BBCHindi.com
अँग्रेज़ी- दक्षिण एशिया
उर्दू
बंगाली
नेपाली
तमिल
शुक्रवार, 03 अगस्त, 2007 को 08:05 GMT तक के समाचार
मित्र को भेजेंकहानी छापें
हिंदी सिनेमाः सब कुछ सच्चा, चेहरा झूठा

ऋतिक रोशन
राकेश रोशन की फ़िल्म कृष में अंतरराष्ट्रीय तकनीक का इस्तेमाल हुआ

इन साठ सालों में हिंदी सिनेमा की गंगा से बहुत सारा पानी बह गया है. परछाइयों के अनेक बिम्ब-प्रतिबिम्ब बने और बदले परिदृश्य में इस नई सदी में हमारे सामने मौजूद हैं.

अपने जन्म से लेकर पौराणिक-धार्मिक-ऐतिहासिक-सामाजिक सोपानों को पार करता स्वाधीन भारत का सिनेमा ताज़ी हवा के झोंके की तरह आया.

देश के नवनिर्माण में उसने कदमताल करते हुए युवा वर्ग को नई दिशा, नया सोच और नए सपने बुनने के अवसर प्रदान किए.

फ़िल्मकार वी शांताराम, बिलम राय, गुरुदत्त, राजकपूर तथा बीआर चोपड़ा ने अपनी फ़िल्मों के माध्यम से न सिर्फ़ मनोरंजन किया बल्कि सकारात्मक सोच की दिशा में आगे बढ़ाया.

50 का दशक संयुक्त परिवार और सामाजिक समरता की फ़िल्मों का दशक था. जेमिनी, एवीएम, प्रसाद प्रोडक्शन एवं बीआर फ़िल्म्स के बैनर तले ‘संसार’, ‘घूँघट’, ‘घराना’, ‘गृहस्थी’, ‘भाई-भाई’, ‘भाभी’, ‘छोटी बहन’, ‘धूल का फूल’, ‘धर्मपुत्र’, ‘साधना’, जैसी फ़िल्मों के माध्यम से समाज की एकता को मजबूती प्रदान की.

प्रत्येक फ़िल्म में पारिवारिक मूल्य, मान-मर्यादा, परंपरा और बड़ों की छोटों के प्रति जवाबदारी तय रहती थी. इसीलिए बलराज साहनी जैसे भाई पत्नी निरापाराय एवं बच्चों के साथ पेटी-बिस्तर लेकर घर से निकलते और गाते थे-‘‘चल उड़ जा रहे पंछी...’’ यह बड़ों का छोटों के लिए त्याग था.

अंत में गलतफहमियाँ दूर होतीं और तमाम बिछड़े भाई-भौजाई बच्चे एक छत के नीचे ग्रुप फोटो के साथ दिखाई देते थे.

 हिंदी फ़िल्मों को कैबरे का उपहार देने वाली सबसे उम्दा डांसर हुई हेलन. होटल की शराब पार्टियों में, सिगरेट के धुएँ के छल्लों के बीच पारदर्शी पोशाक में हेलन के मादक डांस दर्शक को अंदर तक उत्तेजित कर देते थे

आज की फ़िल्मों से परिवार ग़ायब है. ग्रामीण भारत ग़ायब हैं. रिश्ते-नाते ग़ायब हैं. भैया-भाभी, छोटी बहन, दादा-दादी सब गायब हैं. यहाँ तक कि पूरे देश में एक साथ मनाए जाने वाले पारंपरिक त्यौहार रक्षाबंधन, दशहरा, दीपावली, होली और ईद तक गायब हैं, जो पहले हर तीसरी-चौथी फ़िल्म का हिस्सा हुआ करते थे.

हाई-टेक हुए एक्शन

वाडिया ब्रदर्स के जांबाज हीरो, जान कावस और हीरोइन नाडिया की शानदार घुड़सवारी, तलवारबाज़ी और ढिशूम-ढिशूम अब देखने को नहीं मिलते.

गुरुदत्त तथा नवकेतन की फ़िल्मों के पॉकेटमार नायक, खलनायक ज़्यादा से ज़्यादा लात-घूँसे चलाते थे या आखिर में चाकू निकाल कर डराते थे.

