| 'शिक्षा की उपेक्षा हो रही है' | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
देश के प्रमुख शिक्षाविदों ने राजनीतिज्ञों पर जानबूझकर शिक्षा प्रणाली को नज़रअंदाज़ करते हुए इस चुनाव में लुभावने नारे देने का आरोप लगाया है. जानी मानी शिक्षाविद विभा पार्थसारथी और राष्ट्रीय साक्षरता मिशन के प्रमुख अनिल बोर्डिया ने आपकी बात बीबीसी के साथ कार्यक्रम में श्रोताओं के सवालों के जवाब दिए. इन शिक्षाविदों का कहना था कि चुनाव में सिर्फ़ ऐसे लुभावने नारे दिए जा रहे हैं जिन्हें बाद में पूरा भी नहीं किया जाएगा. बोर्डिया ने कहा, "चुनाव की इस भागमभाग में कोई भी राजनीतिक दल देश की शिक्षा प्रणाली की दुर्दशा का ध्यान ही नहीं दे रहा है." उन्होंने कहा कि नेताओं के लिए शिक्षा प्राथमिकता में नहीं है मगर रोज़ग़ार के एक करोड़ अवसर पैदा करने जैसी चीज़ें ज़रूर कही जाती हैं. विभा पार्थसारथी ने कहा, "इन चुनाव को ही देखिए राजनीतिक दलों ने कई फ़िल्मी सितारों को प्रचार के लिए साथ लिया है. ये लोग सिर्फ़ भीड़ खींचने में ही मदद कर सकते हैं मगर क्या गंभीर मसलों के बारे में उनकी कुछ समझ भी है." इस वर्ष कई परीक्षाओं के पर्चे लीक हो जाने के बारे में बोर्डिया ने कहा, "प्रादेशिक और राष्ट्रीय दोनों स्तरों के बोर्डों को अपनी विश्वसनीयता फिर से बनानी होगी." उन्होंने इसके लिए इन तंत्रों में राजनीतिक दख़ल ख़त्म करने की माँग की. बोर्डिया का कहना था कि शिक्षा के लिए आधे-अधूरे मन से कोशिशें हो रही हैं. मौजूदा सरकार ने शिक्षा को छह से 14 वर्ष के बीच के बच्चों के लिए मौलिक अधिकार बनाया मगर उसे लागू करने के स्तर पर क्या हुआ. |
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