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'शाहरुख़ वाले किरदार चाहता हूँ, कौन देगा?' | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
कला फ़िल्मों से शुरुआत करके खलनायक और हास्य भूमिकाओं तक और थिएटर से टेलीविज़न के रास्ते विदेशी फ़िल्मों तक ओम पुरी कोई 200 फ़िल्मों का सफर तय कर चुके हैं. वे न केवल यथार्थवादी फ़िल्मों में काम करना पसंद करते हैं बल्कि उनकी सोच भी यथार्थवादी हैं. वे मानते हैं कि भारतीय फ़िल्मों को विदेशों में पसंद किया जा रहा है लेकिन विदेशी उन्हें नहीं देख रहे हैं, बल्कि विदेशों में बसे भारतीय ही उन्हें देखते हैं. ओम पुरी अपने काम से तो पूरी तरह संतुष्ट हैं लेकिन कभी-कभी बिग बी से इन्हें मीठी ईर्ष्या भी ज़रूर होती है. मुंबई में वेदिका त्रिपाठी ने उनसे लंबी बातचीत की. प्रस्तुत हैं प्रमुख अंश... समानांतर और मेनस्ट्रीम सिनेमा में क्या अंतर पाते हैं? मोटा-मोटा फर्क तो ये है कि ज़्यादातर आर्ट फ़िल्म की सिचुएशन होती है उनमें नाच-गाना नहीं होता है. जो भी कमर्शियल फ़िल्में होती हैं उनमें 5-6 गाने आवश्यक होते हैं. लेकिन बहुत सारी ऐसी भी फ़िल्में हैं जेसे गुलज़ार साहब, बासु भट्टाचार्य, ऋषिकेश मुखर्जी आदि की फ़िल्मे साफ-सुथरी, अच्छी और मैं तो मानूंगा कि सही मायने में वो भी आर्ट फ़िल्में ही हैं. श्याम बेनेगल, गोविंद निहलानी टाइप कुछ फ़िल्में जिनमें गाने वगैरे बिल्कुल नहीं होते हैं तो ये एक दोनों में एक मौलिक फर्क है. इसके अलावा आर्ट फ़िल्में ज़िंदगी के करीब होती हैं, कमर्शियल फ़िल्मों में पार्ट फैंटेसी, पार्ट फिक्शन और पार्ट रियल होती है. श्याम बेनेगल, गोविंद निहलानी जैसे कुछ हटकर फ़िल्में बनाने वाले निर्देशकों और आज कल के निर्देशकों में आप क्या अंतर पाते हैं? इन लोगों का फ़िल्म इंडस्ट्री में बहुत बड़ा योगदान है. कमर्शियल फ़िल्म इंडस्ट्री को भी इन्होंने बहुत से कलाकार दिए हैं जिनमें मैं ख़ुद, अमरीश पुरी, पंकज कपूर, नसीरूद्दीन शाह, स्मिता पाटिल, शबाना आज़मी आदि जैसे कलाकार इन्हीं लोगों के यहां से होकर आए हैं. कमर्शियल सिनेमा में मणि रत्नम, कुंदन शाह, विनोद चोपडा, संजय लीला भंसाली, प्रकाश झा, फरहान अख्तर को मैं एडमायर करता हूँ. ये लोग मिडल सिनेमा में आते हैं जो ऋषिकेश मुखर्जी और गुलज़ार का हुआ करता था. इनका कथानक जीवन के नज़दीक होता है. बहुत आर्ट टाइप नहीं बनाते हैं. इनकी फ़िल्मों में गाने भी होते हैं लेकिन ये कहानी का हिस्सा लगते हैं. मैं इनकी बहुत इज्जत करता हूँ. किस तरह के किरदार करने आपको पसंद हैं? मुझे अलग-अलग तरह के किरदार पसंद हैं जैसा कि मैं आज तक करता आया हूँ. एक ही तरह के रोल करने मुझे पसंद नहीं हैं. गंभीर किरदार करते करते कॉमेडी में किस तरह आना हुआ? बहुत साल पहले सटायर की थी मैंने. उसे कॉमेडी तो नहीं कहूँगा लेकिन बहुत हँसी थी उसमें. फिर बहुत दिन सालों बाद चाची 420 से फिर शुरूवात हो गई और फिर डेविड धवन के यहां से बुलावा आया. उनके साथ भी मैंने दो-तीन फ़िल्में की. इसके बाद सिलसिला ही शुरू हो गया और इंडस्ट्री वालों को लगा कि ये तो कॉमेडी भी अच्छी कर सकता है. आपको ख़ुद कितना मज़ा आता हैं? मैं इसे बहुत एन्जॉय करता हूँ. लेकिन अगर कॉमेडी की बात की जाए तो मुझे सेंसिबल कॉमेडी करना पसंद है. डबल मतलब वाली या सेक्सुअल कॉमेडी करनी मुझे पसंद नहीं है. मैंने 'जाने भी दो यारो' और 'चाची 420' की कॉमेडी खूब एन्जॉय की . कोई ऐसा किरदार जिसे आप निभाना चाहते हैं?
