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गुरुवार, 02 अगस्त, 2007 को 13:55 GMT तक के समाचार
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नायिकाओं की भूमिका बदली, जगह नहीं

मीना कुमारी
मीना कुमारी और उनकी समकालीन कई अभिनेत्रियों ने अभिनय का लोहा मनवाया

एक पोस्टर याद में बार-बार चमक जाता है जिसमें एक सजी-सजाई युवती, सेहरा और जेवर से लैस किसी चूड़ीदार पजामे में गिरफ्तार पाँव को पूरी ताक़त से थामे हुए है.

ज़ाहिर था कि ‘गुमाश्ता’ नामक इस फ़िल्म में ऐन शादी के वक़्त हीरो किसी बात पर (बातें बहुत सी होती थीं, बेवफाई का इल्ज़ाम, दहेज़ आदि-आदि) अपनी नवब्याहता पत्नी को छोड़कर जाने पर आमादा था और वो थी कि उसके पैरों से लिपटी रहम की भीख माँग रही थी.

"ये एक मज़लूम लड़की है जो इत्तेफ़ाक़न मेरी पनाह में आ गई है". यह संवाद फ़िल्म ‘पाकीज़ा’ में राजकुमार का था.

भारतीय फ़िल्मों की नायिका दशकों से ‘मजलूम’ होने का बोझ ढोती आ रही हैं और ये सिलसिला कुछ अर्थों में अभी भी क़ायम है.

जबकि ऐसा बिल्कुल नहीं है कि फ़िल्मों में आज़ादी के पहले या बाद में नायिकाओं का महत्व कुछ कम रहा हो.

1913 में जब भारतीय फ़िल्मों के जनक दादा साहब फाल्के ने पहली फ़िल्म ‘सत्यवादी-हरिश्चद्र' बनाई थी तभी उन्हें महसूस हो गया था कि बिना नायिका के फ़िल्म बनाना असंभव है. इसलिए उन्होंने पुरुषों को ही महिला पात्रों में पेश किया.

फिर जैसे-जैसे वक़्त गुज़रा नायक और नायिका फ़िल्मों की दो ऐसी आँखें बन गए जिनके बिना फ़िल्म निर्माता को सोचना भी असंभव था.

आज़ादी से पूर्व यानी 40 के दशक में देविका रानी एक कलाकार के रूप में स्थापित हो ही चुकी थीं. उनकी ‘जन्मभूमि’, 'अछूत कन्या' और 'कर्म' आदि फ़िल्में ख्याति अर्जित कर चुकी थीं.

शोभना समर्थ तो 'रामराज्य', 'भरतमिलाप', 'रामबाण', 'रामविवाह' जैसी फ़िल्मों में अभिनय कर सदा के लिए जनमानस में एक देवी के रूप में प्रतिष्ठित हो गईं थीं.

 चमत्कारी प्रतिभाशाली तारिकाओं का वज़न कहानी के तराजू में हमेशा ही नायक से हल्का रहा

'शकुंतला' में जयश्री, 'सूरदास' और 'तानसेन' में खुर्शीद, 'कादंबरी' और 'पर्वत पर अपना डेरा' में बनमाला, 'पृथ्वीवल्लभ', 'अयोध्या का राजा' में दुर्गा खोटे, 'दुनिया न माने' में शांता आप्टे के अलावा साधना बोस, सविता देवी, स्वर्णलता, लीला चिटनिस, कज्जन बाई और शमीम जैसी तारिकाएँ प्रसिद्धि के शिखर पर थीं.

नूरजहाँ, नरगिस, कामिनी कौशल, मीना शौरी, रेहाना, बेगम पारा, सुरैया, मुमताज़ शांति और निगार जैसी तारिकाएँ अपने आगमन का इशारा कर चुकी थीं.

लेकिन इन सब चमत्कारी प्रतिभाशाली तारिकाओं का वज़न कहानी के तराज़ू में हमेशा ही नायक से हल्का रहा.

'दुनिया न मानें' की शांता आप्टे को छोड़ दें तो शोभना समर्थ से लेकर ‘तदबीर’ की नरगिस या ‘तानसेन’ की खुर्शीद तक सभी नायिकाएँ वैसी ही गढ़ी गईं हैं जैसा हमारा समाज आज तक चाहता आया है.

त्यागमयी, स्नेही, रिश्तों को भरपूर जीने और आदर देने वाली लेकिन नायक की राह में आँचल बिछाए बैठी एक आदर्श नारी जो बेटी,पत्नी और बहन है. इसके साथ ही ख़ूबसूरत होना भी उसकी मजबूरी रहा है.

आज़ादी के बाद भी

वहीदा रहमान और गुरुदत्त
नायिकाओं की वज़नदार भूमिका के बावजूद नाम नायकों का आता रहा

आज़ादी के बाद भी परिदृश्य कुछ ख़ास बदला नज़र नहीं आता.

