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शुक्रवार, 14 मार्च, 2008 को 19:14 GMT तक के समाचार
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भारतीय हॉकी का वनवास

भारतीय हॉकी
भारतीय हॉकी के स्तर में गिरावट आई है
पहले तो मुझे यह स्वीकार करने में कोई हिचक नहीं है कि हॉकी मेरी पहली पसंद नहीं है. मेरी पहली पसंद क्रिकेट है और 25 साल की खेल पत्रकारिता का ज़्यादा समय मैंने क्रिकेट को ही दिया है.

लेकिन लाखों भारतीयों की तरह मैंने सम्मान के साथ हॉकी पर नज़र रखी है. पिछले कुछ वर्षों के दौरान अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हमें जितनी भी सफलता मिली है, उसका मैंने उमंग के साथ लुत्फ़ उठाया है.

इसलिए ये देखकर काफ़ी दुख होता है कि दुनिया में अपनी स्थिति और मज़बूत करने की बजाए हमारी हॉकी निराशा की दिशा में जा रही है.

लेकिन मैं वैसा भी नहीं कि भारतीय टीवी मीडिया की तरह इस मामले पर अपनी छाती पीटूँ और कहूँ कि राष्ट्रीय खेल अब राष्ट्रीय शर्म बन गया है.

हालाँकि मुझे उस समय काफ़ी सदमा लगता है जब भारतीय हॉकी फ़ेडरेशन के आका ओलंपिक की दौड़ से टीम के बाहर होने की फ़िक्र नहीं करते. 80 साल में पहली बार हमारी टीम ओलंपिक के लिए भी क्वालीफ़ाई नहीं कर पाई है.

अचंभा

लेकिन इस पर हॉकी फ़ेडरेशन के प्रमुख केपीएस गिल की प्रतिक्रिया मुझे अचंभे में डाल देती है. क़रीब 14 साल से इस पद पर बने गिल अपनी मूँछों पर ताव देते वे इसे भारतीय मीडिया का दुष्प्रचार कहते हैं. क्या इससे ज़्यादा शर्मनाक कुछ हो सकता है.

उन्होंने तो यहाँ तक कह दिया कि जो लोग उनसे इस्तीफ़ा मांग रहे हैं, वे विलाप करने वाले पेशेवर लोग हैं.

इसमें कोई शक नहीं कि हमारा राष्ट्रीय खेल दशकों पहले राष्ट्रीय शर्म बन गया था. लेकिन इसके पीछे सिर्फ़ भ्रष्ट प्रशासन और कार्यकुशल अधिकारियों की कमी ही वजह नहीं थी.

हॉकी को विनाश के गर्त में ले जाने के पीछे एक ही व्यक्ति है, अफ़सोस कि भारत की जनता उसे अपना बचाव करने वाला मानती है.

सारा देश केपीएस गिल का आभारी है, जिन्हें पंजाब से आतंकवाद का ख़ात्मा करने का श्रेय भी दिया जाता है. हालाँकि इस दौरान उन पर मानवाधिकार के हनन के भी गंभीर आरोप लगे.

लेकिन उनके जनसंपर्क तंत्र को शाबाशी देनी पड़ेगी कि भारतीय मीडिया न सिर्फ़ एक कड़क सुपरकॉप की तरह उनकी पीठ ठोंकता है बल्कि कवि और दार्शनिक के रूप में उनकी वाहवाही करता है.

पंजाब पुलिस में अपना कार्यकाल ख़त्म करने के बाद केपीएस गिल साहब ने अपनी नज़रें भारतीय हॉकी पर डाली और फ़ेडरेशन के प्रमुख बन गए. उनके पहले ही प्रेस कॉन्फ़्रेंस में स्टेट्समैन अख़बार के दो युवा पत्रकारों की जान पर बन आई थी.

रुख़

प्रेस कॉन्फ़्रेंस के दौरान इन पत्रकारों ने जब हॉकी प्रशासक के रूप में केपीएस गिल की क्षमता पर सवाल उठाए तो वहाँ मौजूद पंजाब पुलिस के जवानों ने इन युवा पत्रकारों की जम कर पिटाई की. उन्हें पुलिस स्टेशन भी ले जाया गया.

केपीएस गिल के कार्यकाल में हॉकी की दुर्दशा हुई

लेकिन स्टेट्समैन अख़बार ने इस पर कड़ा रुख़ अपनाया और केपीएस गिल को माफ़ी मांगनी पड़ी, जिसके वे आदी नहीं थे. इसके बाद तो भारतीय हॉकी फ़ेडरेशन में कुप्रशासन का दौर ही शुरू हो गया.

जिसने भी केपीएस गिल को चुनौती दी, चाहे वो खिलाड़ी थे, कोच थे या अधिकारी, उन्हें हटा दिया गया. एक वरिष्ठ भारतीय पुलिस सेवा की महिला अधिकारी के साथ छेड़खानी के मामले में तो गिल साहब को अदालत ने दोषी ठहराया.

कल्पना कीजिए कि जो व्यक्ति आपको ये प्रवचन देता है कि देश को कैसे चलाना चाहिए, उसे अदालत ने दोषी ठहराया. अब इससे ज़्यादा मैं क्या कहूँ.

मुझे याद है एक बार मैंने भी केपीएस गिल पर कई सवाल उठाते हुए हिंदुस्तान टाइम्स में एक कड़ा लेख लिखा था. उन्होंने इसे आसानी से नहीं लिया.

उन्होंने अपने प्रभाव का इस्तेमाल करते मुझे सज़ा दिलाने की कोशिश की. मैं भाग्यशाली था क्योंकि मेरी संस्था ने मेरा समर्थन किया.

मैं इससे भी वाक़िफ हूँ कि वे पत्रकारों को आँख दिखाने की कोशिश करते हैं, जो उनके प्रभाव और संपादकों से उनकी क़रीबी के कारण डरते हैं.

उनके बारे में ऐसी कई बातें कही जा सकती है, लेकिन इससे कोई बात बनती नहीं है. एक बार जब देश या सरकार किसी व्यक्ति को अपने फ़ायदे के लिए तैयार करती है.

लेकिन व्यापक अर्थ में समझौता करती है तो वह आख़िरकार उसी पर भारी पड़ता है. फिर भी सच तो यही है कि उसकी क़ीमत तो हम जनता को ही चुकानी पड़ती है.

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