वैसे तो मैं शाहरुख़ खान वाले किरदार करना चाहता हूँ लेकिन कौन देगा मुझे किरदार. मैं किसी रोल का इंतज़ार नहीं कर रहा हूँ लेकिन मैं हमेशा ऐसे रोल करना चाहूँगा कि जिससे काम करने में आनंद आए, मेरी प्रतिभा की एक्सरसाइज़ हो. कहानियों और टेक्नॉलॉजी की वजह से इंडस्ट्री का जो स्वरूप बदलता जा रहा है उस पर आप क्या कहेंगे? फ़िल्म माध्यम टेक्नीकली बहुत तरक्की कर रहा है. हर तरह की फ़िल्में बन रहीं है. लेकिन अगर मैं अपनी बात करुँ तो मैं पर्सनली आजकल की फ़िल्मों से संतुष्ट नहीं हूँ. फ़िल्में आम आदमी को ध्यान में रखकर बननी चाहिए जिसे वो अफोर्ड कर सके न कि सिर्फ मॉल को ध्यान में रखकर बनाई जाए. एक आदमी के बस की बात नहीं हैं कि वो हर हफ्ते 150-200 रूपए की टिकट और 75 रू. का पॉपकार्न खाए. लोगों ने सिनेमा को नकारना शुरू कर दिया था और वो सिनेमा हॉल के बदले घर की डीवीडी में फ़िल्में देखना पसंद करने लगे थे. ज़ाहिर है, फ़िल्मों से होने वाली आमदनी कम हो गई. इसकी वजह से निर्माताओं ने फ़िल्मों के बजट कम कर दिए ताकि रिकवरी हो जाए. हमारे यहां कहानियों की कमी सी लगने लगी है. लेकिन ऐसा नहीं है कि हमारे पास लिटरेचर नहीं है. हमारे पास बहुत से लिटरेचर ऐसे हैं जिन पर अच्छी फ़िल्में बनाई जा लकती है. दो बीघा ज़मीन जैसी फ़िल्म एक आम आदमी की कहानी कहती है, जो सरल है और उसकी समझ में आती है. ऐसा नहीं है ऐसी फ़िल्मे नहीं बन रहीं हैं लेकिन इनकी तादाद बहुत कम हो गई है. आपने फ़िल्म और थिएटर दोनों में काम किया है, दोनों के तौर-तरीकों और माहौल में कितना फर्क महसूस करते हैं? अनुशासन तो दोनों जगह एक ही तरह का होता है. जो अच्छा सिनेमा करते हैं और जो अच्छा थिएटर करते हैं उनके अनुशासन में कोई कमी नहीं होती है. कहानी के चुनाव, फ़िल्माने में या उसको थिएटर तक ले जाने में कोई कमी नहीं है. माहौल में फ़र्क की बात करें तो मेरे ख़याल से फ़िल्म जो है वो अमीर माध्यम है और थिएटर ग़रीब माध्यम है. फ़िल्म में ग्लैमर है थिएटर में नहीं है. बॉलीवुड को अंतरराष्ट्रीय विस्तार मिल रहा है, इसे किस तरह देखते हैं? ये लोगों की गलतफ़हमी है कि हमारी फ़िल्में विदेशी लोग देखते हैं. जो लोग हमारी फ़िल्में देखने आते हैं वो लोग हिन्दुस्तानी ही होते हैं. कोई यूरोपियन या अमेरिकन हमारी फ़िल्में थिएटर तक देखने नहीं आता है. बॉलीवुड में समय समय पर ऐसी बातें आना आम बात है कि उनकी फ़िल्मों ने भारत के बजाय विदेशों में कई गुना ज़्यादा मुनाफ़ा कमाया है. आपने फ़िल्म इंडस्ट्री में थिएटर से आए सामान्य कद-काठी वाले अभिनेताओं की छवि बदली है, इस क्या कहना चाहेंगे? अच्छी बात है अगर मेरी वजह से कुछ साधारण लोग प्रेरित हुए हैं और उनके लिए रास्ता खुला है तो मेरे लिए यह बहुत ही खुशी की बात है. लेकिन मुझे नहीं लगता कि मैं ऐसा पहला व्यक्ति हूँ. मुझसे पहले भी काफी साधारण लोग थे जिनमें अभिनय प्रतिभा की वजह से ही पहचान बनाई. 70 के दशक के पहले मोतीलाल, बलराज साहनी, अशोक कुमार आदि कई लोग थे हैंडसम तो थे लेकिन चॉकलेटी फेस नहीं कह सकते हैं फिर भी अपनी अभिनय क्षमता के बलबूते काफी सफल हुए. कोई ऐसा किरदार या कोई याद जिसे आप कभी नहीं भुला सकते? मुझे याद है जब मैं फ़िल्म सुस्मन कर रहा था तो उसमें मेरी भूमिका एक बुनकर की थी. दो महीने में जब फ़िल्म बनकर तैयार हुई तो कलाकार के साथ-साथ मैं अच्छा बुनकर भी बन गया था. मैंने काम सिर्फ़ इतना ही सीखा था कि फ़िल्म में बुनते हुए शॉट लेने थे लेकिन ऐसा शौक चढ़ा कि मैंने 40 मीटर कपड़ा अपने हाथ से बुन डाला. |
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