हाँ, 1947 में ही प्रदर्शित किशोर साहू की ‘सिंदूर’ फ़िल्म ने कुछ सवाल उठाए और एक विधवा के पुनर्विवाह के लिए दलील पेश की. फ़िल्म समीक्षकों ने इस प्रयास को सराहा पर सिनेमा निर्माता प्रेम कहानियों में ही खोए रहे.

‘मिर्ज़ा साहिबा’, ‘जुगनू’, ‘शहनाई’, ‘दर्द’, ‘नील कमल’ और उसके बाद ही ‘मेला’, ‘अनोखी अदा’, ‘प्यार’, और ‘नदिया के पार’ ने दर्शकों को सुमधुर गीत-संगीत में ऐसा डुबोया कि बरसों सिनेमा प्रेमियों ने उस माहौल से निकलने की इच्छा ही ज़ाहिर नहीं की.

‘स्वयंसिद्धा’ एक अकेली फ़िल्म थी, इस दशक की जिसने दर्शकों को एक बार फिर कुछ सोचने को मजबूर कर दिया था.

नरगिस, कामिनी कौशल, मधुबाला और गीताबाली के साथ मीना कुमारी और नलिनी जयवंत भी अपने अभिनय से दर्शकों को प्रभावित कर चुकी थीं, पर फिर भी 'अंदाज़' दिलीप कुमार की ही फ़िल्म मानी जाती रही, 'बरसात' राजकपूर की और 'महल' अशोक कुमार की.

गीता बाली, मधुबाला और नरगिस के साथ ही तारिकाओं के संवाद बोलने का अंदाज़ बदला. नायकों में ये पहल मोतीलाल और याकूब दशकों पहले कर चुके थे. नायिकाओं की संवाद अदायगी में स्वाभाविकता अब आती जा रही थी.

राजकपूर और महबूब ख़ान की नायिकाएँ

राजकपूर को यह श्रेय ज़रूर देना चाहिए कि उनकी नायिकाएँ किसी भी अर्थ में हीरो से कमतर नहीं रहीं. ‘आवारा’ हो या ‘श्री 420’, ‘हिना’ या ‘सत्यम शिवम सुंदरम’. वे औरत के उसी रूप में पेश करते रहे जिस रूप में वह हमारे समाज की देहरी के अंदर और बाहर रही हैं.

उन्होंने हर बार नायिका को ही अपना विषय बनाया और सिद्घ कर दिया कि नायिका भी फ़िल्म की जान बन सकती हैं.

‘संगम’ की कहानी हीरोइन इर्द-गिर्द ही धूमती रहती है लेकिन उसकी व्यथा समाज की बंदिशों के भीतर अंत तक सिसकती ही रह जाती है. नायिका त्याग की मूर्ति बनी रहती है और कभी विद्रोह का झंडा नहीं उठाती.

संगम फ़िल्म का एक दृश्य
लेकिन संगम की नायिका भी विद्रोह नहीं कर पाती

महबूब खाँ एक अदभुत फ़िल्म निर्माता थे. उन्होंने 40 के दशक में हीं ‘औरत’ नामक नायिका प्रधान फ़िल्म बनाई थी और फिर 1957 में उसी को ‘मदर इंडिया’ के नाम से बनाकर एक इतिहास रच दिया था.

नरगिस उन अभिनेत्रियों में से थी जिनकी अभिनय क्षमता ऐसी ही भूमिकाओं में आँकी जा सकी और उन्हें कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पुरस्कारों से नवाज़ा गया.

कमाल अमरोही की ‘महल’, ‘दायरे’, ‘पाकीज़ा’ और 'रज़िया सुल्तान' सभी महिला प्रधान फ़िल्में थीं, और मीना कुमारी को उन्होंने अपनी अभिनय क्षमता के चरम तक पहुँचा कर ही दम लिया.

मीना कुमारी उन गिनी-चुनी नायिकाओं में से रहीं जिन्होंने अपने रोल के महत्व को देखकर ही फ़िल्में साइन कीं और अपने अभिनय में जीवंतता लानें के लिए कई-कई रीटेक भी दिए. राखी भी एक प्रतिभावान अभिनेत्री थी, पर उन्हें बहुत मार्क नहीं मिले.

हाशिए में नायिकाएँ

सातवें दशक के अंत तक नायिका किसी भी मायने में नायक से कम नहीं रहा करती थी, यानी उसे फुटेज बराबर मिलना था, पर चरित्र चित्रण में वो अभी भी वही ‘मजलूम’ लड़की थी जिसे मर्द की पनाह चाहिए थी.

