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शनिवार, 28 जून, 2008 को 15:47 GMT तक के समाचार
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और भी खेल हैं ज़माने में क्रिकेट के सिवा

भारत में फुटबॉल बेहद पिछड़ा हुआ है
अच्छा बताइए खेल खेलना अच्छा है या फिर इसे देखना? माफ़ कीजिए, यह सवाल उनके लिए नहीं है जो सोचते हैं कि खेल सिर्फ़ क्रिकेट ही है.

इस हक़ीक़त का सामना कीजिए कि क्रिकेट ही सब कुछ नहीं है जीवन में इससे भी बढ़कर कुछ है.

भले ही हम मानें कि दुनिया में हम क्रिकेट की बड़ी ताक़त हैं, लेकिन इस सच्चाई से मुंह नहीं फेरा जा सकता कि जब विश्व में सबसे ज़्यादा खेले जाने वाले खेल की बात आएगी तो अफ़सोस होगा कि क्रिकेट तो कुछ राष्ट्रमंडल देशों तक ही सीमित है.

फ़ुटबॉल में हम कहीं नहीं दिखते और दुनिया में 154वें स्थान पर हैं. जब भारत का मध्यवर्ग गाहे-बगाहे ये पाता है कि खेल में फ़ुटबॉल ही दुनिया का वैश्विक चेहरा है तो फिर वे यह सोचने को मज़बूर हो जाते हैं कि उनका देश फ़ुटबॉल के इस नक्शे से नदारद क्यों है?

इसका दोष भी आसानी से लालची और घूसख़ोर खेल प्रशासकों पर मढ़ दिया जाता है. यह तर्क ख़ासा पेचीदा है कि फ़ुटबॉल आम आदमी या कामकाजी तबके का खेल है और जब तक देश का एकसमान विकास नहीं होता तब तक भारत खेलों में वर्चस्व रखने वाला देश नहीं बन सकता.

ऐसी काल्पनिक धारणाओं पर माथापच्ची करने की बजाय कोई टेलीविज़न धारावाहिक देखना ज़्यादा अच्छा है.

उदासीनता

कुछ ऐसी ही कहानी दूसरे खेलों को लेकर भी है, फिर चाहे वह एथलेटिक्स हो, जिम्नास्टिक या फिर तैराकी. भारत इन खेलों में दुनिया के नक्शे पर कहीं नहीं है.

भारतीय एथलीट एशियाई और कॉमनवेल्थ गेम्स से आगे नहीं जा पाते

जब तक हम व्यवस्था में इस असंतुलन को दूर नहीं कर देते तब तक हम क्रिकेट की अहमियत की डीगें हांकते रहेंगे और ऐसा दिखाते रहेंगे मानो उन्हें सिर्फ़ इसी खेल से मतलब है.

लेकिन ये मत भूलिए कि दुनिया में दर्शकों का सबसे बड़ा हिस्सा हम हैं. मसलन, ऐसी ख़बरें हैं कि इंग्लैंड में टेलीविज़न पर इस साल का यूरो कप देखने वालों की तादाद निचले स्तर पर आ गई क्योंकि उनकी टीम इस टूर्नामेंट के लिए क्वालीफाई नहीं कर सकी थी.

हैरानी नहीं होनी चाहिए कि भारत के शहरी इलाक़ों में इस टूर्नामेंट को देख रहे भारतीय जुनून के मामले में उन यूरोपीय दर्शकों से कहीं आगे हैं जिनकी टीमें इस टूर्नामेंट में भिड़ रही हैं.

यहां तक कहा जा रहा है कि युवाओं के इस खेल के प्रति इस दीवानगी को देखकर लगता है कि फ़ुटबॉल भारत में तेज़ी से लोकप्रिय हो रहा है और इसके विकास में मददगार होगा.

अगर ऐसा होता है तो बहुत अच्छा, हालाँकि भारत में बच्चों ने असली मैदान पर तो नहीं लेकिन वीडियो गेम्स में फ़ुटबॉल खेलने में महारत हासिल कर ली है. मुझे पक्का यकीन है कि अगर फ़ुटबॉल की वीडियो गेम्स विश्व चैंपियनशिप होती है तो हम ख़िताब के प्रबल दावेदार होंगे.

मुझे संदेह है कि भारत के शहरी युवाओं को उंगलियों से गोल करने में जितनी महारत हासिल है, शायद ही दुनिया का कोई और देश इसका मुक़ाबला कर सकता है.

यूरो कप की आखिरी जंग में जर्मनी और स्पेन के बीच ताक़त, रणनीति और बेहतरीन शैली का चश्मदीद बनने के लिए ख़ुद को तैयार कर लीजिए और हैरान होने की ज़रूरत नहीं है अगर इस मुक़ाबले को देखने वालों की तादाद आईपीएल फ़ाइनल के दर्शकों से अधिक हो.

कुल मिलाकर ये कहना ठीक रहेगा कि अगर हम खेल खेल नहीं सकते तो उसकी तारीफ़ करना तो हमें आना ही चाहिए.

(लेखक हिंदुस्तान टाइम्स स्पोर्ट्स के सलाहकार हैं)

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