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शुक्रवार, 11 अप्रैल, 2008 को 16:19 GMT तक के समाचार
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दर्द का रिश्ता या पाखंड

बाइचुंग भूटिया
भूटिया ने ओलंपिक मशाल थामने से इनकार कर दिया
बाइचुंग भूटिया ने अपनी अंतरात्मा की आवाज़ पर ओलंपिक मशाल में रिले में भाग लेने से इनकार कर दिया. इसके साथ ही बीजिंग ओलंपिक के बहिष्कार को लेकर भारतीयों में बहस शुरू हो गई.

देखने से तो यही लगता है कि किसी भी सभ्य देश को उस देश में खेलने की क्या आवश्यकता है जो निर्दोष बौद्धों की आज़ादी की चाहत को कुचल देता है.

बहिष्कार अपना ग़ुस्सा और विरोध दर्ज करने का हथियार है और इसका पहले भी इस्तेमाल हो चुका है. वर्ष 1980 में अमरीका ने मॉस्को ओलंपिक का बहिष्कार किया था. अमरीका के साथ-साथ जापान, पश्चिम जर्मनी, चीन और कनाडा ने भी इस ओलंपिक में हिस्सा नहीं लिया था.

कारण था वर्ष 1979 में अफ़ग़ानिस्तान पर सोवियत संघ का हमला. इस पर सोवियत संघ का जवाब चार साल बाद आया जब उसके साथ-साथ ईस्टर्न ब्लॉक के कई देशों ने लॉस एंजिल्स ओलंपिक का बहिष्कार कर दिया.

लेकिन ईंट का जवाब पत्थर से देने की प्रवृत्ति या यों कहे कि विरोध का ये तरीक़ा उस समय ख़त्म हो गया जब ज़्यादातर देशों ने यह समझ लिया कि ओलंपिक खेल का बहिष्कार का ये तरीक़ा दोनों पक्षों को प्रभावित कर सकता है.

दो दशक से भी ज़्यादा समय के बाद एक बार फिर हमारे समाने वही ख़तरा खड़ा हो गया है.

चुनौती

हालाँकि अभी तक विरोध सिर्फ़ मशाल दौड़ के विरोध तक ही सीमित है लेकिन धीमी ज़ुबान में ही सही लेकिन ये आवाज़ भी सामने आ रही है कि पूरे खेल का ही विरोध किया जाए और चीन को ये बता दिया जाए कि उसके शासन को सिर्फ़ अहिंसक विरोध से ही चुनौती नहीं दी जाएगी.

ओलंपिक मशाल का विरोध हर स्तर पर हो रहा है

क्रिकेट खिलाड़ियों के अलावा बाइचुंग भूटिया भारत के मशहूर खिलाड़ियों में से एक हैं. उन्होंने अपने सम्मान की बलि देकर भारतीयों को यह बताया है कि वे चीनी शासन के बारे में क्या सोचते हैं.

लेकिन भारत के रुख़ से यह स्पष्ट पता चल जाता है कि भूटिया के लिए जितना साधारण ये मामला है, एक सरकार के लिए उतना नहीं. इस मामले पर सुरेश कलमाडी का बयान तुरंत आया और वो भी स्पष्ट.

हो सकता है कि कलमाडी भारत सरकार का प्रतिनिधित्व न करते हों लेकिन भारतीय ओलंपिक एसोसिएशन के प्रमुख के तौर पर उनका बयान आधिकारिक तो है ही.

उन्होंने जो भी कहा, उससे पूरी स्थिति की जटिलता का अहसास होता है और ये भी पता चलता है कि सरकार के स्तर पर ओलंपिक खेलों का बहिष्कार आख़िर में ख़ुद के हारने जैसा हो सकता है.

कलमाडी ने कहा था- हम वर्ष 2010 में राष्ट्रमंडल खेलों की मेज़बानी कर रहे हैं. उस समय क्या होगा अगर कुछ देश कश्मीर में हमारे मानवाधिकार रिकॉर्ड का हवाला देते हुए खेल का बहिष्कार करना चाहें.

सवाल

मैं जानता हूँ कि भारत में कई लोग ऐसे हैं जो इस बयान पर उपहास करेंगे और ये भी कहेंगे कि ल्हासा और तिब्बत समस्या का तुलना कश्मीर से नहीं की जा सकती. साथ ही वे यह भी कहेंगे कि भारत कश्मीरी मुसलमानों की 'आज़ादी' के आंदोलन को बर्बरता से नहीं कुचल रहा है.

आमिर ख़ान कोका कोला के ब्रैंड एम्बैसडर हैं

अगर पिछले दो दशकों में जहाँ एक लाख से ज़्यादा नागरिक मारे जा चुके हैं और जहाँ सरकारी दमन के ख़िलाफ़ हज़ारों लोग सड़कों पर उतर आते हैं, कई लोगों के लिए कश्मीर तिब्बत समस्या से कम नहीं है.

