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मंगलवार, 17 अगस्त, 2004 को 16:52 GMT तक के समाचार
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ये पूरे देश की जीत हैः राज्यवर्धन राठौर

राज्यवर्धन सिंह राठौर
राठौर पहली बार ओलंपिक में खेलने गए
स्वतंत्र भारत के लिए ओलंपिक में पहला व्यक्तिगत रजत पदक जीतने वाले राज्यवर्धन सिंह राठौर ने बीबीसी हिंदी से विशेष बातचीत में कहा कि यह पूरे देश की जीत है. उनसे सबसे पहले यह पूछा गया कि इस यादगार जीत के बाद वे क्या सोच रहे हैं?

राज्यवर्धन सिंह राठौरः ये जीत तो पूरे देश की जीत है..लोगों ने बहुत मदद की है और सबकी मदद और शुभकामनाओं से ही ये संभव हो पाया.

प्रश्नः कैसा महसूस कर रहे हैं आप चाँदी के उस तमगे को छूने के बाद जो आपके दिल से लगा है?

राठौरः बस यही लगता है कि यहाँ एक मुक़ाबला है सभी देशों के बीच कि कौन जीतता है..तो जीत के बाद सबको खुशी होनी चाहिए.

प्रश्नः इस पूरे सफ़र में आपके लिए ऐसा कौन-सा लम्हा था जो यादगार है आपके लिए?

राठौरः फ़ाइनल राउंड में यहाँ एक निशाना ऐसा था जिसके बारे में सब बोल रहे थे कि डबल ट्रैप के इतिहास में किसी ने ऐसा निशाना नहीं लगाया..हवा बहुत तेज़ थी और वह टारगेट हवा में डांस कर रहा था..मगर मैंने अपना ध्यान केंद्रित रखा और निशाना लगाया.

प्रश्नः और जब तिरंगा ऊपर जा रहा था तो आपको कैसा लग रहा था?

राठौरः वो मौक़ा सबसे अच्छा होता अगर इस समय हमारा राष्ट्रगान भी बज रहा होता..तो वो खल रहा था..मगर जिसने स्वर्ण पदक जीता वो काफ़ी अच्छा खेला..तो वो मौक़ा तो उसी के लिए था.

प्रश्नः सोने के तमगे से कैसे चूके आप?

राठौरः निशानेबाज़ी भी एक ऐसा खेल है जिसमें सभी मेहनत करते हैं..ऐसा भी हो सकता था कि मुझे कोई पदक ही नहीं मिलता..मगर मैंने अपना नियंत्रण बनाए रखा और इस तरह से क़ामयाब रहा.

प्रश्नःमगर आप पीछे कैसे रह गए?

राठौरः देखिए पहले नंबर पर रहनेवाले खिलाड़ी ने बहुत अच्छा खेल दिखाया..मैंने हालाँकि इसके पहले चेक गणराज्य में मास्टर्स कप में उन्हें हराया था मगर आज उनका दिन था और उनको हराना मुश्किल था.

प्रश्नःआप अपना ये पदक किसे समर्पित करते हैं?

हालाँकि ऐसे लोग कम ही हैं मगर वे सभी लोग जिन्होंने भारत की जीत के बारे में विश्वास बनाए रखा मैं उन्हें ये जीत समर्पित करता हूँ.

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