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किधर जा रहा है भारतीय समाज? | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
एक साधारण भारतीय की तरह मुझे भी बहुत सी चिंताएँ और सवाल मथते रहते हैं मगर सबसे अहम प्रश्न होता है कि हमारा भारतीय समाज किधर जा रहा है, हमारी दिशा क्या है. ये बात दिमाग़ में बनी रहती है. भारत ने जितने उत्साह और पूर्णता से लोकतंत्र को अपनाया ऐसे उदाहरण दुनिया में कम ही होंगे. भारत की जनता अपने विचारों और आत्मा से जनतांत्रिक है मगर इस देश की राजनीतिक पार्टियाँ लोकतंत्र विरोधी हैं. ये अजीब विरोधाभास है कि लोकतंत्र के भाग्य विधाता ही उस पर विश्वास नहीं करते जबकि जनता का लोकतंत्र पर अटूट विश्वास है. ये समस्या 70 के दशक में शुरू हुई जब भारतीय समाज स्थिरता और स्थायित्व की ओर बढ़ रहा था. भारत विविधताओं का समूह रहा है, राष्ट्र की साधारण परिभाषा जिसमें एक जाति एक भाषा जैसे नियम होते हैं, उनको झुठलाते हुए भी हम एक सबल राष्ट्र हैं. इतनी विविधताओं के होते बहुत सी समस्याओं का होना लाज़मी था. हमारे यहाँ सामंतवाद रहा है जिसके कारण वर्ग और जाति प्रथा पनपती रही. छोटी छोटी पार्टियाँ अलग अलग समूहों के प्रतिनिधित्व के लिये बनीं, मगर सन 75 के आसपास सत्ताधारियों ने लोकतंत्र के साथ जो खिलवाड़ शुरू किया उसमें ये पार्टियाँ महत्वपूर्ण होती गईं. वे केन्द्र के भाग्य निर्माता बनने लगे. जितनी छोटी पार्टी होगी उसकी सत्ता की भूख उतनी ज़बर्दस्त होगी. आज हम देखते हैं कि ये प्यादे बड़ी पार्टियों को नाच नचाते रहते हैं. तो एक ऐतिहासिक भूल हो गई कि परस्पर निर्भरता का पाठ हमने नही पढ़ा. लोकतंत्र में तालमेल और सामंजस्य की बहुत ज़रूरत होती है. गाँधीजी ने नैतिकता को लोकतंत्र का आधार बनाने की वकालत की थी अगर ये नही भी होता तो कम से कम आपसी तालमेल और एक दूसरे पर निर्भरता की लोकतांत्रिक महत्ता को समझा जाना ज़रूरी था. जिसे समझने, पूरा करने में हमारे राजनेता विफल रहे हैं. (मुंबई में अपराजित शुक्ल के साथ बातचीत पर आधारित) |
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