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शनिवार, 04 अगस्त, 2007 को 21:42 GMT तक के समाचार
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'फ़िल्मों में अब मासूमियत नहीं दिखती'

रणधीर कपूर
वर्ष 1947 में जब हिंदुस्तान आज़ाद हुआ, उसी साल मेरा जन्म हुआ. मुझे उस समय की बातें याद नहीं हैं लेकिन इन साठ सालों में हिंदुस्तान ने बहुत प्रगति की है.

हम 1947 से लेकर आज तक स्वतंत्र हैं. देश में लोकतंत्र है. ये बहुत ही ख़ुशी की बात है.

मुझे अपने भारतीय होने पर गर्व हैं. साठ साल में तरक्की कर हम अपने कदमों पर खड़े हैं. भारत के हर क्षेत्र में विकास हुआ.

फ़िल्म उद्योग भी उसका अपवाद नहीं है. फ़िल्म बनाने की तकनीक, सिनेमैटोग्राफ़ी, साउंड आदि में बहुत सुधार हुआ है.

क़ाबिलियत के मामले में हम दुनिया के किसी भी देश से पीछे नहीं हैं.

दुख

 पैकेजिंग हो रही है. दुनिया बदल रही है. हमने भी दुनिया के साथ कदम से कदम मिलाया है. फ़िल्म देखने वाले भी बदल गए हैं. आजकल बन रही फ़िल्मों को सिनेमा हॉल में छह से लेकर 26 साल तक के लोग देख रहे हैं

फ़िल्मों की बात करें तो मुझे सिर्फ़ इस बात का दुख है कि पहले बनी फ़िल्मों में जो कहानी और मासूमियत थी वो चली गई है.

(भारत की आज़ादी के 60 बरस पूरे होने पर हम ऐसे लोगों से आपको रूबरू करवा रहे हैं जो भारत की आज़ादी के साथ-साथ ख़ुद भी 60 वर्ष के हो चुके हैं. इसी श्रंखला में पढ़िए पिछले 60 बरसों के दौरान भारतीय सिनेमा की स्थिति पर 1947 में जन्मे फ़िल्म अभिनेता रणधीर कपूर की राय और दीजिए अपनी प्रतिक्रिया...)

एक तरह से शरीर तो अब बहुत उम्दा है लेकिन जो आत्मा थी वो अब नहीं रही. तकनीक के मामले में हमने तरक्की की है.

अब अमरीका और इंग्लैंड भी तो हैरी पॉटर बना रहा है. अब ‘गॉन विद द विंड’ या ‘साउंड ऑफ म्यूज़िक’ नहीं बन रही है. यह बदलाव तो सारी दुनिया में आए हैं और हिंदुस्तान में भी आए हैं.

आर के स्टूडियो से कई अच्छी फ़िल्में निकलीं

मुझे लगता है कि हमने 1950 या 1960 में जो रोमांटिक फ़िल्में बनाईं उनमें जो गीत और कहानियाँ थीं वैसी फ़िल्में आज नहीं बन रही हैं.

ग्लैमर तो तब भी था-मधुबाला भी ख़ूबसूरत थीं. आज ग्लॉस यानी ऊपरी चमक का ज़माना है.

पैकेजिंग हो रही है. दुनिया बदल रही है. हमने भी दुनिया के साथ कदम से कदम मिलाया है. फ़िल्म देखने वाले भी बदल गए हैं. आजकल बन रही फ़िल्मों को सिनेमा हॉल में छह से लेकर 26 साल तक के लोग देख रहे हैं.

उससे अधिक की उम्र वाले व्यस्त रहते हैं और टेलीविज़न पर फ़िल्में देखते हैं. तो आजकल ‘यूथ ओरिएंटेड’ यानी युवाओं के लिए फ़िल्में बन रही हैं.

तकनीक

हिंदी फ़िल्म उद्योग ने बहुत कुछ हासिल किया है. आज हम किसी भी अमरीकी तकनीक के साथ कदम से कदम मिलाकर चलते हैं.

कुछ फ़िल्में बहुत अच्छी आई हैं. 'कृष' और 'धूम-2' में तकनीक बहुत अच्छी थी. इन फ़िल्मों की फोटोग्राफ़ी, साउंड और स्पेशल इफ़ेक्ट्स दुनिया की किसी भी फ़िल्म से मुकाबला कर सकते हैं.

आजकल सिंगल थियेटर या निम्न मध्य वर्ग के लिए फ़िल्में नहीं बन रहीं. आजकल के फ़िल्म निर्माता 150-200 रुपए वाले टिकट ख़रीदने वाले के पीछे दौड़ रहे हैं. जो दस रुपए का टिकट ख़रीदकर फ़िल्में देखता था वह टेलीविज़न पर चला गया है.

