|
'फ़िल्मों में अच्छी कहानियों की कमी है' | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
हाल में जाने माने अभिनेता ओम पुरी ने लंदन में इंडिया-ईयू फ़िल्म इनिशिएटिव के संवाद में हिस्सा लिया. इस दौरान ओम पुरी ने बीबीसी के साथ बॉलीवुड और अपने फ़िल्मी कैरियर पर खुलकर बातचीत की. पेश है बातचीत के कुछ मुख्य अंश: आपका फ़िल्मों और रंगमंच के साथ एक अटूट रिश्ता बन गया है. जीवन के इतने लंबे सफ़र के बाद आप जब पीछे झांकते हैं तो कैसा महसूस होता है? पीछे का हिस्सा सोचें तो अच्छा लगता है. लेकिन अभी का सोचें तो थोड़ा अफ़सोस होता है कि हम वो नहीं कर रहे जो हम करते थे. मतलब जिस तरह की फ़िल्में हमने 80 के दशक में कीं – तमस, आक्रोश अर्धसत्य, आरोहण, डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया.. तो वो जो काम था, आजकल हम नहीं कर पा रहे हैं. और इसलिए नहीं कर पा रहे हैं कि ऐसी फ़िल्में और चीज़े बन नही रहीं हैं. तो इस तरह की चीज़ों को फिर से शुरु करने के लिए आप कोई पहल क्यों नहीं करते. प्रोड्यूसर या डॉयरेक्टर के तौर पर आप ऐसी फ़िल्मों का निर्माण फिर से शुरु कर सकते हैं? प्रोड्यूसर बनने के लिए आपके पास माल होना चाहिए. और हम जिस तरह की फ़िल्में करते आए हैं. उनमें इतना धन नहीं था. मतलब हमको एक फ़िल्म करने के पाँच करोड़ नहीं मिलते हैं. जिनको पाँच करोड़ मिलते हैं, वो बना सकते हैं. हम नहीं बना सकते. फिर ऐसी स्थिति को देखते हुए आप किस तरह के रोल करना पसंद करेंगे? अभी तो हमें जो भूमिकाएँ दी जाती हैं, हम उनमें से चुनाव करते हैं. जो थोड़ा सा बेहतर होती हैं, हम उन्हे स्वीकार कर लेते हैं. आपको भारतीय और विदेशी, दोनों तरह की फ़िल्में करने का अनुभव है. आपके अनुसार भारतीय फ़िल्में कहाँ और किस क्षेत्र में विदेशी फ़िल्मों से मात खा जाती हैं? देखिए तकनीकी तौर पर तो काफ़ी सुधार हुआ है हिंदुस्तान में. लेकिन विषय के तौर पर हम बहुत पीछे हैं उनसे. मतलब अच्छी कहानियाँ और अच्छे विषय, ये सबसे बड़ी कमी है हमारी फ़िल्मों में. अगर हम रंगमंच की बात करें तो विदेशों में, खासतौर पर यहाँ लदंन में, थिएटर काफ़ी लोकप्रिय है. एक बड़ी संख्या में इनके चाहनेवाले हैं और रंगमंच का स्तर काफी व्यापक है. लेकिन भारत में अब भी थिएटर जूझ रहा है. लोगों का झुकाव फ़िल्मों की तरफ ज़्यादा है. इसके बारे में क्या किया जा सकता है? हिंदुस्तान में बंगाली थिएटर, मराठी थिएटर और गुजराती थिएटर – ये तीन थिएटर हैं जो प्रोफेशनल थिएटर हैं जहाँ लोग टिकट लेकर नाटक देखने जाते हैं. उत्तर में इसका चलन इतना नहीं है. स्थिति पहले से बेहतर तो है लेकिन अब भी आम जनता थिएटर देखने नहीं जाती. उसके बारे में मेरा मानना है कि अगर म्यूज़िकल्स की तरफ ध्यान दें. जैसा कि मैने एक इंटरव्यू में भी पहले कहा था कि हमारे जो आर्ट फ़िल्म यानि समानांतर फिल्मों के जो निर्माता हैं, उन्हे अपनी हिंदुस्तानी शैलियों का इस्तेमाल करना चाहिए, जैसा कि बिमल रॉय ने किया, वी शांताराम ने किया या महबूब खान ने किया, वो शैली हिदुंस्तानी शैली है और लोगों को उसकी आदत है. और उसमें कोई बुराई नहीं है क्योंकि गाने के ज़रिए भी आप अच्छी बात कह सकते हैं. तो इसी तरह थिएटर में भी अगर उस फॉर्म का इस्तेमाल आप करते हैं तो ज्यादा लोग उसकी तरफ आकर्षित होंगे और नाटक देखने आएंगे. इस तरह से उनके दर्शक बढ़ेंगे. आपका झुकाव किसकी तरफ ज़्यादा है – थिएटर की तरफ या फ़िल्मों की तरफ और क्यों? सच कहूँ तो, हालांकि कि मैं थिएटर से आया हूँ और मुझे बहुत लगाव है थिएटर से. लेकिन थिएटर की पहुँच बहुत छोटी है. तो इसलिये मैं बेहतर समझता हूँ कि मैं फ़िल्म के ज़रिए लोगों तक पहुँचू. फ़िल्मों के ज़रिए बहुत लोगों तक पहुँचा जा सकता है. ये बिल्कुल वैसा है जैसे आप अगर खेती करते हो, किसान हो और पहले आप हल चलाते थे लेकिन अब ट्रैक्टर आ गया है. तो मैं ट्रैक्टर का इस्तेमाल कर रहा हूँ. |
इससे जुड़ी ख़बरें ओम पुरी और नसीर के साथ गपशप02 जुलाई, 2007 | मनोरंजन एक्सप्रेस ओम पुरी को 'ऑर्डर ऑफ़ ब्रिटिश एंपायर'23 जुलाई, 2004 | मनोरंजन एक्सप्रेस 'शाहरुख़ वाले किरदार चाहता हूँ, कौन देगा?'29 सितंबर, 2006 | मनोरंजन एक्सप्रेस ज़िया उल हक़ बनेंगे ओम पुरी06 अक्तूबर, 2006 | मनोरंजन एक्सप्रेस इंटरनेट लिंक्स बीबीसी बाहरी वेबसाइट की विषय सामग्री के लिए ज़िम्मेदार नहीं है. | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
| ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||