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शनिवार, 16 अगस्त, 2008 को 14:55 GMT तक के समाचार
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अभिनव का कम बोलना घमंड नहीं है


अभिनव बिंद्रा छवि कुछ ऐसी है कि वे एकांतप्रिय व्यक्ति हैं जिन्हें अपने चारों तरफ़ लगी भीड़ अच्छी नहीं लगती, मीडिया की चकाचौंध भी उन्हें नहीं भाती. वे आम सेलिब्रिटी के खाँचे में आसानी से फिट नहीं होते.

वे एक विजेता की बनी-बनाई छवि से परे हैं जो हर वक़्त बढ़-चढ़कर यही कहता रहता है कि वह तो अपने देश के लिए खेलता है और उसे अपने देश से बहुत प्यार है.

वे बार-बार यह भी नहीं कह रहे कि उन्होंने बड़ी मेहनत की जिसका फल उन्हें मिला है.

विश्व चैम्पियन होना और उसका बखान न करना लोगों को टीवी के इस दौर बहुत अजीब लग रहा है, इस दौर में तो आप अपनी उपलब्धियों का ढोल जितनी ज़ोर से पीटें उतना अच्छा.

बिंद्रा ने जब अपना लक्ष्य भेदकर स्वर्ण पदक जीता तो अब तक की परंपरा के अनुरूप उन्हें उछलना और चीखना चाहिए था, उसके बाद थोड़ा रोना चाहिए था, तिरंगे की चादर लपेटकर स्टेडियम में दौड़ लगानी चाहिए थी और उसके बाद कहना चाहिए था कि उनका देश महान है जिस पर उन्हें गर्व है.

 अभिनव ने अपनी जीत को सही परिप्रेक्ष्य में देखा है और बताने की कोशिश है कि हम जब तक 40 मेडल नहीं जीतते हैं हम एक खेल शक्ति नहीं बन सकते

यह सब करने के बदले उन्होंने संयत भाषा में बात की, उनके चेहरे पर शांति झलक रही थी लेकिन कोई नहीं जानता कि उनके दिल में क्या था.

जो उन्हें जानते हैं वे यही कहेंगे कि वे हमेशा से ऐसे ही रहे हैं. उनका कम बोलना उनके अहंकार की निशानी नहीं है, वे सिर्फ़ दोस्तों के बीच खुलते हैं. इसके अलावा भूलना नहीं चाहिए कि अपने पदक के लिए वे किसी के एहसानमंद नहीं हैं, कुछ हद तक अपने परिवार को छोड़कर.

अभिनव ने कामयाबी भारतीय खेल व्यवस्था की वजह से नहीं बल्कि उसके बावजूद हासिल की है.

अभिनव बहुत कम बोले हैं लेकिन जितना भी बोले हैं सार्थक बात ही की है.

भारत में ऐसा कम ही होता है कि एक 25 वर्षीय खिलाड़ी की बेहतरीन उपलब्धि पूरे देश की भी सबसे बड़ी उपलब्धि हो. अभिनव ने अपनी जीत को सही परिप्रेक्ष्य में देखा है और बताने की कोशिश है कि हम जब तक 40 मेडल नहीं जीतते हैं हम एक खेल शक्ति नहीं बन सकते.

बिंद्रा ने कुछ क्रेडिट क़िस्मत को दिया, उन्होंने कहा, "यह मेरा दिन था." उन्होंने इस कम उम्र में ही बहुत उतार-चढ़ाव देखे हैं, एक दौर ऐसा भी था जब पीठ की तकलीफ़ की वजह से उनके शूटिंग करियर का अंत निश्चित लग रहा था.

जीत के जोश में वे अपने बुरे दिनों को नहीं भूले, अपनी विफलताओं को नहीं भूले. उन्होंने जिस तरह के धीरज और संयम का परिचय दिया उसने भारतीय स्वर्ण पदक विजेता को एक मानवीय चेहरा दिया है.

अभिनव कहते हैं कि पिछले 12 वर्षों से उन्होंने निशाना लगाने और ओलंपिक मेडल जीतने का सपना पालने के सिवा कुछ और नहीं किया.

कई बार सफ़र का लुत्फ़ मंज़िल पर पहुँचने से अधिक होता है. मंज़िल पर पहुँचकर बिंद्रा ने कहा, वे अपने अंदर एक ख़ालीपन महसूस कर रहे हैं.

यह बिल्कुल स्वाभाविक मानवीय प्रवृत्ति है जिसे हम सब जानते हैं, बिंद्रा ने अपनी चुप्पी और संयम के बावजूद हमें बहुत कुछ समझाया है जिसे हम जानते तो हैं लेकिन समझना नहीं चाहते.

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