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ध्यानचंद का खेल आज भी याद आता है | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
हॉकी के जादूगर ध्यानचंद की महानता का अहसास न उनके खेल की तस्वीरों से लगता है और न ही रिकॉर्ड बुक से. हॉलैंड में 1928 में उनकी स्टिक को तोड़कर जांचा गया कि कहीं उसमें चुंबक तो नहीं था. सन् 1932 में जापानी खिलाड़ियों ने कहा ध्यानचंद की स्टिक में गोंद चिपकी हुई रहती है और 1936 में हिटलर ने ब्रिटेन ओलंपिक में जर्मनी की टीम को 8-1 से हरानेवाली टीम के इस खिलाड़ी को अपनी सेना में ऊँचे पद का न्यौता दे डाला था. कुछ वर्षों पहले ध्यानचंद की पत्नी दिवंगत जानकी ध्यानचंद ने बताया था, '' हिटलर का जमाना था. इन्होंने चारों तरफ देखा लोग अपने-अपने देश के झंडे लेकर खड़े थे. भारत की टीम वैसे ही खड़ी थी. उन्हें बड़ा दुख महसूस हुआ कि हमारी ये दशा है. फिर जब ये ग्राउंड में उतरे तो लगातार गोल कर दिए.'' सादगी मेजर ध्यानचंद की देशभक्ति और उनकी सादगी उनकी हॉकी में भी दिख जाती थी.
ध्यानचंद के पुत्र पूर्व भारतीय कप्तान अशोक कुमार अपने पिता को याद करते हुए कहते हैं, '' उन्होंने सादगीपूर्ण जीवन व्यतीत किया और दोस्तों के साथ जो उनके ताल्लुकात थे, उन्होंने उसे निभाया. जब हम हार कर आते थे तो कई बार हमें भी उन्होंने डांटा.''- वो कहते थे, '' अगर टीम जीतती थो तो वो उसका सारा श्रेय साथी खिलाड़ियों को देते थे और टीम हार जाती थी तो उसकी सारा ज़िम्मेदारी अपने ऊपर ले लेते थे.'' पूर्व ओलंपिक खिलाड़ी कमांडर नंदी सिंह मेजर ध्यानचंद के साथ खेल चुके हैं और याद करते हैं,'' दुनिया कहती है कि उनकी हॉकी के साथ बॉल चिपक जाती थी. वो बॉल को अपने पास रखते ही नहीं थे. यह गलत ख्याल है कि वो बॉल की ड्रिब्लिंग करते थे. वो बिल्कुल ड्रिब्लिंग नहीं करते थे. उनकी जो विशेषता थी, वह थी गोल स्कोर की. वो किसी भी एंगल से गोल स्कोर कर सकते थे.'' टोक्यो ओलंपिक से लेकर म्यूनिख ओलंपिक तक भारतीय टीम में खेल चुके बिजली की गति से दौड़ने वाले महान सेंटर फॉरवर्ड हरबिंदर सिंह के कोच और चयनकर्ता मेजर ध्यानचंद थे. हरबिंदर सिंह याद कहते हैं,'' पटियाला में कैंप लगा था. जैसे कोई गोल करने में चूक जाता था तो दादा बड़ा गुस्सा करते थे. मैंने जितनी भी हॉकी खेली और जो शिक्षा दादा ध्यानचंद ने दी वह मेरे लिए काफ़ी लाभदायक रही.'' लोकप्रियता 1952 में आज़ादी और विभाजन के बाद ध्यानचंद पाकिस्तान होते हुए अफ़ग़ानिस्तान जा रहे थे. इस दौरान पूर्व अंतरराष्ट्रीय हॉकी रैफ़री केजी कक्कड़ ध्यानचंद की लोकप्रियता के चश्मदीद गवाह बने. उनका कहना था, '' जब हम लाहौर पहुँचे तो इतना हुजूम था कि वहां प्लेटफॉर्म टिकट ख़त्म हो गए थे. हर व्यक्ति ध्यानचंद से मिलना चाहता था और जब गाड़ी पेशावर पहुँची तो वह तीन घंटे लेट हो चुकी थी.'' और दिल्ली से पेशावर तक अपने चाहनेवालों की भीड़ जुटाने वाले हॉकी के इस जादूगर की अंतिम यात्रा उसके अपने शहर झाँसी के उस मैदान पर ही ख़त्म हुई जहां उन्होंने अपनी स्टिक का कमाल दिखाना सीखा था. | इससे जुड़ी ख़बरें हॉकी के जादूगर ध्यानचंद27 अगस्त, 2005 | खेल जब गाँधी जी ने पूछा, ये हॉकी क्या है?10 अगस्त, 2004 | खेल सौ वर्षीय ओलंपियन का निधन21 अप्रैल, 2005 | खेल हॉकी में पदक मिलने की उम्मीदें ख़त्म21 अगस्त, 2004 | खेल अज़लान शाह प्रतियोगिता का इतिहास09 जनवरी, 2004 | खेल 'पाकिस्तान का नाम ऊँचा करना चाहता हूँ'04 अक्तूबर, 2004 | खेल | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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