कश्मीर के बाहर भी भारत का रिकॉर्ड अच्छा नहीं रहा है. गुजरात सरकार के संरक्षण में मुसलमानों का क़त्ले-आम, पूर्वोत्तर में मानवाधिकार उल्लंघन और जनजातीयों के ख़िलाफ़ कार्रवाई के दस्तावेज़ के रूप में हैं.

और अगर कुछ देश भारत में होने वाले राष्ट्रमंडल खेलों का बहिष्कार करें, तो हम इसे ग़लत नहीं ठहरा सकते. आप ये क्यों सोचते हैं कि अमरीका और ब्रिटेन बहिष्कार के बारे में सोच भी नहीं सकते?

इराक़ पर हमला करने और क़रीब चार लाख नागरिकों के ख़ून से रंगे हाथ होने के बाद उनके पास क्या नैतिक अधिकार है कि वे ओलंपिक खेल के बहिष्कार की बात करें.

वर्ष 2012 के लंदन ओलंपिक के सामने भी इसी तरह की समस्या आ सकती है. अमरीका भी 2016 के ओलंपिक की मेज़बानी हासिल करने का प्रयास कर रहा है और मेज़बान का नाम तय हो जाने के बाद इराक़ युद्ध उसे भी परेशान कर सकता है.

विचार

इस खेल में कोई भी संत नहीं है और हममें से ज़्यादातर पापी हैं. ऐसा एमनेस्टी इंटरनेशनल की रिपोर्ट से भी पता चलता है. इस सूची में सिर्फ़ पाँच ऐसे देश हैं, जिनके ख़िलाफ़ मानवाधिकार उल्लंघन के मामले नहीं के बराबर हैं.

और ये देश हैं- नीदरलैंड्स, नॉर्वे, डेनमार्क, आइसलैंड और कोस्टा रिका. ये कोई बुरा विचार नहीं है कि इन्हीं पाँचों देशों में बारी-बारी से ओलंपिक खेल कराए जाए ताकि उन देशों को बचाए जा सके, जो अपने स्वार्थ के लिए दूसरों का दमन करने के अपराध बोध से मुक्त हो सकें.

इसके अलावा इस मामले का एक व्यावसायिक पहलू भी है. जिसकी कोई भी बात नहीं कर रहा है. अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति एक अहम मुद्दा उठा रही है जब वह उन सभी नेताओं को पाखंडी कहती है जो चीन के साथ व्यापार करने में तो ख़ुश हैं लेकिन ओलंपिक का बहिष्कार करना चाहते हैं.

ऐसा लगा जैसे हेन वरब्रुगेन ने कई लोगों की भावनाओं को आवाज़ दे दी. उन्होंने कहा- उन राजनेताओं के लिए मेरे पास कम ही श्रद्धा है जो चीन आकर बड़े व्यापारिक समझौते पर हस्ताक्षर करते हैं और तीन-चार महीने बाद ये कहते हैं कि वे ओलंपिक खेलों के उदघाटन समारोह में नहीं आ सकते.

आईओसी ने ऑस्ट्रेलिया के मूल निवासियों के मानवाधिकार रिकॉर्ड का भी हवाला दिया और बताया कि कैसे उन्होंने 2000 के सिडनी ओलंपिक के समय इस मामले को जान-बूझकर हवा नहीं दी.

पहलू

प्रायोजकों के साथ भी पैसे का पहलू जुड़ा हुआ है. क्योंकि बीजिंग ओलंपिक में लाखों-लाख डॉलर दाँव पर लगे हैं. एडिडैस, कोका कोला, मैकडोनल्ड्स, पैनासोनिक, सैमसंग इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड, स्वाच ग्रुप, एजी ओलंपिक खेलों से जुड़ने के लिए लाखों डॉलर दे रहे हैं.

ये वैसी कंपनियाँ हैं, जो चीन में व्यापार के मामले में आगे-आगे रहती हैं. अगर ये चाहें तो वे चीन पर दबाव भी डाल सकते हैं कि वह तिब्बत में संयम दिखाए क्योंकि अगर खेलों का बहिष्कार हुआ तो उनका बहुत बड़ा नुक़सान होगा.

आमिर का विकल्प
 भारत में फ़िल्म अभिनेता आमिर ख़ान का कहना है कि उनका दिल तिब्बती लोगों के लिए रोता है, लेकिन वे ओलंपिक मशाल लेकर दौड़ेंगे क्योंकि उनका मानना है कि ओलंपिक चीन का नहीं है. हो सकता है कि आमिर ख़ान का एक पक्ष हो लेकिन कोका कोला के ब्रैंड एम्बैसडर होने के नाते क्या उनके पास ना कहने का कोई विकल्प भी था?

भारत में फ़िल्म अभिनेता आमिर ख़ान का कहना है कि उनका दिल तिब्बती लोगों के लिए रोता है, लेकिन वे ओलंपिक मशाल लेकर दौड़ेंगे क्योंकि उनका मानना है कि ओलंपिक चीन का नहीं है.