पहले हम पारिवारिक फ़िल्में बनाते थे जिन्हें सोशल या सामाजिक फिल्में कहते थे. मद्रास और मुंबई में ऐसी बहुत सारी फ़िल्में बनती थीं. वर्ष 1950 से 1970 तक बहुत सारी ऐसी फ़िल्में बनीं और लोकप्रिय भी हुईं.

सास-बहू वाले टीवी धारावाहिकों की थीम हमारी फ़िल्मों से ही ली गई है. उनमें मध्य वर्ग के मूल्य, भारतीय सभ्यता की झलक मिलती थी. इसीलिए उनमें एक आत्मा थी. वो सब अब टीवी पर फ़्री देखने को मिलता है.

आजकल फ़िल्मी हीरो की लोकप्रियता ‘बेसबॉल कैप्टन’ की तरह है. ऐसा तो हिंदुस्तान में कभी नहीं था. राजकपूर, राजेंद्र कुमार, दिलीप कुमार और देवानंद कभी भी इतने लोकप्रिय नहीं थे.

ये नया दौर शुरू हुआ है जो पश्चिमी देशों की नकल है.

स्तर

मेरे हिसाब से सिनेमा का स्तर नीचे गया है. लेकिन प्रोड्यूसर आजकल ज़्यादा पैसा कमा रहा है. मुझे दुख की बात ये लगती है कि कहानियाँ बदल गई हैं. फ़िल्मों में भारतीय सभ्यता और भारतीयता नहीं दिखाई देती.

आजकल के गाने, गीत और डांस में वह बात कहाँ दिखती है? ज़माना बदल गया, बच्चे बदल गए, देखने वाले बदल गए, दौर बदल गया और फ़िल्म बनाने वाले भी बदल गए.

मेरे हिसाब से ‘मदर इंडिया' इस देश में बनने वाली महान फ़िल्मों में से एक है. मैं आपको एक घटना बताता हूँ.

मदर इंडिया फ़िल्म का एक दृश्य
महबूब ख़ान की 'मदर इंडिया' एक क्लासिक फ़िल्म थी

मैं किसी कार्यक्रम में गया था. उस कार्यक्रम में मैंने कहा कि भारतीय फ़िल्में अच्छी हैं, कई फ़िल्में बनी हैं. उस दौर की कई फ़िल्मों का मैंने नाम लिया.' मदर इंडिया' का भी का भी नाम लिया.

एक बच्चे ने कहा, "मैं आपसे सहमत नहीं हूँ रणधीर कपूर साहब, मेरे हिसाब ये ग़लत फ़िल्म है. नर्गिस जी का बहुत अच्छा चित्रण था, एक्टिंग अच्छी थी पर करेक्टर बहुत ग़लत था."

मैंने पूछा ग़लत कैसे बेटा? वो बोला, "ये औरत कन्हैया लाल से शादी कर लेती तो कहानी कुछ और होती. कन्हैयालाल बदसूरत और बूढ़ा था तो क्या हुआ? वो अमीर आदमी था. वो बच्चे पढ़ लिखकर बहुत बड़े आदमी बन जाते. लेकिन नर्गिस जी ने अपने बच्चों को बैल बनाया, हल में जोत दिया. एक को डाकू बनना पड़ा और फिर नर्गिस जी को उसे गोली मारनी पड़ी. अगर वो कन्हैया लाल से शादी कर लेती तो वो उसके बच्चे भी शायद धीरूभाई अंबानी, मुकेश अंबानी और अनिल अंबानी बनते."

नज़रिया

यह उस बच्चे का नज़रिया था.

मुझे समझ ही नहीं आया कि उस बच्चे को क्या कहूँ. एक बच्चे ने कहा, "आप कहते हैं कि राजकपूर की 'संगम' बहुत अच्छी फ़िल्म थी. लेकिन वो भी ग़लत फ़िल्म है. वैजयंती माला की समस्या क्या थी. उन्हें राज कपूर को केवल इतना ही बताना था कि भाई रहने दो मुझे राजेंद्र कुमार से प्यार है. आप केवल मेरे दोस्त हैं."

 सास-बहू वाले टीवी धारावाहिकों की थीम हमारी फ़िल्मों से ही ली गई है. उनमें मध्य वर्ग के मूल्य, भारतीय सभ्यता की झलक मिलती थी. इसीलिए उनमें एक आत्मा थी. वो सब अब टीवी पर फ़्री देखने को मिलता है

अब मैं क्या कहूँ. आजकल दुनिया के बच्चों का नज़रिया बदल गया है. इसलिए कहानियाँ भी बदल गई हैं. शरतचंद्र और गुरुदेव टैगोर ने भी कहानियाँ लिखी हैं पर आज के बच्चे क्या उन चीज़ों को मानते हैं?

