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शुक्रवार, 10 जून, 2005 को 08:33 GMT तक के समाचार
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नई पीढ़ी और ज़िम्मेदारी की भाषा

बेनेगल की फ़िल्म का एक दृश्य
बहुत से विषय हैं जो मुझे जीवन में प्रेरणा देते हैं मगर आदमी की जीने की जो लालसा है, वो सबसे अनोखी है.

उसी के कारण इंसान अनूठे काम करता है, उसी से कहानियाँ बनती हैं.

आदमी के पास कुछ हो न हो, जीवन उसे एक ऊर्जा एक शक्ति देता रहता है, जो उसे प्ररित करती रहती है.

एक सड़क के बच्चे का उदाहरण लीजिये, उसके पास घर नहीं है कुछ भी नहीं है फिर भी वो हँस रहा है. खुशी का कोई कारण नहीं है फिर भी वो मस्त है, खुश है.

ये जो रहस्यमय गुण है जीवन का वो मेरी ही नहीं इंसान की सबसे बड़ी प्रेरणा है, यही उसकी सबसे बड़ी विलक्षणता है…. उसका अद्भुत होना है.

मै हर बार इस गुण से हैरान रह जाता हूँ और यही गुण मेरे काम मेरी फिल्मों के लिए अक्सर प्रेरणा बनता है. दरअसल सारी कहानियाँ इसी गुण के कारण पैदा होती हैं, जीवन इसी की छाँव में पलता है.

पीढ़ी की समस्याएँ

दूसरे आज की जो पीढ़ी है, जिस तरह जीती है, जो समस्याएँ हैं उसके सामने वो भी काफी रोचक विषय है. हर समय की हर पीढ़ी की अपनी अलग समस्याएँ होती हैं.

शबाना आज़मी श्याम बेनेगल की फ़िल्म में
बेनेगल की फ़िल्म हरी भरी का एक दृश्य

हमारा समय राष्ट्रीय आंदोलन से प्रभावित समय था. लोगों का देश दुनिया समाज से से जुड़ाव था, वो अपने अलावा सबके बारे में भी सोचते थे मगर आज ऐसा नही है…. व्यक्ति केंद्रित समाज है.

सब अपने बारे में सोचते हैं, और अपेक्षाएँ, आकांक्षाएँ काफी बढ़ गई हैं. परिस्थितियाँ आदमी से ज़्यादा और ज़्यादा की माँग कर रही हैं.

अपने समय में हम इतनी अपेक्षाओं से घिरे हुए नही थे.

आज धार्मिक भावनाएँ काफी बढ़ गई हैं, अचानक बढ़ी अपेक्षाओं के आगे आदमी को कोई सहारा चाहिए. एक भरोसा ऐसे में सुकून देता है और ये विश्वास ही उन्हें घटनाओं के प्रति ज़िम्मेदार होने से बचाता भी है.

जो भी हो रहा है उसके लिए हम नहीं कोई और ज़िम्मेदार है, ये भावना आ गई है.

ज़िम्मेदारी का सवाल

हमारे समय में खुद को ज़िम्मेदार मानने का चलन था और मेरे आसपास जो कुछ भी घट रहा है उसमें कहीं न कहीं मैं ज़िम्मेदार हूँ.

हम लोगों की ऐसी सोच होती थी. हम ज़िम्मेदारी थोपते नही थे. मैं आज भी मानता हूँ कि मेरे कर्मों, मेरे जीवन के प्रति और कोई, चाहे वो व्यक्ति हो या शक्ति, कैसे ज़िम्मेदार या जवाबदेह हो सकता है.

जो कुछ है उसका एकमात्र ज़िम्मेदार मैं हूँ, मगर दुनिया के विकास के साथ ज़िम्मेदारी की भावना भी लुप्त होती जा रही है.

नई पीढ़ी की दिशाहीनता भी मुझे कई बार सोचने को मजबूर करती है मगर मुझे अब तक ऐसी कोई कहानी नही मिल सकी है जो इस विषय की अच्छाई-बुराई की पड़ताल मनोरंजक ढंग से कर सके.

(मुंबई में अपराजित शुक्ल के साथ बातचीत पर आधारित)

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