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'नए लोगों में जुनून की कमी' | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
पुराने दौर में जैसे लोग इस इंडस्ट्री में हो गए अब वैसे लोग पैदा होना नामुमकिन है. दिलीप कुमार, राज कपूर, देवानंद और अशोक कुमार जैसे कलाकार की कल्पना करना भी अब संभव नही है. आज़ादी से पहले, 1942-1946 के बीच ये कलाकार इंडस्ट्री में आए और इनमें से कई अभी भी हमारे बीच हैं. राज कपूर की फ़िल्मों में एक सामाजिक संदेश होता था. मैंने उनसे अधिक प्रतिभाशाली आदमी कभी नहीं देखा. क्या नहीं था उस बंदे में. एक बेहतरीन अदाकार और निर्देशक होने के साथ-साथ उन्हें आठ-दस भाषाएँ बोलनी आती थीं. वो कई तरह के वाद्य यंत्र बजा लेते थे. भगवान कृष्ण ने कहा था कि जब-जब मेरी ज़रूरत होगी तब-तब मैं धरती पर आउँगा. मुझे लगता है कि कला और मिनेमा के क्षेत्र में भी उनकी बात सच थी जो हमें राज कपूर जैसी शख्सयत मिली. दादा साहब फ़ाल्के ने भारत में फ़िल्में बनाने का सपना देखा था उन्होंने इसे पूरा भी किया और हम इतनी बड़ी इंडस्ट्री खड़ी कर सके. आज के लोगों में असुरक्षा की भावना अधिक है और जुनून की कमी है. आज के समय में शांताराम, गुरू दत्त, विमल रॉय, बीआर चोपड़ा जैसे फ़िल्मकारों की कल्पना करना मुमकिन ही नहीं लगता. लेखक का सम्मान जहाँ तक मेरा सवाल है तो आज़ादी के समय मेरी उम्र 12 साल की थी. लेकिन मेरी समझ 15 साल की उम्र वाले बच्चे की तरह थी. मैं स्कूल में जग-गण-मन करवाया करता था. मुझे फ़िल्मों का बहुत शौक था. आज़ादी से जुड़ी फ़िल्में जैसे दिलीप कुमार साहब की ‘शहीद’ और दादा मुनि(अशोक कुमार) की ‘समाधि’ बहुत चली थीं. मैं इंदौर का रहना वाला हूँ. बचपन में मैं बहुत फ़िल्में देखा करता था. इंदौर के पास ही महू में सैनिक छावनी थी इसलिए वहाँ अंग्रेज़ी फ़िल्में लगा करती थीं. हम वहाँ जाया करते थे. बचपन में जो फ़िल्में देखीं वो आगे बहुत काम आईं. उनसे बहुत कुछ सीखने को मिला था. मैं बंबई हीरो बनने आया था. क़रीब 25 फ़िल्मों में काम भी किया. फिर मुझे लगा कि मैं इस क्षेत्र में अच्छा नहीं कर पाउँगा.
मैं पढ़ाई बहुत की थी और फ़िल्मों की समझ भी मेरी अच्छी थी. मैंने सोचा क्यों न फ़िल्म लेखन में हाथ आजमाया जाए. फिर मैंने फ़िल्में लिखनी शुरू कीं. उन दिनों अमिताभ बच्चन की फ़िल्में नहीं चला करती थीं. जब 'ज़ंजीर' हिट हुई तो लोगों ने पूछा यार यह हीरो तो चलता नहीं है लेकिन फ़िल्म ख़ूब चली, किसने लिखी है यह फ़िल्म? तब उन्हें बताया गया कि इस फ़िल्मों को भी उन्होंने ही लिखा है जिन्होंने अंदाज़, सीता और गीता और हाथी मेरा साथी फ़िल्में लिखी हैं. दरअसल हम (तब सलीम ख़ान के साथ जावेद अख़्तर थे) 'ज़ंजीर' से पहले ही कई सफल फ़िल्में लिख चुके थे लेकिन किसी ने ध्यान नहीं दिया था. 'ज़ंजीर' के बाद 'यादों की बारात', 'मजबूर' और 'शोले' जैसी फ़िल्में आईं. हमने जब फ़िल्म लेखन किया तो इस विधा का भी सम्मान बढ़ा. पहले लोग फ़िल्म लेखक को नहीं जानते थे और इंडस्ट्री में भी उनका कोई सम्मान नहीं था. 'ज़ंजीर' में पहले कोई भी काम करने को तैयार नहीं था. इस फ़िल्म में काम करने के लिए धर्मेंद्र, देवानंद, राजकुमार और दिलीप कुमार जैसे अदाकारों ने इनकार कर दिया था. 'ज़ंजीर' का नायक सोच समझ कर रचा गया चरित्र था. जो ग़ुस्सा करता है और नायिका के साथ नाचता नहीं है. यह चरित्र भारतीय सिनेमा में पहले से मौजूद चरित्रों से बहुत अलग था. हमने 'शोले' में जो कुछ भी सोच कर लिखा वो सब पर्दे पर साकार हो गया और फ़िल्म ज़बर्दस्त हिट हो गई. ऐसा कम ही होता है कि लेखक जो कुछ भी सोचे वो सब पर्दे पर दिखाई दे सके. (वेदिका त्रिपाठी से हुई बातचीत के आधार पर) |
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