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नहीं चढ़ा है फ़ुटबॉल पर बदलाव का रंग | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
फ़ुटबॉल मैच देखना अपने आप में ग़ज़ब का अनुभव होता है. क्रिकेट से विपरीत जहाँ नियम बहुत हद तक बदल गए हैं, फ़ुटबॉल ने अपने मूल ढाँचे में कोई ख़ास बदलाव नहीं किया है. हमारे समय के मार्केटिंग गुरु बता सकते हैं कि फ़ुटबॉल आज के समय के लिए ही बना था, इसलिए उस व्यक्ति का सम्मान करना चाहिए जिसने सदियों पहले इस खेल का इजाद किया था. वो व्यक्ति ज़रूर कोई दार्शनिक रहा होगा जिसके पास भविष्य में झांकने की क्षमता रही होगी, जिसे एहसास होगा कि मनोरंजन का मूल्य इसमें नहीं है कि वो कितना लंबा है बल्कि इसमें कि वो कितने कम समय में किया जा सकता है. जब हमें बताया जाता है कि आज की पीढ़ी के पास वो खेल देखने का समय या धैर्य नहीं है जो पाँच दिन या फिर पूरे एक दिन चलता हो तो आप वाकई फ़ुटबॉल जैसे खेल को लेकर आश्चर्य करते हैं. ये खेल आज के अधीर समय के लिए ही बना है. इस खेल की ख़ूबी है कि इसमें दक्षता है, इसमें कुशाग्रता चाहिए और कभी-कभी ये धीमा भी होता है- भले ही इस खेल की अवधि कम है. कोई भी ज़बरदस्ती मनोरंजन को आपके गले उतारने की कोशिश नहीं करता और न ही कोई चिल्ला-चिल्ला कर बोलता है कि छोटी अवधि का खेल ही बेहतरीन है. अगर फ़ुटबॉल की समयसीमा को दोगुना कर दिया जाए या आधा कर दिया जाए तो वो फ़ुटबॉल नहीं रहेगा. खेल की दुनिया में क्रांति? ये सब मुझे फिर क्रिकेट की ओर ले जाता है और उसके दैत्यकारी रुप की ओर जिसे ट्वेन्टी-20 कहते हैं. ये नई तरह का मनोरंजन है और अगर मार्केंटिंग के जादूगरों की माने तो ये किसी दिन फ़ुटबॉल की लोकप्रियता को भी चुनौती दे सकता है. अगर भारत में लाखों लोग तीन घंटे की फ़िल्म देख सकते हैं और अपना मनोरंजन कर सकते हैं, तो मुझे कोई वजह नज़र नहीं आती कि दुनिया भर में लोग मैदान पर साढ़े तीन घंटे के असली ड्रामे का आनंद उठाने के आदी क्यों नहीं हो सकते. क्या पता अब से एक सदी बाद लोग ललित मोदी के कमाल पर अचरज करें जो खेल की दुनिया में क्रांति लेकर आए! मैदान पर खिलाड़ियों को भिड़ते देखने के लिए क्या 90 मिनट कुछ ज़्यादा ही कम और सात घंटे कुछ ज़्यादा ही लंबा समय नहीं है? सही तालमेल शायद मैदान पर साढ़े तीन घंटे का खेल होगा. सिर्फ़ भारत और ललित मोदी ही ऐसे नहीं है जिन्हें वो सही संतुलन मिल गया है जिससे क्रिकेट को भविष्य का खेल बनाया जा सकता है. एक अमरीकी शख़्स हैं ऐलन स्टेनफ़ोर्ड. वे शायद पहले व्यक्ति होंगे जिन्होंने ट्वेन्टी-20 की क्षमता को पहचाना और वेस्टइंडीज़ में एक लीग शुरु की. ट्वेन्टी-20 का फॉर्मेट तो बाद में सामने आया. अब वो इंग्लैंड और वेस्टइंडीज़ के बीच तीन मैचों की प्रतियोगिता के विजेता को 80 करोड़ इनाम में देने वाले हैं. टेवन्टी-20 को दुनिया में खेल का नया चेहरा बनाने के लिए वे भी लाखों खर्च कर रहे हैं. माइट इज़ राइट
बीसीसीआई और ललित मोदी को शायद जलन हो रही होगी. वो इसलिए क्योंकि विश्व में क्रिकेट को पैसा कमाने वाला नंबर वन खेल बनाने की उनकी योजना के मुताबिक किसी भी ‘विद्रोही गुट’ की कोई जगह नहीं है. हम लोग सोचते हैं कि एक अंतरराष्ट्रीय संस्था है जिसे आईसीसी कहते हैं जो विश्व में क्रिकेट की गतिविधियाँ चलाती हैं. लेकिन अब शायद ये सच नहीं है क्योंकि ललित मोदी ने पहले ही घोषणा कर दी है कि प्रस्तावित चैंपियंस लीग में कौन हिस्सा लेगा- इसमें उनके लिए कोई जगह नहीं है कि जिन्होंने सुभाष चंद्रा की लीग में हिस्सा लिया था. ये तो छोटी सी बात है कि कम से कम 25 आईसीएल खिलाड़ी इंग्लिश काउंटी में खेलते हैं. और अगर कुछ रिपोर्टों की मानें तो इंग्लिश काउंटी इस बात को लेकर चिंतित है कि ललित मोदी के फ़ैसले के मुताबिक कई काउंटी के खिलाड़ी चैंपियंस लीग में नहीं खेल पाएँगे. ब्रितानी प्रभुत्व को चुनौती देने के खेल में शायद ये भारत की सबसे बड़ी जीत होगी. अंग्रेज़ चिंतित हैं और एक भारतीय की मर्ज़ी पर आश्रित हैं. वाह! ऐसी दुनिया जहाँ पैसा और ताकत ही सही होता है, भारत सही रास्ते पर जाता दिख रहा है. चैंपिंयस लीग से पहले जब क्रिकेट के विभिन्न गुटों के बीच झगड़े होंगे, .तब तक आप सिर्फ़ वो ‘ख़ूबसूरत खेल’ देखिए जो इनदिनों हर रात आपके टेलीवीज़न पर आता है. (लेखक हिंदुस्तान टाइम्स स्पोर्ट्स के सलाहकार हैं) |
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