‘काला पानी’, ‘मधुमती’, ‘पैगाम’, ‘दिल अपना और प्रीत पराई’, ‘गंगा-जमुना’, ‘हम दोनों’, ‘जिस देश में गंगा बहती है’, ‘पूरब पश्चिम’, ‘आरजू’, ‘आराधना’, ‘मेरा नाम जोकर’, ‘अमर प्रेम’, ‘बंदिनी’, ‘कोरा काग़ज’ और ‘खिलौना’ जैसी अनेक फ़िल्में हैं. जिन्हें उनकी नायिकाओं के लिए याद किया जाता है.

शबाना आज़मी
स्मिता पाटिल के अलावा कोई शबाना की ऊँचाई तक नहीं पहुँच सका

'सुजाता' और 'बंदिनी' की नूतन अभिनय के किसी भी मानदंड पर खरी ही उतरेगी.

‘आराधना’ और ‘अमर प्रेम’ की ‘शर्मिला’, ‘पाकीज़ा’ और ‘दिल अपना और प्रीत पराई’ की मीना कुमारी, ‘देवदास’ और ‘मधुमती’ की वैजयंती माला, ‘हम दोनों’ की साधना, ‘गाइड' और ‘चौदहवीं का चाँद’ की वहीदा रहमान, ‘खिलौना’ और ‘रोटी’ की ‘मुमताज़ तथा ‘कोरा काग़ज' और ‘उपहार’ की जया भादुड़ी क्या कभी भुलाई जा सकती हैं?

लेकिन कड़वा सच ये भी है कि वे याद की जाती हैं तो रिश्तों के प्रति अपनी वफ़ादारी, अपने त्याग, बलिदान, प्यार और मानवीय भावनाओं के लिए न कि किसी सामाजिक बुराई के प्रति विद्रोह के लिए.

लेकिन 80 के दशक में तो नायिका की आत्मा ही जैसे मर गई.

अमिताभ बच्चन के आगमन के साथ ही नायिका की भूमिका कमज़ोर से कमज़ोर होती गई. न गाने में जान रही न रूमानी नज़ाकत.

बेकार के मारधाड़ में नायिका कहीं हाशिए पर फिसल गई. कुछेक फ़िल्में जैसे ‘अभिमान’ या 'मिली' जया भादुड़ी पर मेहरबान ज़रूर हुईं, पर इसी बीच परवीन बाबी और जीनत अमान जैसी अभिनेत्रियों को केवल अपने जिस्म का जलवा दिखाकर ही संतुष्ट होना पड़ा.

अलबत्ता ‘सीता और गीता’ और ‘गुड्डी’ जैसी एक दो फ़िल्मों ने नायिका को पतन से रोका.

नई भूमिका

नब्बे के दशक की शुरुआत में आई ‘अर्थ’ ने जनमानस को झकझोर कर रख दिया.

महेश भट्ट की इस फ़िल्म ने जहाँ एक मशहूर अभिनेत्री का मर्द पर हद से ज़्यादा आश्रित होना दिखाया वहीं अंत में बरसों से परित्यक्ता पत्नी को आत्मसम्मान से गौरवांवित होना भी दिखाया.

शबाना आज़मी के रूप में हमें एक साधरण चेहरे वाली असाधारण अभिनेत्री मिली, जिसका व्यक्तित्व निराला था. स्मिता के बाद कोई भी अभिनेत्री उसकी ऊँचाईयों तक नहीं पहुंच पाई है.

उमराव जान में रेखा
रेखा ने अभिनय और ख़ूबसूरती के नए प्रतिमान स्थापित किए

‘गॉड मदर’ में शबाना जिस तरह अपनी भूमिका को जीती हैं वह अपने आपमें एक उदाहरण है.

‘सुबह’ और ‘भूमिका’ भी इसी दशक में पर्दे पर आईं और स्मिता पाटिल के चमत्कारिक अभिनय क्षमता का लोहा मनवा गईं.

एक ग्लैमर गर्ल की छवि से आक्राँत डिंपल ने ‘जख्मी औरत’ और ‘रुदाली’ और ‘लेकिन’ से अपनी छवि को एक ऐसा रूप दिया कि वे आज भी परदे पर आ जाएँ तो लोग गंभीरता से देखते हैं.

इसी बीच हेमा मालिनी के साथ माधुरी और श्रीदेवी ने भी अपनी रूपछटा तो बिखेरी. कुछ यादगार फ़िल्में भी दीं.

श्रीदेवी की ‘सदमा’ और ‘लम्हे’, ‘माधुरी की ‘मृत्युदंड’ और ‘पुकार’, हेमा की ‘शोले’ और ‘एक चादर मैली सी’.

