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बीबीसी ब्लॉग - अल्पसंख्यकों की दशा | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
मेरा नाम अली मज़हर है. हैदराबाद में रहता हूँ और इसी वर्ष मैं अध्यापन का काम पूरा करके सेवानिवृत्त हुआ हूँ. मैं यहाँ अल्पसंख्यक होने के नाते पिछले 60 बरसों के हिंदुस्तान के सफ़र को देखता हूँ तो पाता हूँ कि जहाँ अल्पसंख्यक आज से 60 बरस पहले खड़े थे, आज भी कमोवेश वहीं पर हैं. उसी ग़ैर-बराबरी और ग़ैर-अमनी के माहौल में आज का हिंदुस्तान का अल्पसंख्यक युवा भी साँस से रहा है. (भारत की आज़ादी के 60 बरस पूरे होने पर हम ऐसे लोगों से आपको रूबरू करवा रहे हैं जो भारत की आज़ादी के साथ-साथ ख़ुद भी 60 वर्ष के हो चुके हैं. इसी श्रंखला में पढ़िए पिछले 60 बरसों के दौरान भारत में अल्पसंख्यकों की स्थिति और उतार-चढ़ावों पर हैदराबाद के सेवानिवृत्त अध्यापक अली मज़हर की राय और दीजिए अपनी प्रतिक्रिया...) विभाजन के समय से ही यह तकलीफ़ बनी हुई है. तभी से लोग यह समझते रहे हैं कि मुल्क को बाँटने में इनका एक बड़ा हाथ रहा है. हमेशा हमें शक की निगाह से देखा जाता रहा है. नतीजा यह रहा कि बहुत समय तक यह धारणा लोगों के दिमाग में रही कि इन्हें इस मुल्क में रहने का कोई हक़ नहीं है और इसीलिए मुसलमान उपेक्षा और बेकद्री का शिकार होते थे. उन्हें तरह-तरह के इल्ज़ामों में फंसाया जाता था. हुक़ूमतों की ओर से भी उपेक्षा ही होती रही है. ज़बानी बयानों और कोरे सब्ज़-बागों के सहारे अल्पसंख्यकों को वोटों की राजनीति के लिए इस्तेमाल किया जाता रहा. आज भी तक़रीबन वही हाल है. हालांकि कुछ स्तर पर आम आदमी भी अब इस बात को समझ रहा है कि अल्पसंख्यकों की उपेक्षा हुई है. जो राहतें भी मिली हैं वो क़ानूनी पचड़ों में पड़कर कागज़ी ही होकर रह गई हैं. दरअसल, मुल्क में मुसलमानों की इतनी ख़राब स्थिति पैदा ही न होती अगर हमें मुसलमान की हैसियत से देखने के बजाय एक हिंदुस्तानी की हैसियत से देखा गया होता. अपने मुल्क में भी मुसलमानों को आज यूरोप के दुष्प्रचार की नज़र से ही देखा जा रहा है. पहले दंगों को मुसलमानों से जोड़ा गया और अब दहशतगर्दी को. सिख और ईसाई अल्पसंख्यक देश के बँटवारे ने मुसलमान और सिख समुदाय के लोगों की सोच और दिलो-दिमाग पर गहरा असर डाला था और इससे दोनों के बीच के संबंध लंबे समय तक प्रभावित होते रहे.
आज़ादी के कई दशकों बाद सिखों में अलगाववाद और पंजाब में चरमपंथ की आग का असर यह रहा कि इस समुदाय को पूरे देश में बुरी तरह प्रभावित किया गया. पलटकर देखें तो 1984 के सिख विरोधी दंगों के घाव तो आज तक नहीं भरे हैं. जहां तक बात इस समुदाय की तरक्की और आर्थिक संपन्नता की बात है तो इसका सीधा सा कारण इनका मेहनतकश होने के साथ व्यापार और तकनीक क्षेत्र में अव्वल होना है. इसके अलावा पंजाब की सोना उगलने वाली खेती की ज़मीन सिखों की तरक्की का सबसे बड़ा कारण रही. यही इन्हें मुस्लिम समुदाय की स्थिति से बिल्कुल अलग लाकर खड़ा कर देता है. इस प्रगति और विकास की बदौलत सिखों ने अपने बच्चों को बेहतर शिक्षा दिलाई और क़ामयाब बनाया. ईसाइयों की बात करें तो देश की आज़ादी के बाद ईसाई बाक़ी अल्पसंख्यकों की तरह निशाना नहीं बने. इनके साथ कोई बडा संकट कभी नहीं रहा और यह कौम हमेशा से ही आत्मनिर्भर रही है. देशभर में फैले मिशनरी स्कूलों की बदौलत अच्छी शिक्षा हमेशा से उनकी पहुँच में रही है. आर्थिक चुनौतियों जैसी स्थिति भी ईसाइयों के लिए न के बराबर ही रही क्योंकि इस समुदाय की दानदाता संस्थाएँ उनके हाथ मज़बूत करती रही हैं. बदलती स्थितियाँ
दूसरी ओर मुसलमानों को भी अब यह बात समझ में आने लगी है कि हमारी अशिक्षा और ग़रीबी की वजह से ही हमारे साथ ऐसा हो रहा है और इसीलिए मुसलमानों ने भी शिक्षा और तकनीक की ओर अपना ध्यान बढ़ाया है. अच्छी बात यह है कि आज का मुसलमान युवा पिछली पीढ़ियों से ज़्यादा समझदार है. उन्हें समझ में आने लगा है कि अगर वे अपने पूर्वजों के नक्शेकद़म पर चले तो कुछ हासिल नहीं होने वाला है. यही वजह है कि आज के मुस्लिम युवा मुख्यधारा में शामिल होने के लिए मेहनत कर रहे हैं और कुछ हद तक क़ामयाब भी हो रहे हैं. मुस्लिम युवाओं को चाहिए कि वे यह जता दें कि वे भी हिंदुस्तानी हैं और हिंदुस्तानी की तरक्की के लिए वे भी उतने ही प्रतिबद्ध हैं जितने कि बाकी लोग. ज़रूरत इस बात की है कि इसके लिए बाक़ी समाज को सकारात्मक होकर सामने आना चाहिए. (बीबीसी संवाददाता उमर फ़ारुक़ से बातचीत पर आधारित) |
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