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नौकरशाहों की मानसिकता तो बदली, पर... | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
आज़ादी के 60 साल बाद अगर पड़ोसी देशों से तुलना करें तो पाएँगे कि भारत विकास के रास्ते पर बहुत आगे निकल चुका है. कई अच्छाइयाँ हैं तो कुछ बुराइयाँ भी. अगर व्यवस्था में आई बुराइयों के लिए प्रशासनिक सेवा को ज़िम्मेदार ठहराया जाता है तो यह भी ध्यान रखें कि पाकिस्तान और बांग्लादेश की तुलना में भारत की तरक्की कहीं ज़्यादा है और इसमें नौकरशाही के योगदान को नहीं भूलना चाहिए. एक आरोप और लगता है कि प्रशासनिक अधिकारियों का मानस आज भी नहीं बदला है, वे आज भी इस बात को स्वीकार नहीं कर पाए हैं कि पिछले 60 बरसों से कायम नई व्यवस्था में उनकी भूमिका जनता के सेवक की है. मैं इस तर्क से सहमत नहीं हूँ. मेरा मानना है कि प्रशासनिक अधिकारियों की मानसिकता बदली है. अपने करियर में मैंने ऐसे कई प्रशासनिक अधिकारियों को देखा है जो मिशन की तरह 12-16 घंटे काम करते हैं और अच्छे काम करने के नए-नए तरीके ढूँढते रहते हैं. (भारत की आज़ादी के 60 बरस पूरे होने पर हम ऐसे लोगों से आपको रूबरू करवा रहे हैं जो भारत की आज़ादी के साथ-साथ ख़ुद भी 60 वर्ष के हो चुके हैं. इसी श्रंखला में पढ़िए पिछले 60 बरसों के दौरान भारत में प्रशासनिक सेवाओं की स्थिति और कार्यप्रणाली पर वर्ष 1947 में जन्मे, भारत के वर्तमान चुनाव आयुक्त एसवाई कुरैशी की राय और दीजिए अपनी प्रतिक्रिया...) भारत में लोकतंत्र के मज़बूत होने से प्रशासनिक अधिकारियों की अकड़ भी कम हुई है लेकिन आप खुद सोचें कि अगर कोई जिलाधिकारी अपनी ताकत और अधिकारों का कड़ाई से इस्तेमाल न करे तो असामाजिक तत्व ही उसपर हावी हो जाएंगे. मैं मानता हूँ कि आज़ादी के समय से आज तक नौकरशाही की मानसिकता में जो बदलाव दर्ज़ किए गए हैं वो ज़रूरी थे लेकिन हमें एक संतुलन बनाकर चलना होगा. ज़रूरी है कि नौकरशाही स्वेच्छाचारी न बने, वहीं उसका अधिकार कम करने की भी एक सीमा होनी चाहिए. अहम सवाल सिंगापुर के पूर्व प्रधानमंत्री ली कान यू ने नौकरशाहों को दी जाने वाली कम तनख़्वाह पर टिप्पणी करते हुए कहा था कि अगर आप मूंगफली बाँटेंगे तो बदले में आपको बंदर ही मिलेंगे. यानी बेहतर काम के बदले में बेहतर पैसा और सुविधाएं भी मिलनी चाहिए जो आज भारत की प्रशासनिक सेवाओं में नहीं हो रहा है. यही वजह है कि आज देश की बेहतरीन प्रतिभाएँ प्रशासनिक सेवाएँ छोड़ दूसरे क्षेत्रों में जा रही हैं. प्रशासनिक सेवाओं में अधिकारियों की वित्तीय सुविधाओं का ध्यान नहीं रखा जाता इसीलिए नौकरशाह अपनी नौकरियां छोड़कर निजी कंपनियों के साथ जा रहे हैं. आज़ादी के समय प्रशासनिक अधिकारियों को जो अधिकार थे उनमें भी कमी आई. पहले तीन साल से पहले कोई तबादला नहीं होता था और अधिकारी चार-पाँच साल तक अपने पदों पर बने रहते थे लेकिन आज तो तीन-चार महीनों में ही अधिकारियों के तबादले कर दिए जाते हैं. पहले प्रशासनिक अधिकारी बहुत आराम और सुविधाओं से भरा जीवन जीते थे पर आज शहर बदलते रहना और बच्चों को पढ़ा पाना भी एक ईमानदार प्रशासनिक अधिकारी के लिए मुश्किल है. इसका परिणाम यह है कि समय बीतने के साथ प्रशासनिक अधिकारियों ने अपनी सुविधाओं के लिए राजनीतिक हस्तियों के साथ समझौता किए. दागदार भी है दामन आज की मौजूदा नौकरशाही को आज़ादी के पूर्व की आईसीएस सेवा के मुक़ाबले कमज़ोर, कम समर्पित और भ्रष्ट माना जाता है.
मेरा मानना है कि काफ़ी हद तक इसकी वजह राजनीतिक व्यवस्था में आया बदलाव है. कुछ अधिकारी बेईमानी करते पाए गए, भ्रष्टाचार में शामिल हुए जिसके बारे में सोचकर शर्मसार भी होना पड़ता है. राजीव गांधी ने प्रधानमंत्री रहते हुए कहा था कि अगर 100 रुपया केंद्र से चलता है तो 15 रुपए ही गाँव तक पहुँचता है और इसके लिए हमारे देश में व्याप्त भ्रष्टाचार ज़िम्मेदार है. पर इस भ्रष्टाचार के लिए केवल प्रशासनिक अधिकारी ही ज़िम्मेदार नहीं हैं. यह भ्रष्टाचार राजनीति और नौकरशाही दोनों में ही देखने को मिलता है. बहुत से नेताओं और नौकरशाहों की सांठ-गांठ के चलते जनता के पैसे वहाँ तक नहीं पहुँचे जहाँ के लिए उन्हें भेजा गया था. हमने यह भी देखा है कि अगर कोई अधिकारी भ्रष्टाचार में लिप्त है तो उसे उजागर करने में मीडिया और लोग कोई कसर नहीं छोड़ते पर जो अधिकारी ईमानदार हैं उन्हें मीडिया, जनता और सरकार का बहुत समर्थन नहीं मिलता. कुल मिलाकर ज़रूरत इस बात की है कि इसकी कमियों को लेकर आलोचना करने के बजाए सुधार लाने और नौकरशाही को मज़बूत करने के प्रयास होने चाहिए और इसकी शुरुआत इनकी स्थिति में सुधार लाने से करनी होगी. (बीबीसी संवाददाता पाणिनी आनंद से बातचीत पर आधारित) |
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