|
जुनून की जगह बाज़ार हावी है खेलों पर | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
मेरा जन्म देश की आज़ादी के बरस में ही हुआ. जब धीरे-धीरे होश संभाला तो समझ में आया कि मैं एक आज़ाद मुल्क में पैदा हुआ हूँ. इन 60 वर्षों के फासले को देखें तो पता चलता है कि तब के भारत और आज के भारत में बहुत बदलाव आ गए हैं. खेल का क्षेत्र भी इससे अछूता नहीं है. (भारत की आज़ादी के 60 बरस पूरे होने पर हम ऐसे लोगों से आपको रूबरू करवा रहे हैं जो भारत की आज़ादी के साथ-साथ ख़ुद भी 60 वर्ष के हो चुके हैं. इसी श्रंखला में पढ़िए खेल जगत के पिछले 60 बरसों पर पूर्व हॉकी खिलाड़ी अजीतपाल सिंह की समीक्षा और दीजिए अपनी राय..) उस वक्त संचार और मनोरंजन की तमाम चीज़ें नहीं हुआ करती थीं. न टीवी था, न इंटरनेट, न केबल, न उतनी फ़िल्में और लोगों के पास मनोरंजन के लिए खेल ही एक बेहतरीन ज़रिया बचता था. इसीलिए खेलों के प्रति लोगों में ज़्यादा रुझान था. मेरा तो जन्म ही एक ऐसे गाँव में हुआ था जहाँ से कई लोग ओलंपिक तक खेले थे सो मैंने भी हॉकी उठा ली और खिलाड़ी बन गया. तब के गाँव भी आज जैसे नहीं थे, बुनियादी ढाँचे का अभाव था पर हम अभावों में भी खेले और बढ़िया खेले. हमने कई स्वर्ण पदक जीते, विश्व कप जीता, ओलंपिक खेले. खेल, तब और अब आज स्थिति उलट है. इतने साधन-संसाधन हैं, इतना विकास हो गया है पर ओलंपिक में क्वालीफ़ाई करने तक के लिए हमारी टीम संघर्ष करती है. मैनें बचपन मैं ही हॉकी खेलना शुरू कर दिया था. उस समय संचार के इतने साधन नहीं थे. फिर भी मुझे हॉकी के तमाम बड़े खिलाड़ियों जैसे केडी सिंह बाबू, आरएस भोला, क्लाडियस के नाम याद रहते थे. हम लोग आपस में कहा भी करते थे कि फ़लां लड़का क्लाडियस की तरह खेलता हैं. पहले के लड़कों में खेल के लिए जुनून दिखाई देता था. नई पीढ़ी में यह जुनून और प्रतिबद्धता समाप्त हो गई है. भारत के अपने ग्राम्यांचलिक खेल खो-खो, कबड्डी, कुश्ती, बैलों की दौड़ आदि थे. क्रिकेट, फ़ुटबॉल, हॉकी जैसे खेल तो हमने अंग्रेज़ों से सीखें हैं. पहले क्रिकेट की तरफ़ लोगों का ध्यान इतना नहीं था जितना इस समय है. आज के बच्चों में हॉकी के प्रति लगाव कम होता जा रहा है और उनका दूसरे खेलों के प्रति रूझान बढ़ रहा है. हॉकी का हाल इसका कारण शायद यह है कि खेलों में व्यावसायिकता बहुत बढ़ गई है. इससे हॉकी पर बुरा असर पड़ रहा है.
आज हॉकी और हॉकी खेलने वालों को वैसी सुविधाएँ और महत्व नहीं मिल रहा है जैसा कुछ दूसरे खेल और उनके खिलाड़ियों को मिल रहा है. हॉकी का खिलाड़ी अपने आप को दबा हुआ महसूस करता है. दूसरी बात यह कि आज जो लोग हॉकी खेल रहें हैं उनमें हॉकी के प्रति वैसा समर्पण नहीं हैं जैसा पहले के खिलाड़ियों में हुआ करता था. आज किसी खिलाड़ी को नौकरी मिल जाती है तो फिर वह खेल के प्रति मेहनत में ढिलाई बरतने लगता है. आज की पीढ़ी मेहनत नहीं करती. ऐसा नहीं है कि सरकार का खेलों की ओर कोई ध्यान नहीं है. सरकार खेलों के लिए बहुत कुछ कर रही है. अब तो खिलाड़ियों को प्रशिक्षण के लिए विदेश भी भेजा जाता है. सरकार खिलाड़ियों पर काफ़ी सुविधाएँ मुहैया करा रही है. लेकिन सरकार की दूसरी ज़िम्मेदारियाँ भी हैं जिन्हें वह खेल से ज़्यादा महत्पूर्ण समझती है. सरकार का ध्यान शिक्षा, स्वास्थ्य, परिवहन जैसे मामलों पर ज़्यादा है. ऐसे में स्वाभाविक है कि सरकार का खेलों पर ध्यान कुछ कम हो ही जाता है. (बीबीसी संवाददाता अविनाश दत्त से बातचीत पर आधारित) | इससे जुड़ी ख़बरें क्रिकेट दर्शकों में हताशा, व्यापक प्रदर्शन24 मार्च, 2007 | खेल की दुनिया दोहा में उम्मीद से कम प्रदर्शन15 दिसंबर, 2006 | खेल की दुनिया 'आपात बैठक बुलाए हॉकी महासंघ'24 सितंबर, 2006 | खेल की दुनिया ध्यानचंद का खेल आज भी याद आता है29 अगस्त, 2006 | खेल की दुनिया भारतीय प्रदर्शन पर पूर्व मंत्रियों की राय30 अगस्त, 2004 | खेल की दुनिया | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
| ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||