सत्यजीत रे ने बहुत अच्छी फ़िल्में बनाईं.' पांथेर पांचाली' और 'अपूर संसार' क्लासिक फ़िल्में थी. लेकिन मैं यह नहीं कह सकता कि आज के ज़माने में उनका कितना महत्व होता. आजकल के समझदार लोगों को तो वो फ़िल्म ज़रूर पसंद आएगी.

सभी का झुकाव मनोरंजक फ़िल्मों की तरफ रहता है. सारी फ़िल्में म्यूज़िकल होती हैं. फ़िल्मों में गाने होते हैं, नाच होता है, ख़ूबसूरत लड़का-लड़की होते हैं, वो अच्छे कपड़े पहनते हैं. कभी स्विटज़रलैंड, न्यूज़ीलैंड और कभी अमरीका में नाचते हैं.

कुछ अच्छी फ़िल्में भी बनती हैं. मुझे संजय लीला बंसाली की 'ब्लैक' फ़िल्म बहुत पसंद है लेकिन बॉक्स ऑफ़िस पर यह बहुत सफल नहीं हुई. ऐसा ही चलता रहेगा. ऐसा था, ऐसा है और ऐसा ही रहेगा.

आज फ़िल्म बनाने के लिए करोड़ों रुपए लगते हैं और जब तक ढेर सारे लोग फ़िल्म को नहीं देखेंगे तब तक पैसा वापस नहीं आ सकता.

श्याम बेनेगल और गोविंद निहलानी बहुत अच्छी फ़िल्में बनाते हैं. मैं इन लोगों की बहुत इज़्जत करता हूँ. हमारे देश में ऐसी फ़िल्में देखने वाले कम लोग हैं.

इन लोगों को सस्ती फ़िल्में बनानी चाहिए. श्याम बैनेगल ने 'सुभाषचंद्र बोस' फ़िल्म बनाई थी. मुझे बहुत अच्छी लगी लेकिन कितने लोगों ने उसे देखा. नाच-गाना देखने की आदत हो गई है. हमारी युवा पीढ़ी ऐसी गंभीर फ़िल्में देखती नहीं है.

नई पीढ़ी

 सभी का झुकाव मनोरंजक फ़िल्मों की तरफ रहता है. सारी फ़िल्में म्यूज़िकल होती हैं. फ़िल्मों में गाने होते हैं, नाच होता है, ख़ूबसूरत लड़का-लड़की होते हैं, वो अच्छे कपड़े पहनते हैं. कभी स्विटज़रलैंड, न्यूज़ीलैंड और कभी अमरीका में नाचते हैं

शाहरुख़ ख़ान, आमिर ख़ान, सलमान ख़ान अच्छे एक्टर हैं. मैं इस नई पीढ़ी के काम करने से बहुत ख़ुश हूँ. सब अच्छे कलाकार हैं और जिस किस्म की फ़िल्में बन रही हैं उसमें ये अच्छा ही काम कर रहे हैं.

अगर मैं अपनी बात करुँ तो 1970 के दशक में एक्शन फ़िल्म का दौर आ गया था. न मेरी शक्ल डाकू वाली थी न ही पुलिस इंस्पेक्टर वाली.

जिस रॉल की मुझे चाह थी वैसा फ़िल्म बन नहीं रही थीं. 'शोले' के बाद हर आदमी डाकू बन गया, गब्बर सिंह बन गया, पुलिस इंस्पेक्टर बन गया.

अब मैं अच्छे इंसान का किरदार ज़िंदगी में करना चाहता हूँ. एक अच्छे बेटे, अच्छे भाई, अच्छे बाप का किरदार करना चाहता हूँ और इसी कोशिश में लगा हुआ हूँ.

हम जिस तरह की फ़िल्में बनाते थे वैसे ही बनाएँगे क्योंकि हमारी ट्रेनिंग उस तरह की है. आजकल के ज़माने के अनुसार उसमें थोड़े सुधार कर लेंगे. एक फ़िल्म बना रहे हैं जिसमें ऋषि कपूर का बेटा रणवीर काम कर रहा है. यह एक सॉफ्ट रोमांटिक लव स्टोरी है. ख़ाका 'आरके स्टाइल' का रहेगा पर फ़िल्म आजकल की समस्याओं पर होगी.

(वेदिका त्रिपाठी से बातचीत पर आधारित)

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