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फ़िल्मी कहानियों में यथार्थ का संकट | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
सिनेमा फ़ोटोग्राफ़ी पर निर्भर माध्यम है. दर्शक कहानी को चलित -चित्रों में देखते हैं. फ़ोटोग्राफ़ी चीज़ों को वैसे ही देखती है जैसे कि वो हैं. तो सिनेमा का जो फॉर्म था वो तो यथार्थ प्ररित था लेकिन कहानी पर दूसरे दबाव थे. कहानी पर सभी की स्वीकृति और सराहना का दबाव था साथ ही मनोरंजक होने की शर्त भी थी. ये दोनों तत्व भारतीय सिनेमा को विपरीत दिशा में खींचते थे. ऐसे में एक तीसरा रास्ता निकला, जो यथार्थ और मनोरंजन दोनों से निबाह लेता था - और वो था नैतिक ढंग की कथाएँ कहने का. अच्छाई और बुराई की लड़ाई दिखाइये जिसमें काफी मुश्किलों के बाद सच्चाई जीत जाए तो बन गई कहानी. इसमें पारिवारिक कहानियाँ कहने की भी बढ़िया गुंजाइश थी. घर में दो जुङवाँ भाई हैं, एक अच्छा एक बुरा. अच्छा त्याग करता है परेशानियाँ सहता है, बुरा बुराई करता है पर सच्चाई की आख़िरकार जीत होती है. भारतीय बनाम पश्चिम की फ़िल्म दरअसल ये एक ही मन के दो चेहरे हैं. हिन्दुस्तानी और बाहरी फ़िल्मों में एक मूलभूत फर्क़ है, पश्चिम की फ़िल्मों में एक परिस्थिति विशेष का मनोवैज्ञानिक चित्रण वस्तुपरक नज़रिये से किया जाता है, जबकि यहाँ की फ़िल्में दर्शक के नज़रिये से स्थिति का आंतरिक चित्रण प्रस्तुत करती हैं.
हमारी फ़िल्में दरअसल दर्शक का नज़रिया ही पर्दे पर परोसती हैं. तो परंपरा में जो बातें थीं, कि कोई पूरी तरह बुरा नहीं होता, प्रायश्चित्त के ज़रिये बुरा फिर से भला बन सकता है उसे फ़िल्मों ने अपना लिया. त्याग और रूमानी नैतिकता पर ज़ोर था तो उसे लेकर फ़िल्में बनीं और चलीं. इस तरह भारतीय सिनेमा में माघ्यम (फॉर्म ) का तो यथार्थ से कोई रिश्ता नही था मगर जो कथ्य थे वो हमारे मूलभूत विश्वासों से निकले थे इसलिये ये फ़िल्में दर्शकों को रुझाती थीं. दूसरे तत्व समय, साक्षरता वगैरह कुछ दूसरे तत्व भी सिनेमा को प्रभावित करते रहे हैं. जैसे एक ज़माना था जब बंगाल और केरल में सुखांत फ़िल्में सफल नही होती थीं, उसी बंगला फ़िल्म का हिंदी संस्करण हो या केरल की फ़िल्म का तमिल संस्करण हो तो वो सुखांत हो सकता था मगर केरल या बंगाल की फ़िल्म के सफल होने की पहली शर्त उनका दुखांत होना होता था. इसका श्रेय वहॉ की पढ़ी लिखी जनता को दिया जा सकता था, मगर आज ऐसा नही है. प्रसार माध्यमों के फैलाव से सभी जगहों पर एक से नियम लागू हो गए हैं, सामूहिक सोच एक भेड़चाल में चल रही है. आज की फ़िल्में लोगों की आकांक्षाओं को जगाती हैं - हर कोई मर्सीडीज़ गाड़ी खरीदना चाहता है, बंगलों में रहना और योरोप में छुट्टियाँ बिताना चाहता है इन अपूरित इच्छाओं को दर्शक फ़िल्म के माध्यम से कल्पना लोक में पूरी करता है. कला का उद्धेश्य दर्शक को एक अंर्तदृष्टि देने का होता है, कोई राग कोई पेंटिंग आपको एक अलग समय एक अलग अनुभव की दुनियाँ में पहुँचा देती है.
जब शिल्प और कला एकाकार हो जाते हैं तो दो और दो चार नहीं बल्कि पाँच हो जाते हैं और एक जादू जगता है. जैसे बुलफाइट में बुल और फाईटर दोनों का भयमुक्त और वीर होना ज़रूरी है वरना लड़ाई मौत का तमाशा होती है और कलातत्व नही जागता. ऐसे ही हर कलात्मक माध्यम में जादू जगाने के लिये दोहरी सजगता ज़रूरी होती है. ये जादू हर बार जागे ज़रूरी तो नही मगर कोशिश यही होनी चाहिये. हिंदुस्तानी फ़िल्में दर्शकों को कल्पना लोक में ले जाकर थोड़े समय के लिये तनावमुक्त तो करती हैं मगर असली दुनियाँ की असली कहानियों से काटकर वो दर्शकों को झूठ में शरण लेने की प्रेरणा देती हैं. (मुंबई मे अपराजित शुक्ल के साथ बातचीत पर आधारित) |
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