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शनिवार, 15 मार्च, 2008 को 11:05 GMT तक के समाचार
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तिब्बत ने बढ़ाई बीजिंग की उलझन

हू जिंताओ, चीनी राष्ट्रपति
ओलंपिक के कारण दुनिया की नज़र चीन पर है और तिब्बत में विरोध मुश्किलें पैदा कर रहा है
चीन के लिए तिब्बत में हिंसक प्रदर्शनों का इससे ज़्यादा बुरा समय कोई और नहीं हो सकता था, ओलंपिक सिर पर हैं और चीन के शीर्ष नेता नहीं चाहते कि यह विरोध उसकी पहचान बन जाएँ.

तिब्बत स्वायत्तशासी क्षेत्र की सरकार के कई नेता इस समय चीनी संसद के वार्षिक अधिवेशन के लिए बीजिंग में जुटे हुए हैं.

कुछ दिन पहले ही तिब्बती नेताओं से भेंट के दौरान चीनी राष्ट्रपति हू जिंताओ ने उनसे तिब्बत में जीवन स्तर सुधारने और क्षेत्र में शांति व स्थिरता लाने की दिशा में काम करने कहा था.

लेकिन तिब्बत में चीनी शासन का विरोध कर रहे लोग अपनी बात दुनिया को बताने का यह सुनहरा मौक़ा गँवाना नहीं चाहते क्योंकि इसी साल होने वाले ओलंपिक के कारण सबकी नज़र चीन पर है.

विरोध कर रहे लोग तिब्बत में मानवाधिकार हनन के मामलों को इस समय मुखर आवाज़ देना चाहते हैं जिसकी गूँज दूर तक सुनाई दे.

ये लोग चाहते हैं कि तिब्बत को और ज़्यादा राजनीतिक और धार्मिक स्वायत्तता दी जाए.

दूसरा बर्मा..?

तिब्बत के अलावा दूसरे देशों में रह रहे तिब्बती के लोगों ने भी ल्हासा में चल रहे आंदोलन के समर्थन में प्रदर्शन और मार्च आयोजित किए हैं.

ल्हासा में विरोध प्रदर्शन
चीन की उलझन है कि दमन में ख़ून बह सकता है और नहीं रोकने पर विरोध का दायरा बढ़ सकता है

शुक्रवार को चीनी सुरक्षा बल जहाँ ल्हासा में भड़की हिंसा को छुपाने की कोशिशों में लगे थे वहीं लंदन में चीनी दूतावास के सामने तिब्बती लोग प्रदर्शन कर रहे थे.

भारत में निर्वासित जीवन जी रहे तिब्बतियों ने विरोध जताने के लिए गत सोमवार को तिब्बत वापसी यात्रा शुरू की थी जिसे भारतीय पुलिस ने रोक दिया.

चीन सरकार के सामने 'क्या करे और क्या न करे' की स्थिति पैदा हो गई है.

चीन निश्चित तौर पर नहीं चाहता कि ओलंपिक खेलों की शुरुआत से ठीक पाँच महीने पहले कोई ख़ून-ख़राबा हो.

सरकार नहीं चाहेगी कि ऐसी कोई घटना यहाँ हो जैसा कि पिछले साल बर्मा में बौद्ध भिक्षुओं के आंदोलन के दौरान हुआ था.

दूसरी तरफ़ वे बौद्ध भिक्षुओं और विरोध कर रहे तिब्बतियों के आंदोलन के लगातार बढ़ने को रोकना भी चाहेंगे.

सरकार को भय है कि अगर विरोध पर अंकुश नहीं लगाया गया तो प्रदर्शनकारी इसे उसकी कमज़ोरी मान लेंगे और इससे अशांति को बढ़ावा मिलेगा.

चीनी नेताओं के सामने ताइवान और शिंज़ियांग के विवादित हिस्सों के साथ-साथ तिब्बत सबसे बड़ा सिरदर्द साबित हो रहा है. अब तक चीन इस तरह के विरोध-प्रदर्शनों से साम और दंड नीति के साथ निपटता रहा है.

सरकार ने तिब्बत में लोगों का जीवनस्तर सुधारने की कोशिश में ख़ूब पैसा लगाया है. ल्हासा के लिए रेल सेवा की शुरुआत को अधिकारी इस बात का सबूत बनाकर पेश करते हैं कि सरकार इलाक़े के लोगों की भलाई के लिए काम करना चाहती है.

विरोध का इतिहास

तिब्बत के लोगों की शिकायत है कि सरकारी निवेश का फ़ायदा सिर्फ़ क्षेत्र में रह रहे चीनी मूल के हैन समुदाय को मिला है.

तिब्बती बौद्ध भिक्षु
तिब्बत में बड़े पैमाने पर हो रहे निवेश को तिब्बत के लोग अपनी संस्कृति के लिए ख़तरा मानते हैं

इन लोगों का मानना है कि सरकार यह सब तिब्बती संस्कृति के असर को कम करने, यहाँ तक कि ख़त्म करने की मंशा से कर रही है.

तिब्बत को और स्वायत्तता के सवाल पर तिब्बतियों के आध्यात्मिक गुरू दलाई लामा और चीन सरकार के बीच बातचीत की कोशिशें तो हुई हैं लेकिन इस दिशा में कोई ख़ास सफलता नहीं मिली.

चीनी सैनिकों के 1950 में इस इलाक़े में प्रवेश के बाद से विरोध और विद्रोह तिब्बती संस्कृति का एक हिस्सा बन गए हैं.

इस सप्ताह विरोध की लहर तिब्बती विद्रोह की 49वीं बरसी पर उठी है. 1959 में इसी समय विद्रोह के विफल हो जाने के बाद दलाई लामा वहाँ से भाग गए थे और उन्होंने भारत में राजनीतिक पनाह ली थी. दलाई लामा तब से भारत में निर्वासित ज़िंदगी बिता रहे हैं.

तिब्बत में आख़िरी व्यापक आंदोलन 1989 में हुआ था. इसके कुछ दिन बाद ही बीजिंग में थ्येन आनमन चौराहे पर लोकतंत्र की माँग कर रहे नौजवानों पर गोलियाँ की बौछार की गई थी.

चीनी राष्ट्रपति हू जिंताओं उस समय तिब्बत में चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के सचिव थे. देश के नेताओं ने उस आंदोलन को नियंत्रित करने के उनके तरीक़ों की तारीफ़ की थी.

जिंताओ तिब्बत में उस आंदोलन के क़रीब 20 वर्ष बाद शुरू हुए इस आंदोलन को जल्दी से उसी तरह ख़त्म कराने के लिए बेताब होंगे.

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