| भारतीय प्रदर्शन पर पूर्व मंत्रियों की राय | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
एथेंस ओलंपिक में भारतीय प्रदर्शन के बारे में क्या कहा जाए. साल दर साल फिर वही कहानी. भारत की बदलती तस्वीर के बीच ओलंपिक में भारतीय तस्वीर में कोई बदलाव नहीं आया. एक पदक की कहानी सालों से चल रही है. मैंने बात की कुछ पूर्व खेल मंत्रियों से. आइए नज़र डालें उनके विचारों पर....... विक्रम वर्मा (पूर्व खेलमंत्री) इस बार ओलंपिक खेलों में भारतीय खिलाड़ियों का प्रदर्शन अपेक्षाओं के अनुरूप नहीं रहा. हमने कई खेलों और खिलाड़ियों को चिन्हित किया था, पर सरकार बदल गई और वैसा कुछ भी नहीं हुआ जैसा कि हमने तैयार किया था. भारत के प्रदर्शन को बेहतर बनाने और भारत की झोली में ज्यादा पदक समेटने के लिए एफ़्रो-एशियन और एशियन खेलों में बेहतर प्रदर्शन के बाद हमने खास रणनीति तैयार की थी.
इतनी अपेक्षा मुझे आखिर तक थी कि भारतीय खिलाड़ी कम से कम एक स्वर्ण, एक रजत और एक कांस्य पदक जरूर जीत कर लौटेंगे. टेनिस को लेकर मैं बहुत आश्वस्त था कि इस खेल में स्वर्ण या कम से कम रजत पदक तो जरूर ही मिलेगा. हालांकि इन सारी चीजों का दोष खेलमंत्री या सरकार के मत्थे मढ़ना जल्दबाजी होगा क्योंकि मंत्रालय का काम है पैसा देना, बाकी की जिम्मेदारी फेडरेशन की होती है. हर खिलाड़ी की सुविधा और उसके प्रदर्शन का पर पैनी नजर रखने की ज़रूरत थी और ये काम ओलंपिक शुरू होने से चार-पाँच महीने पहले ही चालू हो जाना चाहिए था. खिलाड़ियों को जिन साधनों की आवश्यकता थी, मंत्रालय ने उन्हें वह उपलब्ध कराया पर प्रभावी प्रबंधन और मॉनिटरिंग के अभाव में हम ऐसा कुछ भी न कर सके, जिसकी इस बार अपेक्षा की जा सकती थी. ******************************************************************* सुखदेव सिंह ढींढसा (पूर्व खेलमंत्री) एक सिल्वर मेडल तो मिला है, पर पिछली बार की तुलना में देखिए तो ज्यादा फर्क नहीं आया है और इसकी वजह अनुशासन और प्रशिक्षण की कमी है. यह कितना हास्यास्पद है कि अमरीका का हॉकी से कोई वास्ता नहीं, बावजूद इसके भारतीय टीम को प्रशिक्षण के लिए अमरीका भेजा गया. जबकि नीदरलैंड और ऑस्ट्रेलिया में हॉकी की तैयारियों के लिए उचित मौसम और अच्छे स्टेडियम उपलब्ध हैं. इससे भी इनकार नहीं किया जा सकता कि खिलाड़ियों को और खेल को उतना फंड नहीं मिल पा रहा है, जितना की उसके लिए आवश्यक है. खराब प्रदर्शन के लिए वैसे तो तीनों (खिलाड़ी, फेडरेशन और सरकार) ज़िम्मेदार हैं, लेकिन सरकार और फेडरेशन की भूमिका ज्यादा महत्वपूर्ण होती है और दुर्भाग्य यह है कि लापरवाही भी इन्हीं में ज्यादा हुई हैं. साथ ही कार्पोरेट जगत को भी यह सोचना चाहिए कि इस देश में क्रिकेट के अलावा दूसरे भी कई खेल हैं. इन खेलों और खिलाड़ियों को भी महत्व दिया जाना चाहिए. ******************************************************************* विजय गोयल (पूर्व खेल राज्यमंत्री) इस बार के ओलंपिक में भी भारत का प्रदर्शन निराशाजनक ही रहा है, ऊपर से डोपिंग के मामले में भारत की बची-खुची साख को भी मिट्टी में मिला दिया और इससे हमें और भी अधिक निराश व शर्मिंदा होना पड़ा है. हालांकि खेलों में भारत का प्रदर्शन पहले की अपेक्षा थोड़ा सुधरा ह जिससे साबित होता है कि खिलाड़ियों में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बेहतर प्रदर्शन करने की और पदक पाने की क्षमता तो है लेकिन प्रबंधन और प्रशिक्षण में कमी के चलते हम पिछड़ जाते हैं.
