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'पहले संगीत का प्रचार नहीं होता था' | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
हमारा देश अपनी आज़ादी के साठ साल पूरे करना जा रहा है और मैं संगीतकार के रूप में अपने करियर के 60 साल पूरे करने जा रहा हूँ. मैं अपना करियर 1947 में शुरू किया था. पहले पांच साल मैं 'शर्माजी' के नाम से संगीत देता रहा. उसके बाद अपने असली नाम ख़य्याम के नाम से काम किया. उस दौर में दिलीप कुमार, राज कपूर और देवानंद जैसे अदाकार हुए. मैंने उन लोगों के साथ काम किया. ‘फ़ुटपाथ’ फ़िल्म में दिलीप कुमार साहब और ‘फिर सुबह होगी’ में राज कपूर साहब के साथ काम किया. 'शामे ग़म की क़सम... ' और 'वो सुबह कभी तो आएगी...' उसी दौर के गीत हैं. वह बड़े शायरों और कवियों का दौर था. आज मैं सोचता हूँ तो अच्छा लगता है कि इतने बड़े शायरों और कवियों के साथ काम करने का मौक़ा मिला. देवानंद साहब भी बड़े कलाकार थे. उनकी फ़िल्मों का संगीत भी बहुत बेहतरीन और एक ख़ास स्टाइल के साथ होता था. उनकी फ़िल्मों के गानों में पश्चिमी संगीत की झलक अधिक मिलती थी. समय के साथ चीज़ें बदलती हैं. ‘कभी-कभी’ एक बदले हुए ज़माने की ही फ़िल्म है. ‘कभी-कभी’ बहुत काव्यात्मक थी. यशजी हम सबके पसंदीदा फ़िल्मकार हैं लेकिन उसमें अगर साहिर लुधियानवी के गीत न होते और मेरा संगीत न होता तो फ़िल्म पर असर पड़ता. हमारे यहाँ पहले जो फ़िल्में बनती थीं उनके विषय बहुत अच्छे होते थे. उनमें काव्यात्मकता और संगीत भी ग़ज़ब का हुआ करता था. एक कहानी के लिए उसी तरह का संगीत बनाया जाता था और उसका पूरा ट्रीटमेंट एक ही तरह का हुआ करता था. अभी तकनीकी के साथ प्रगति तो बहुत हुई लेकिन संगीत के स्तर में गिरावट आई. हमारी फ़िल्मों में व्यावसायिक फ़िल्मों के नाम पर कुछ भी परोसा जा रहा है और पश्चिमी संस्कृति पूरी तरीक़े से हावी होती जा रही है. फ़िल्मों में नैतिक और सांस्कृतिक मूल्य कम हो रहे हैं. अब तो फ़िल्मों में आइटम नंबर होने लगे हैं. पर्दे पर अचानक ही कोई गाना हो जाता है जिसका फ़िल्म की कहानी और उसके ट्रीटमेंट से कोई लेना देना नहीं होता. पहले संगीत अपने दम पर हिट हुआ करता था. उसे किसी तरह के प्रचार की ज़रूरत नहीं पड़ती थी. लेकिन अब के संगीत के साथ ऐसा नहीं होता. वो सब एक तरह के ही लगते हैं. आवाज़ें लता जी के साथ मैंने कई गाने बनाए. वैसे तो बहुत से गाने हैं और सब मुझे अच्छे लगते हैं. लेकिन मुझसे एक गाना याद है, 'रज़िया सुल्तान' फ़िल्म का 'ऐ दिले नादान...' 'रज़िया सुल्तान' कमाल अमरोही साहब की फ़िल्म थी. वैसे तो यह गाना सीधा सा गाना था औकर धुन भी सरल थी, लेकिन इसको गाने के लिए आवाज़ के जादू की ज़रुरत थी. मुझे ख़ुशी है कि लता जी ने मेहनत के साथ गाना गाया. संयोग ही कहें कि कमाल साहब की फ़िल्म 'महल' के गाने से ही लता जी इंडस्ट्री मे स्थापित हुई थीं. 'उमराव जान' के गाने भी ख़ासे मशहूर हुए. इसके बारे में कहा जाता है कि 'उमराव जान' के गाने क्लासिक और अमर गाने थे. इस फ़िल्म का संगीत मैंने दिया था और गाने के लिए मैंने आशा भोसले जी का चयन किया था. मैंने इस फ़िल्म में उनकी आवाज़ तराशी थी. इस बात को आशा जी भी स्वीकारती हैं कि उनकी आवाज़ एक अलग अंदाज़ से सुनाई देती है. हालांकि उन्होंने मेहनत बहुत की थी. |
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