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शनिवार, 22 मार्च, 2008 को 10:56 GMT तक के समाचार
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सुलगते तिब्बत पर भारत की ख़ामोशी

प्रदर्शनकारी
तिब्बत के घटनाक्रम पर भारत ने बहुत ही सधी हुई प्रतिक्रिया दी है जिसे विशुद्ध रूप से राजनयिक प्रतिक्रिया ही कहा जाएगा.
भारत में हिमाचल प्रदेश का शहर धर्मशाला आजकल सूरज उगने से लेकर सूरज डूबने तक नारों से गूँजता रहता है. इनमें से ज़्यादातर नारे चीन के ख़िलाफ़ होते हैं.

पर लगभग उतने ही नारे ऐसे भी होते हैं जिनमें भारत का नाम बार-बार आता है. प्रदर्शनकारी लगातार नारों के ज़रिए यह कहने की कोशिश कर रहे हैं कि भारत को चीन के दबाव में नहीं आना चाहिए और न ही भारत को चीन पर भरोसा करना चाहिए.

तिब्बत में दस मार्च से शुरू हुए घटनाक्रम के समर्थन में भारत में तिब्बती शरणार्थियों के सबसे बड़े और महत्वपूर्ण केंद्र धर्मशाला में लगातार विरोध प्रदर्शन चल रहे हैं.

भारत की प्रतिक्रिया

 मैं जानता हूँ कि कुछ लोग मेरी आलोचना करते हैं और वे मेरे रास्ते से सहमत नहीं हैं. ये उनका अधिकार है. पर उनसे मिलने पर मैं कहता हूँ कि तिब्बतियों के सामने आज अपनी संस्कृति को बचाने का सवाल है. समय बहुत कठिन है और बहुत सोच समझकर कोई कदम उठाने की ज़रूरत है.
दलाई लामा

इन प्रदर्शनों का मक़सद चीन की राजधानी बीजिंग में होने वाले ओलंपिक खेलों के बहाने दुनियाभर का ध्यान तिब्बत के मुद्दे की तरफ़ खींचना बताया जा रहा है.

अगर तिब्बत में चल रहे विरोध प्रदर्शन में शामिल लोगों या फिर उनके समर्थन में तिब्बती शरणार्थियों के इस मक़सद की कामयाबी की बात की जाए तो कहा जा सकता है कि उन लोगों को इतनी कामयाबी तो मिल ही गई है कि तिब्बत का मुद्दा ख़बरों में लगातार बना हुआ है.

लेकिन जिस अंतरराष्ट्रीय समर्थन की अपेक्षा प्रदर्शनकारी और उनके नेता करते हैं, उसमें कामयाबी से वे काफ़ी दूर नज़र आते हैं.

भारत की प्रतिक्रिया पर दलाई लामा की राय पूछे जाने पर वे कहते हैं कि तिब्बत का सवाल आने पर भारत कुछ ज़्यादा ही सतर्क होकर प्रतिक्रिया देता है. लेकिन दलाई लामा भारत की आलोचना खुलकर नहीं करते हैं.

भारत दबाव में?

दूसरी ओर शरणार्थियों का एक तबका मानता है कि दलाई लामा भारत सरकार के दबाव में काम कर रहे हैं और भारत सरकार चीन के दबाव में है.

दलाई लामा भी यह स्वीकार करते हैं कि तिब्बतियों का एक तबका ऐसा है जो उनसे सहमत नहीं है.

दलाई लामा और भारत की प्रतिक्रिया से सहमत नहीं होने वालों में तिब्बत यूथ कॉग्रेस और नेशनल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ तिब्बत समेत कुल पाँच संगठन शामिल हैं.

ये संगठन दलाई लामा की स्वायत्तता की माँग से सहमत नहीं हैं. इनका मानना है कि दलाई लामा को तिब्बत की पूर्ण आज़ादी की माँग के लिए काम करना चाहिए.

इन संगठनों का मानना है कि भारत का मौजूदा रवैया चीन के दबाव का परिणाम है.

तिब्बत यूथ कॉग्रेस की एक प्रतिनिधि डोल्मा चोफेल कहती हैं, “सिर्फ़ मानवाधिकारों की बात हो तो बहुत से अंतरराष्ट्रीय लोग तिब्बत की समस्या उठाते हैं. लेकिन यदि राजनीतिक स्तर पर बात करें तो बहुत ही कम ऐसा होता है जब तिब्बत का मुद्दा उठाया जाता है. ये तो हम भी समझते हैं. भारत सरकार ने हम तिब्बत वासियों को जो शरणार्थी का दर्जा दिया है, वो सबसे अहम बात है. हम जानते हैं कि हमारी तिब्बत की आवाज़ और माँग को भारत सरकार खुलकर नहीं कह सकती. हम भारत सरकार के राजनयिक कारणों को भी जानते हैं.”

