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क्या कोई सुन रहा है इनकी आवाज़? | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
कांस्य पदक जीतने के बाद पहलवान सुशील कुमार को ये समझ में नहीं आ रहा था कि भारतीय प्रेस उनके पीछे इतने पागलपन के साथ क्यों पड़ा हुआ है. वो यह नहीं समझ पा रहे थे कि इतना हंगामा क्यों मचा हुआ है क्योंकि पहले भी वे कई एशियाई और अंतरराष्ट्रीय मुक़ाबलों में पदक जीत चुके हैं. लेकिन पहले उन्हें कभी एक स्टार जैसा रुतबा नहीं दिया गया. अपने लोगों से दिल्ली में फ़ोन पर बातचीत करने के बाद सुशील कुमार को पता चला कि उन्होंने जितना सोचा नहीं था, उन्हें उतनी पहचान मिली है. यह एक ऐसे व्यक्ति की प्रतिक्रिया थी, जो ग़रीबी से जूझता रहा है. कुश्ती की बात करें, तो सुशील कुमार के सामने इतने अवरोध थे कि उनके पास अपना कोच नहीं था और न ही मालिश करने वाला. लेकिन इन सब मुश्किलों के बावजूद बीजिंग में उन्होंने डेढ़ घंटे के अंतराल पर तीन-तीन मुक़ाबले में जीत हासिल की, पदक जीता और देश का सिर गर्व से ऊँचा किया. आवश्यकता लेकिन इसका बतंगड़ बनाने की क्या आवश्यकता? दरअसल ये सारी बातें हमें सचेत करती हैं, सावधान करती हैं. अभिनव बिंद्रा ने भी तो स्वर्ण पदक जीतने के बाद ऐसा ही कुछ कहा था.
अभिनव ने ओलंपिक में ऐसा प्रदर्शन कर दिखाया, जिससे हर देशवासी का सिर गर्व से ऊँचा हो गया. बिंद्रा ने वो कर दिखाया जो ज़्यादातर भारतीय सपने में भी नहीं सोचते थे. लेकिन शानदार जीत के बाद भी बिंद्रा ने एक सवाल उठाया कि हमें ओलंपिक में स्वर्ण पदक जीतने में इतने वर्ष क्यों लग गए. उन्होंने यह भी कह दिया कि अगर हम नियमित तौर पर ऐसा प्रदर्शन नहीं करेंगे तब तक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खेल शक्ति के रूप में हमारी पहचान नहीं बन पाएगी. सुशील से अलग बिंद्रा एक धनी परिवार से आते हैं. उनका ये भी मानना है कि माता-पिता की ओर से मिली वित्तीय सहायता के बिना वे ओलंपिक में स्वर्ण पदक नहीं जीत पाते. सुशील और अभिनव- ना ही इन दोनों का खेल अलग है बल्कि दोनों की पृष्ठभूमि में भी ज़मीन-आसमान का अंतर है. लेकिन जिस दिन इन दोनों खिलाड़ियों ने एक सपना पूरा किया, दोनों की प्रतिक्रिया एक जैसी ही थी. अभिनव धनी परिवार से आते हैं और सुशील एक ग़रीब परिवार से, लेकिन दोनों ने हम सभी तक यही बात पहुँचाई है कि कृपया हमारे पदक को अपना मत बनाइए. ये बात उन सभी भारतीय लोगों के लिए है जो एक नए भारत की कसमें खाते हैं और दुनिया में भारत की बढ़ती साख की बात करते हैं. पहचान ऐसा नहीं कि सुशील और अभिनव बिंद्रा को भारतीय होने पर गर्व नहीं या ओलंपिक में अपने देश की पहचान बनाने को लेकर वे उत्साहित नहीं है. वे तो सिर्फ़ ये कह रहे हैं कि आज वे जो कुछ भी हैं, वे अपने बलबूते पर हैं.
हमारे तीसरे पदक विजेता विजेंदर भी अभिनव की अपेक्षा सुशील के क़रीब हैं. दोनों ने ऐसे खेल में पदक जीता है जिसकी भारत में बेहतर परंपरा रही है. ख़ासकर कुश्ती की. अब यह हमारे देश पर निर्भर है कि वह पहलवानों को कीचड़ के गड्ढ़ों से निकालकर मैट्स में कुश्ती कराए, भिवानी बॉक्सिंग क्लब जैसे क्लबों को आधुनिक सुविधाएँ उपलब्ध कराए ताकि आने वाले ओलंपिक खेलों में हम और पदक जीत पाएँ और अपनी उपलब्धियों पर गर्व कर सकें. लेकिन ऐसा हो- इसके लिए हमें अपने टीवी चैनलों और खेल के पन्नों पर इन खेलों को जगह देनी पड़ेगी. हमेशा सिर्फ़ क्रिकेट और क्रिकेट की ही बात बंद करनी होगी. अन्यथा 15 दिनों तक चीखने-चिल्लाने से क्या फ़ायदा. हम 15 दिनों तक यही चिल्लाते रहते हैं कि हम ज़्यादा पदक क्यों नहीं जीत सकते और उसके बाद चार साल तक ऊंघते रहते हैं. भारत जैसे देश में बेहतरीन आर्थिक प्रगति के बावजूद जीवन दो हिस्सों में बँटा हुआ है. ऐसे खेल सरकार के लिए पहली प्राथमिकता तो नहीं होंगे. एक राष्ट्र के रूप में हम तभी आगे निकल पाएँगे जब ये खाई पूरी तरह भरी जाए. लेकिन उस समय भी खेलों की प्राथमिकता तय करने में कोताही और सरकारी धन के दुरुपयोग को न्यायोचित नहीं ठहराया जा सकता. क्योंकि इसी कारण हम कहीं नहीं है...ना इधर और ना ही उधर. अभिनव बिंद्रा, विजेंदर और सुशील ने हमें सचेत करने के लिए एक घंटी बजाई है. लेकिन क्या हम सुन रहे हैं? (लेखक हिंदुस्तान टाइम्स के खेल सलाहकार हैं) |
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