदी माध्यम की छात्रा सारिका कहती हैं कि इतिहास के ऑनर्स का कोर्स के लिए उनके अंक इतने थे कि उन्हें आराम से गार्गी में दाख़िला मिल जाता लेकिन लिस्ट में उनका नाम नहीं है क्योंकि अंग्रेज़ी में उनके अंक कम हैं.

 इससे कॉलेज की छात्राओं और स्टाफ़ को बहुत फ़ायदा होगा. एमरजेंसी में ब्लड ग्रुप की जानकारी बड़ी उपयोगी हो सकती है
हेमा एस राघवन

कुछ इसी तरह का मामला है छात्रा सलमा अली का, “इतिहास में मेरे अंक अच्छे थे, खुश थी लेकिन यहाँ आकर मैं तो स्तब्ध रह गई, मालूम पड़ा कि अलग से अंग्रेज़ी भाषा का टेस्ट रख दिया गया है. ये हिंदी माध्यम की छात्राओं को अपमानित करना नहीं तो क्या है. ये तो सीधे-सीधे भेदभाव है.”

सलमा अली का कहना है कि इस अपमान के कारण उन्होंने कॉलेज जाने का इरादा छोड़ दिया है और अब पत्राचार के ज़रिए ही पढ़ाई करना चाहतीं हैं.

कॉलेज की प्राचार्या हेमा एस राघवन कहती हैं, “हमारे कॉलेज में कोई भेदभाव नहीं है. हमारे यहाँ इतिहास अंग्रेज़ी में पढ़ाया जाता है, सारी क़िताबें अंग्रेज़ी में ही उपलब्ध हैं, ऐसे में एक छोटा-सा टेस्ट अनिवार्य हो जाता है ताकि ये देख पाएँ कि स्टुडेंट समझ भी पाएगा या नहीं.”

सवाल कई हैं, लेकिन शायद सबसे बड़ा प्रश्नचिन्ह शिक्षा प्रणाली पर लग रहा है जो हर साल जटिल से जटिल होती जा रही है और इसका ख़ामियाज़ा भुगतने को मजबूर हैं युवा छात्र और छात्राएँ.

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