हो सकता है कि आमिर ख़ान का एक पक्ष हो लेकिन कोका कोला के ब्रैंड एम्बैसडर होने के नाते क्या उनके पास ना कहने का कोई विकल्प भी था?

एक खिलाड़ी के नज़रिए से इस मामले का अन्य पहलू भी है. अमरीका के यूटा प्रांत के रहने वाले एथलीट हेनरी मार्श का उदाहरण लीजिए. वे चार बार ओलंपिक में लंबी दूरी की दौड़ प्रतियोगिताओं में हिस्सा ले चुके हैं.

अहसास

वर्ष 1979 में उन्होंने मॉस्को में हुई एक प्रतियोगिता जीती थी. वे याद करते हैं कि कैसे शीत युद्ध के उस चरम विंदु पर वे शीर्ष पायदान पर चढ़े और पदक लिया और लेनिन स्टेडियम में अमरीकी झंडा लहराया.

हेनरी मार्श कहते हैं- ये मेरे करियर के सर्वश्रेष्ठ दौर में से एक था. मेरे रोंगटे खड़े हो गए थे. ये इस बात का भी संकेत है कि हमें खेल को राजनीति से अलग रखने की क्यों ज़रूरत है.

लेकिन अगले साल ही मॉस्को ओलंपिक के बहिष्कार के कारण हेनरी मार्श इस खेल में हिस्सा नहीं ले सके. उन्होंने कहा था- वो ग़लत था. बहिष्कार के कारण जिन लोगों को चोट पहुँची वे सिर्फ़ एथलीट ही थे.

आठ साल बाद सोवियत संघ अफ़ग़ानिस्तान से हट गया लेकिन बहिष्कार के कारण नहीं. बल्कि इसलिए क्योंकि वे अफ़ग़ान विद्रोहियों को हरा नहीं सके.

और सिर्फ़ याद ताज़ा करने के लिए बता दें कि अमरीका ने ही उन अफ़ग़ान विद्रोहियों की वित्तीय मदद की थी. उनमें से कई आज अमरीका की 'आतंकवादियों की सूची' में हैं.

इस मामले को ज़्यादा जटिल न बनाते हुए ये कहना पर्याप्त होगा कि जब एक एथलीट अपनी महत्वाकांक्षा को दरकिनार कर विरोध करने का फ़ैसला करता है, तो उसके साहस और जज़्बे को सलाम करना चाहिए.

ब्लैक पॉवर

वर्ष 1968 के ओलंपिक को कौन भूल सकता है. जिसमें काले खिलाड़ियों ने अपनी शक्ति दिखाई थी. ओलंपिक खेलों के इतिहास में ये ओलंपिक मानवाधिकार उल्लंघन के विरोध के लिए जाना जाता है.

1968 ओलंपिक में हुआ था विरोध

अफ़्रीकी मूल के अमरीकी एथलीट टॉमी स्मिथ और जॉन कार्लोस 200 मीटर की दौड़ में पहले और तीसरे नंबर पर आए. उन्होंने बिना जूते पहने पदक स्वीकार किया. उन्होंने काले लोगों में ग़रीबी को सांकेतिक रूप से प्रदर्शित करते हुए काली जुराबें पहनी.

स्मिथ ने विश्व रिकॉर्ड तोड़ा था. उन्होंने काले लोगों के सम्मान का प्रतिनिधित्व करते हुए काला मफ़लर भी पहना. कार्लोस ने काले रंग के मनकों की माला पहनी थी. उनका कहना था कि उन्होंने ये उन लोगों के लिए पहना था, जो मार दिए जाते हैं और कोई उनके लिए प्रार्थना भी नहीं करता.

स्मिथ ने दाएँ हाथ में दस्ताना पहना था तो कार्लोस ने बाएँ हाथ में. और जब अमरीकी राष्ट्रध्वज लहराया तो उन्होंने झुक कर सलाम किया. दूसरे दिन अख़बारों के पहले पन्ने पर इन दोनों खिलाड़ियों छाए रहे.

बाद में स्मिथ ने कहा था- अगर मैं जीतता हूँ तो मैं अमरीकी हूँ, लेकिन जब मैं कुछ भी बुरा करता हूँ तो वे कहते हैं कि मैं नीग्रो हूँ. हम काले हैं और हमें इस पर गर्व है. अमरीका की काली आबादी ये समझेगी कि हमने क्या किया है.

भले इस तरह का विरोध कम ही होता है. लेकिन ये ऐसे तबसे से आता है जो दाग़ी नहीं है और जो ख़ुद प्रभावित रहे हैं या फिर उन्होंने प्रभावितों का दर्द महसूस किया है.

इसके अलावा जो कुछ भी हो रहा है, वो पाखंड के सिवा और कुछ नहीं.

(लेखक हिंदुस्तान टाइम्स स्पोर्ट्स के सलाहकार हैं)

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