‘सावन भादो’ में एक रेखा नाम की बेहद अनगढ़ सी लड़की ने जब फ़िल्मों में प्रवेश किया था तब किसी को पता नहीं था कि ये लड़की आगे जाकर अभिनय ही नहीं रूप और शरीर सौष्ठव में भी आने वाली नायिकाओं का रोल मॉडल बन जाएँगीं.

रेखा की ‘ख़ूबसूरत’ और ‘उमराव जान’ जैसी कुछ फ़िल्में ऐसी हैं जिन्हें बार-बार देखकर भी जी नहीं भरता. उसके ‘उमराव जान’ की कोई भी नकल दर्शकों को स्वीकार नहीं. ये विश्वसुंदरी ऐश्वर्या के साथ-साथ सभी के सामने साबित हो चुका है.

नई सदी की नायिकाएँ

21वीं शताब्दी के पूर्व ही कुछ अतिस्वभाविक व अभिनय कुशल तारिकाओं ने फ़िल्म संसार में क़दम रखा. जूही, काजोल, रानी, प्रिटी ज़िंटा, करीना, करिश्मा, एश्वर्या और सुष्मिता सेन.

काजोल ‘दुश्मन’ और ‘बाज़ीगर’ में कुछ अलग क़िस्म की भूमिकाओं में दिखीं. पर नायक का सहारा यहाँ भी चाहिए था. ‘दिल वाले दुल्हनिया ले जाएंगे’ में अपने प्यार को पाने के लिए सारी चालें हीरोइन ने ही चलीं पर अंत में जीत शाहरुख की ही दिखाई गई. फ़िल्म का टाइटिल भी यही भेदभाव बरतता है.

जूही, रानी सब अच्छी अभिनेत्री हैं. खासकर रानी ने 'ब्लैक' में कमाल किया, पर उसके कमाल के पीछे कहीं अमिताभ बच्चन का चेहरा झाँकता रहा. अधिकांश हिंदी फ़िल्मों में हीरोइन आज भी मीठी, मधुर, प्यारी और त्यागमयी ही है. रवीना टंडन की ‘सत्ता’ या गुलजार की 'हू तू तू' बेशक महिलाओं का राजनीति में प्रवेश और वहाँ के रंग में रंग जाना अच्छे ढंग से प्रस्तुत करते हैं.

ब्लैक
ब्लैक में रानी ने अभिनय का कमाल दिखाया लेकिन उस पर भी अमिताभ का साया पड़ गया

लेकिन अगर एक ओर काजोल और रानी व एश्वर्या हैं तो दूसरी ओर विपाशा बसु के नक्शेकदम पर चलती अनेकानेक ऐसी तारिकाएँ हैं जो कम से कम कपड़े पहन कर हीरो के साथ अंतरंग दृश्य देकर आगे बढ़नें की कोशिश कर रही हैं.

आशा पारेख, साधाना, सायरा बानो, तनुजा और माला सिन्हा जैसी मासूम हीरोइनों की जगह अंडरवर्ल्ड से जुड़ी दृढ़ निश्चयी, संवेदना शून्य नायिकाएँ ले रही हैं. पर अंदर से वो आज भी कमजोर ही हैं.

'गैंगस्टर' की हीरोइन, अपने प्रेमी को मौत की नींद सुला ख़ुद चैन से सो नहीं पाती, उसे केवल एक ही रास्ता नज़र आता है और वो है आत्महत्या का. मल्लिका शेरावत और वैसी ही अनेक नायिकाएँ अब हीरोइन में ‘चीनी कम’ होने का अहसास दिला रही हैं जैसा कि ‘चीनी कम’ की नायिका तब्बू को देखकर महसूस हुआ है.

‘चीनी कम’ की नायिका कुछ अलग है. नए जमाने की लड़की बाप के सत्याग्रह से विचलित ज़रूर है पर टूटती नहीं.

तो क्या ज़माना बदलेगा? उम्मीद नहीं क्योंकि आज भी भारतीय दर्शक अपनी हीरोइन से यही कहना चाहता है, "आपके पाँव देखे बहुत खूबसूरत हैं, इन्हें ज़मीन पर न रखिएगा मैले हो जाएँगे..."

उसे दीप्ति नवल की 'कथा', 'चश्मेबद्दूर' या 'गोलमाल' जैसी फ़िल्में पसंद तो आती हैं, पर ये परंपरा आगे बढ़ नहीं पाती. शबाना और स्मिता मील का पत्थर बनी हैं, पर उस रास्तों से गुज़रना आम आदमी और साथ ही फ़िल्म निर्माता गवारा नहीं करता.

तो क्या कोंकणा सेन और विद्या बालन अकेली ही अपनी राह चलेंगी या फिर विपाशा बसु और ऐसी ही अनेक दिशाहीन नायिकाओं को अपने गिरोह में शामिल कर कोई नया धमाका कर बैठेंगी?

उम्मीद रखनी चाहिए कि ऐसा हो.

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