जब हम प्रतिस्पर्धा में होते हैं तो खेल के साथ-साथ विज्ञान भी जुड़ जाता है. ऐसे में आपके उपकरण, खान-पान, साधन, तकनीकी, प्रशिक्षक, जैसे तमाम कारक महत्वपूर्ण हो जाते हैं और उनकी गुणवत्ता से खेल की गुणवता प्रभावित होती है. हमने अपने कार्यकाल के दौरान ऐसे तमाम पहलुओं पर खास तौर पर ध्यान दिया था. खिलाड़ियों ने जो भी मांग की, हमने उन्हें उपलब्ध कराया. अंजु बॉबी जॉर्ज को विदेशों में प्रशिक्षण के लिए भेजने का मसला रहा हो या राजवर्धन राठौर को अच्छी मशीनें उपलब्ध कराना, हमने खिलाड़ियों की हर आवश्यकता को पूरा किया. बावजूद इसके मैं खिलाड़ियों को दोष देने की बजाय सरकार और फेडरेशन को ही ओलंपिक में खराब प्रदर्शन के लिए जिम्मेदार मानता हूँ. हालांकि सुनील दत्त को खेलमंत्री के रूप में आए हुए इतना समय नहीं हुआ है कि उन्हें दोषी ठहराया जा सके. लेकिन नौकरशाहों की लापरवाही को नज़रअंदाज़ भी नहीं किया जा सकता. ******************************************************************* बूटा सिंह (पूर्व खेलमंत्री) यह कितना शर्मनाक है कि एक अरब से ज्यादा आबादी वाले देश में एक भी स्वर्ण पदक नहीं आ सका. मैं इस ओलंपिक में भारत के प्रदर्शन से काफ़ी दुखी और आहत हुआ हूँ. भारत में एशियाड खेलों के आयोजन के बाद इंदिरा गाँधी जी ने मुझे भारत का पहला खेलमंत्री बनने का दायित्व सौंपा था, इससे पहले खेल मंत्रालय स्वतंत्र रूप से नहीं होता था. दुखद यह है कि उस समय राजीव गाँधी के प्रयासों से जो स्टेडियम बने थे उनमें से कोई भी ठीक-ठाक हालत में नहीं है और न ही नए स्टेडियम बनाए गए हैं. खिलाड़ियों को दोष देने से कोई फायदा नहीं, क्योंकि खिलाड़ी तो वैसे ही तैयार होंगे, जैसा हम उन्हें तैयार करेंगे. असल बात यह है कि खिलाड़ियों के चयन से लेकर खेलों को बढ़ावा देने तक की हमारी नीतियों में ही दोष है. अगर भारतीय खेलों से सेना और रेलवे को हटा दिया जाए तो हम शून्य पर पहुंच जाएंगे. जो थोड़ी बहुत साख है, वह इन्हीं दोनों की बदौलत है. देखिए गलती वहीं से शुरू हो जाती है, जब हम विश्वविद्यालय स्तर पर खिलाड़ियों की खोज शुरू करते हैं. चाहिए तो यह कि बचपन के शुरूआती दिनों से ही खिलाड़ियों की पहचान और बच्चों में खेल के प्रति रूचि विकसित करनी चाहिए. राज्यों की खेलों के प्रति जिम्मेदारियों को भी दरकिनार नहीं किया जा सकता है क्योंकि देश के तमाम अंचलों में ऐसी जातीय संस्कृति हैं जहाँ तीरंदाजी या जिमनास्ट जैसे खेल जीवन पद्धति का हिस्सा हैं. आवश्यकता इन प्रतिभाओं को खोजने और बाहर लाने की है. |
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