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हॉकी में पदक मिलने की उम्मीदें ख़त्म | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारतीय हॉकी टीम से पदक की रही-सही उम्मीदें भी आज ख़त्म हो गईं. हॉलैंड और ऑस्ट्रेलिया से पिटने के बाद पहले ही भारत की हालत ख़स्ता थी लेकिन आज न्यूज़ीलैंड ने भी उसे पटख़नी दे कर पदक की दौड़ से बाहर कर दिया. न्यूज़ीलैंड ने खेल के 36वें मिनट में फ़िलिप बरोज़ के गोल से भारत पर बढ़त बनाई. लगभग आधे घंटे तक पीछे रहने के बाद भारत के लिए धनराज पिल्लै ने 62वें मिनट में गोल करके बराबरी दिलाई. लेकिन फिर खेल ख़त्म होने से ठीक पहले यानी आख़िरी पलों में एक विवादास्पद पेनल्टी कॉर्नर को गोल में बदलकर हेडन शॉ ने न्यूज़ीलैंड को जीत दिलाई और भारत को पदक की दौड़ से बाहर कर दिया. इस विवादास्पद पेनल्टी कॉर्नर के ख़िलाफ़ भारत ने अपील भी की लेकिन कोई फ़ायदा नहीं हुआ. ओलंपिक हॉकी की तकनीकी मामलों की समिति ने फ़ैसला सुनाया कि न्यूज़ीलैंड को मिला पेनल्टी कॉर्नर जायज़ था क्योंकि भारतीय खिलाड़ी की पैर पर गेंद मैच ख़त्म होने का हूटर बजने से पहले लगा था. भारत का ये कहना था कि मैच ख़त्म होने का हूटर बजने के बाद न्यूज़ीलैंड को पेनल्टी कॉर्नर देने का रेफ़री का फ़ैसला ग़लत था. पिछले 24 सालों से ओलंपिक पदक के लिए तरस रही भारतीय हॉकी टीम को अब कम से कम चार साल और इंतज़ार करना पड़ेगा. |
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