अमंसजस की स्थिति

 संघर्ष तो संघर्ष है. फिर वह किसी छोटे देश के साथ हो या चीन जैसे बड़े देश के साथ. छोटे-बड़े सभी देशों के मानवाधिकार एक समान ही होते हैं. हमारा संघर्ष जारी रहेगा.
डोल्मा चोफेल

लेकिन भारत के सामने बड़ा सवाल प्रदर्शनकारी तिब्बतियों की अपेक्षा के अनुरूप प्रतिक्रिया और चीन के लिए ओलंपिक खेलों को मुश्किल बनाने वालों का साथ देने या ना देने का है.

हालाँकि इस माँग का समर्थन करने वाले भी लगातार अपनी बात कहते हुए अख़बारों और पत्रिकाओं में इस बहस को चला रहे हैं.

नेशनल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ तिब्बत के नेता चिम्यू वांगडूंग कहते हैं, “भारत सरकार का रवैया है अभी तक अस्पष्ट है. हम भारत की सुरक्षा और उनके लोगों को कोई नुकसान नहीं पहुंचा रहे हैं. हमने भारत सरकार के विरोध में क्या किया है? हमें समझ में नहीं आता कि भारत सरकार आख़िर चाहती क्या है? फिर भी हम भारत सरकार से उम्मीद रखते हैं कि वह हमारी शांति यात्रा को न रोके.”

हितों की सुरक्षा

 जिन लोगों ने दस मार्च से चीन सीमा की तरफ कूच किया है, उस मार्च को लेकर भारत सरकार को कुछ परेशानी है और मैंने उन संगठनों से अपील की है कि वे टकराव का रास्ता न अपनाएं और कोई ऐसा कदम न उठाएँ जिससे भारत को किसी तरह की दिक्कत आए. मैंने उन्हें टकराव के रास्ते पर चलने के परिणामों के बारे में सचेत कर दिया है. अब फ़ैसला उनका है.
दलाई लामा

राजनयिक मामलों के जानकारों में से अधिकतर मानते हैं कि भारत को सतर्कता से न केवल तिब्बत के आंदोलन के प्रति नैतिक समर्थन दिखाना चाहिए साथ ही इस बात का भी ध्यान रखना चाहिए कि वह किसी भी सूरत में ऐसे देश के रूप में नज़र नहीं आए जो चीन विरोधी गतिविधि में शामिल है और वहाँ होने वाली ओलंपिक गतिविधियों को मुश्किल बनाने का काम कर रहा है.

जानकारों की नज़र में भारत के लिए ऐसा करना राष्ट्रीय हित में नहीं होगा.

कुछ ऐसी ही राय रखने वाले राजनयिक मामलों के जानकार बी रमन ने अपने एक लेख में भारत की पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का उदाहरण देते हुए लिखा है.

उनका कहना है कि जब कुछ देशों ने वर्ष 1980 में अफ़गानिस्तान के नाम पर रूस में ओलंपिक खेलों का विरोध किया था तो इंदिरा गांधी ने राष्ट्रहित में नहीं होने के कारण इस मुहिम को अपना समर्थन देने से इंकार कर दिया था.

सिर्फ़ राजनयिक ही नहीं, भारत के आम आदमी को भी कहीं न कहीं ये अहसास ज़रूर है कि चीन एक बड़ी आर्थिक शक्ति है जिससे रिश्ते बिगाड़ने में भारत की बुद्धिमानी नहीं होगी.

हालाँकि तिब्बती आंदोलनकारी भारत से ज़िम्मेदार लोकतांत्रिक देश की तरह व्यवहार करने और चीन की शक्ति के सामने नहीं झुकने की अपेक्षा करते हैं.

लेकिन क्या भारत के लिए ऐसा करना आसान है? शायद इसका जबाव बिल्कुल नहीं होगा और ऐसी कोई संभावना फिलहाल नज़र भी नहीं आ रही है.

बल्कि भारत की कोशिश है कि दलाई लामा जैसे परिपक्व नेता पर दबाव बनाकर वह शरणार्थी तिब्बतियों के उन संगठनों को काबू में रखे जो टकराव का रास्ता अपनाकर भारत से चीन सीमा में प्रवेश करने की योजना पर काम कर रहे हैं.

ये बात साफ़ है कि तिब्बत के आंदोलन में शामिल संगठन और लोग ओलंपिक खेलों के बहाने चीन के ख़िलाफ़ एक माहौल तैयार करने की कोशिश कर रहे हैं.

लेकिन यदि इस कोशिश में वे भारत का समर्थन जुटाने या भारत की धरती पर खड़े होकर चीन की सरकार से टकराने का विचार रखते हैं तो वे ग़लत हैं क्योंकि भारत और चीन के रिश्तों की पेचीदगी और नज़ाकत सर्वविदित है.

जबकि दूसरी ओर रिश्तों को सामान्य बनाने की कोशिशें लगातार जारी हैं. ऐसी दशा में भारत तिब्बत के सवाल पर चीन से शायद ही कोई टकराव मोल ले.

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