वे चम्बल के बीहड़ के डाकू हो गए और बंदूकों से गोलियाँ उगलने लगे. यही खलनायक फ़िल्म ‘शोले’ तक आते-आते 'लार्जर दैन लाइफ़' गब्बरसिंह हो गया, जिसका नाम लेकर माताएँ अपने बच्चों को डराकर सुलाती थी कि बेटा सो जा नहीं तो गब्बर सिंह आ जाएगा.

‘शोले’ हिंदी सिनेमा की सबसे बड़ी वायलेंस फ़िल्म है, जिसने ख़ून से सुनहरा परदा लाल कर दिया.

इसके बाद तो फ़िल्मों का हॉर्स, हॉर्स-पावर में बदलकर कार चेसिंग करने लगा. हैलीकॉप्टर से मशीनगनें गोलियाँ बरसाने लगीं.

राकेश रोशन की नई फ़िल्म ‘कृष’ का हीरो सुपरमैन की कतार में जा बैठा. आज एक्शन की हाईटैक टेक्नालॉजी हिंदी फ़िल्मों पर हावी है.

मेरा नाम चिन-चिन चू

हिंदी फ़िल्म में नाच-गाना न हो, तो इसका सीधा मतलब है बग़ैर नमक-मसाले वाला खाना.

1938 से 1948 तक अपने नशीले नृत्यों से डांसर अजूरी ने देश भर में सनसनी फैला दी थी. ब्रिटेन के बर्मिघम पैलेस में उसने नाटककार बर्नाड शॉ के समक्ष अपना नृत्य पेश किया था.

शॉ नृत्य के अलावा उसके देहयष्टि पर भी मोहित हो गए थे.

मल्लिका शेरावत
मल्लिका शेरावत आइटम साँग करके भी ख़ासी कमाई कर रही हैं

अजूरी की कला को कमर-विहीन कुक्कू ने फ़िल्म ‘बरसात’ में आगे बढ़ाया- 'पतली कमर है, तिरछी नज़र है.'

हिंदी फ़िल्मों को कैबरे का उपहार देने वाली सबसे उम्दा डांसर हुई हेलन. होटल की शराब पार्टियों में, सिगरेट के धुएँ के छल्लों के बीच पारदर्शी पोशाक में हेलन के मादक डांस दर्शक को अंदर तक उत्तेजित कर देते थे.

हेलन के परदे पर आते ही सिनेमाहाल में गर्मी की लहर दौड़ जाया करती थी.

इसे बिंदू ने ‘मोना माय डार्लिंग’ तक पहुँचाया. पद्मा खन्ना ने तो फिल्म ‘जानी मेरा नाम’ में - ‘‘हुस्न के लाखों रंग, कौन सा रंग देखोगे’’ गीत नृत्य में तो इतनी आग भर दी थी कि दर्शक इस डांस को देखने बार-बार सिनेमा घर गए.

आज मल्लिका शेरावत का ज़माना है. कहा जाता है कि फ़िल्म ‘आपका सुरूर’ में एक आयटम-सांग के उसने एक करोड़ से अधिक रुपए लिए हैं. फ़िल्मों में डांस अब आयटम में बदल गया है. इसे, सुष्मिता सेन, ऐश्वर्या राय, करीना कपूर और बिपाशा बसु जैसी नम्बर-वन कतार की हीरोइन भी बिंदास अंदाज़ में पेश करने लगी हैं.

फ़िल्म ओंकारा की बिल्लो चमन बहार याने बिपाशा के ‘‘बीड़ी जलई ले’’ से न जाने कितने दिलजलों के दिल जले होंगे.

नो रोमांसः ओनली मर्डर-मिस्ट्री

बाम्बे टॉकिज की फ़िल्म ‘अछूत कन्या’ 1936 में नायक अशोक कुमार और नायिका देविका रानी ने एक पेड़ की डाल पर तीन फीट दूर बैठकर गाया था-‘‘मैं बन की चिड़िया बन के, बन-बन डोलू रे.’’

नील एंड निक्की
अब शादी-विवाह की भी ज़रुरत नहीं रह गई

आज़ादी के बाद रोमांस का अंदाज़ बदला और पेड़ों के आसपास एक-दूसरे को पकड़ने के लिए चक्कर लगाने लगे.

