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'सबसे बड़े लोकतंत्र में महिलाओं की उपेक्षा' | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
हिंदुस्तान की आज़ादी के पिछले 60 वर्षों का अनुभव बहुत मिश्रित अनुभव है. कई ऐसे क्षेत्र थे जिनमें महिलाएँ क़दम भी नहीं रख पाती थीं. अगर हम 60 बरस पहले के भारत से तुलना करें तो कुरीतियों, परंपराओं की तमाम लक्ष्मण रेखाओं को लांघकर आज की महिला ने अपना अस्तित्व क़ायम किया है. (भारत की आज़ादी के 60 बरस पूरे होने पर हम ऐसे लोगों से आपको रूबरू करवा रहे हैं जो भारत की आज़ादी के साथ-साथ ख़ुद भी 60 वर्ष के हो चुके हैं. इसी श्रंखला में पढ़िए पिछले 60 बरसों के दौरान भारत में महिलाओं की स्थिति और वैकल्पिक राजनीति के उतार-चढ़ावों पर सामाजिक कार्यकर्ता और राज्यसभा सांसद वृंदा कारत की राय और दीजिए अपनी प्रतिक्रिया...) यह सब भी अपने बलबूते पर, अपने संघर्ष, अपनी लड़ाई, अपनी ताकत और प्रयासों की बदौलत. भारतीय समाज आज यह स्वीकार करने के लिए विवश है कि लड़की पीछे नहीं हैं, महिलाएँ पीछे नहीं है, वे सबकुछ कर सकती हैं. इसका दूसरा पहलू भी है. आज भी भारत की बहुमत महिलाओं के लिए जो नारी उत्पीड़न का सवाल है, जो अल्पसंख्यक महिलाओं की समस्याएँ हैं, जो दलित महिलाओं की स्थिति है, जो घर और घर से बाहर हिंसा से गुज़रने का सवाल है, उसे देखने पर अभी भी तकलीफ़ होती है. आज भी ऐसी नीतियाँ देश में अपनाई जा रही हैं जो बहुमत महिलाओं को आर्थिक आत्मनिर्भरता के अधिकार से वंचित करती हैं. इस पुरुषप्रधान, पूँजीवादी और सामंती समाज में अभी भी बहुत कुछ बदलना बाकी है और इसके लिए मज़बूत प्रयास करने की ज़रूरत है. संसदीय प्रणाली और महिलाएं यह हमारे तंत्र की, हमारी व्यवस्था की एक बहुत बड़ी हार है कि जो महिला वर्ग लगातार यह स्थापित करता आ रहा है कि वे हर क्षेत्र में अग्रणी भूमिका निभा सकती हैं, उसे हम नीति निर्धारकों के बीच पहुँचा पाने में विफल रहे हैं. महिलाएँ समाजसेवा में पीछे नहीं है, राजनीति में पीछे नहीं हैं पर यह विडंबना है इस देश की कि आज भी संसद में हम 10 प्रतिशत महिलाओं की भी भागीदारी तय नहीं कर सके हैं. यह बहुत ही शर्मनाक बात है कि हम एक ओर तो दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र होने का दावा करते हैं और दूसरी ओर हमने लोकतंत्र में फ़ैसले लेने वाली संसदीय संस्थाओं से महिलाओं को बाहर रखा है. यह ज़रूर है कि आज हम पूरी दुनिया के सामने गर्व से कह सकते हैं कि देशभर की निकाय इकाइयों और पंचायतों में हमने 12 लाख महिलाओं के प्रतिनिधित्व को स्वीकार किया है. इन इकाइयों में काम कर रही कई महिलाओं ने बेहतरीन काम करने के लिए पुरस्कार भी लिए हैं पर यह कितनी अफ़सोस की बात है कि देश की संसद और विधानसभाओं की दीवारों को तोड़कर हम आधी तो छोड़िए, एक तिहाई महिलाओं को भी नहीं ला पा रहे हैं. वैकल्पिक राजनीति और जनांदोलन मुख्यधारा की राजनीति बुरी तरह से उदारीकरण की नीतियों से प्रभावित है. जहाँ तक नीतियों का सवाल है, ग़रीबों के अधिकारों को हाशिए पर रखने के पूरे प्रयास किए जा रहे हैं.
पर वैकल्पिक राजनीति और जनआंदोलनों की भूमिका इस मायने में महत्वपूर्ण हुई है कि इनके ज़रिए लोगों को संघर्ष करने का एक रास्ता तो मिला है. मैं तो 23 वर्ष की उम्र में ही सामाजिक रूप से सक्रिय हो गई थी. तब से अब तक की स्थिति को देखने के बाद हमारे विरोधी भी इस बात को स्वीकार करते हैं कि हमारी राजनीति और जनांदोलन कितने प्रासंगिक हुए है. जनांदोलनों के साथ संगठित वामपंथी आंदोलन को भी जोड़कर देखना पड़ेगा. सोवियत युनियन के पतन के साथ दुनिया के कई देशों में यह धारणा बनी कि वामपंथी आंदोलन का दौर समाप्त हो चुका है लेकिन भारत में पिछले 10-15 वर्षों में जिस तेज़ी और तैयारी के साथ वामपंथी आंदोलन आगे बढ़ा है, जिस तरह से उसका दखल राजनीतिक और सामाजिक परिवेश में बढ़ा है. मुझे लगता है कि उसे सकारात्मक रूप में लिया जाना चाहिए. हालांकि इन्हीं पिछले दशकों में हिंदु कट्टरवाद जैसे कई और धड़े भी देश की राजनीति में पनपे हैं और इनके ख़िलाफ़ लामबंद होने की ज़रूरत है. (बीबीसी संवाददाता पाणिनी आनंद से बातचीत पर आधारित) |
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