‘श्री 420’ में एक ही छाते में बारिश में भीगते नरगिस-राजकपूर प्यार का इज़हार करने लगे.

‘आराधना’ फ़िल्म में बरसात में भिगी नायिका की साड़ी से पूरी देह बाहर झाँकने लगी. फिर सूनसान मकान में आग जलाई और ‘‘रूप तेरा मस्ताना’’ गाते हुए अनहोनी हो गई.

आज फ़िल्मों की हिरोइनें चुम्बन दृश्यों को गिनती के सहारे रोमांस करती है. कोई 17 चुम्बन का रिकार्ड बनाती है, तो कोई 32 तक जाकर इंटरवल करती है.

इसके बाद सीधे बेडरूम के सीन. फिर मर्डर. फिर मिस्ट्री. फिर द एंड.

फ़िल्म 'नील एन निक्की' तथा 'सलाम नमस्ते' तो बगैर रोमांस, बगैर शादी के लिव-इन-रिलेशनशिप की पैरवी करने लगी हैं. कुल मिलाकर हिंदी फ़िल्मों की नायिका शो-पीस या आयटम या यूज एंड थ्रो बनकर रह गई हैं.

क्या से क्या हो गया...

सबसे बड़ी व्यथा-कथा यह है कि फ़िल्मों में तमाम फार्मूले, मसाले, आयटम तो हैं, मगर 'कंटेंट' नदारद है. शायद इसीलिए फ़िल्मकार सुभाष घई जेब में एक करोड़ रुपए लेकर कथा-पटकथा ढूंढने निकले हैं.

सूरज बड़जात्या, करण जौहर, आदित्य चौपड़ा और यश चौपड़ा की फ़िल्में देखकर लगता है कि इंडिया में अब ग़रीबी नहीं रही. सब लखपति-करोड़पति हो गए हैं.

एनआरआई या क्रॉस ओवर सिनेमा के माध्यम से मीरा नायर, दीपा मेहता, गुरिंदर चड्ढा, भारतीय संस्कृति और परंपराओं को विदेशों में बेचकर मालामाल हो रहे हैं.

फ़िल्मों में कॉमेडियन का रोल अब हीरो ख़ुद करने लगे हैं.

अधिकांश फ़िल्मों की शूटिंग विदेशों में होने लगी है और हिंदी फ़िल्मों की तकनीक हॉलीवुड के टक्कर की हो गई है.

मीना कुमारीहालात नहीं बदले
फ़िल्मों में नायिका तो बदली लेकिन उसकी जगह समाज की तरह ही रही, हाशिए पर.
गब्बर सिंहबदलते खलनायक
समाज जिस तरह बदला हिंदी सिनेमा का खलनायक भी बदलता गया...
ख़य्यामअपने दम वाला संगीत
ख़य्याम का कहना है कि पहले संगीत अपने दम पर हिट हुआ करता था.
सलीम ख़ान'अब जूनून की कमी'
फ़िल्म लेखक सलीम ख़ान का कहना है कि नए लोगों में जूनून की कमी है.
श्याम बेनेगलबहुत कुछ बदल गया
श्याम बेनेगल का कहना है कि आज़ादी के बाद सिनेमा में बहुत कुछ बदल गया है.
सत्यजीत रेक्षेत्रीय सिनेमा का रोल
विश्व सिनेमा में भारत को स्थापित करने का काम क्षेत्रीय सिनेमा ने किया.
सिनेमासिनेमा सिर्फ़ मनोरंजन?
सिनेमा क्या सिर्फ़ मनोरंजन भर है या फिर उसका सामाजिक दायित्व भी है?
सुर्ख़ियो में
मित्र को भेजेंकहानी छापें
मौसम|हम कौन हैं|हमारा पता|गोपनीयता|मदद चाहिए
BBC Copyright Logo^^ वापस ऊपर चलें
पहला पन्ना|भारत और पड़ोस|खेल की दुनिया|मनोरंजन एक्सप्रेस|आपकी राय|कुछ और जानिए
BBC News >> | BBC Sport >> | BBC Weather >> | BBC World Service >> | BBC Languages >>