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कितना दम है अभिनव की आवाज़ में | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
ऐसा पहली बार हुआ. क़रीब महीनेभर तक क्रिकेटर के अलावा दूसरे खिलाड़ी मीडिया में छाए रहे और घर वापस आने पर उनका स्वागत भी हीरो की तरह हुआ. अभिनव बिंद्रा हर समाचारपत्र में छाए हैं. ऐसा होना भी चाहिए था. लेकिन सबसे अच्छी और दिल को सुकून देने वाली बात ये है कि उन्होंने व्यवस्था के ख़िलाफ़ अपनी आवाज़ बुलंद की है. ये आवाज़ एक ऐसे व्यक्ति की ओर से उठी है जिसने बीजिंग ओलंपिक में भारत की ओर से इतिहास रचा और जो व्यवस्था के बारे में बोलने से डरता नहीं है. भारत की ओर से ओलंपिक का पहला स्वर्ण पदक जीतना बहुत बड़ी उपलब्धि है, इससे शायद ही कोई इनकार कर सकता है. लेकिन खेल प्रबंधन पर इतनी साफ़गोई और निडर होकर उनका आवाज़ उठाना भी कम बड़ी बात नहीं. उम्मीद जब शीर्ष पर पहुँचा व्यक्ति बोलता है कि हमारी व्यवस्था में ख़राबी है तो इसका असर तो होना ही चाहिए. लेकिन क्या ऐसा होगा? उम्मीद तो की जानी चाहिए लेकिन लगता नहीं. जब हरसंभव कोशिश के बावजूद कुछ नहीं बदलता, तो लोग चिड़चिड़े हो जाते हैं. लेकिन उस समय आशा की किरण दिखाई देती है जब बिना डरे बोलने वाले अभिनव बिंद्रा जैसे खिलाड़ी सामने आते हैं. यह स्थिति हमारे प्यारे-दुलारे क्रिकेटरों से काफ़ी अलग है. हालाँकि वे क्रिकेट से काफ़ी पैसा बनाते हैं और उन्हें इसकी बदौलत लोकप्रियता भी मिलती है. लेकिन इन सबके बावजूद वे टीम में अपनी जगह बनाए रखने और करोड़ों रुपए कमाने के लिए स्वार्थी और लालची प्रबंधन के तीरों को बर्दाश्त करते रहते हैं. आजकल हमारे महान क्रिकेटर उसी समय किसी सार्वजनिक मंच पर बोलते हैं जब उनके प्रायोजकों को अपना सामान बेचने की आवश्यकता होती है. क्रिकेटर उस समय ना सिर्फ़ मीडिया से बात करते हैं बल्कि अपने ब्रांड को प्रोमोट करने के लिए दिल खोलकर बोलते हैं. ख़ामोश लेकिन क्रिकेटरों से अलग खिलाड़ी अन्य प्रजाति के हैं. वे दशकों से ख़ामोश रहे हैं और उन्हें इसका नुक़सान भी हुआ है. वे जब कुछ कहना चाहते हैं तो भी कोई उनकी सुनता नहीं है.
कोई यह जानना भी नहीं चाहता कि ये खिलाड़ी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर क्यों नहीं अच्छा प्रदर्शन कर सकते हैं. लेकिन एकाएक बीजिंग ओलंपिक ने सब कुछ बदल दिया है. अभिनव बिंद्रा देश में ओलंपिक खेलों के लिए एक सशक्त आवाज़ बन गए हैं. लेकिन एक सवाल ये भी है कि कितने दिनों तक ये आवाज़ सुनाई देगी. मुझे डर यही है कि एक बार जब ओलंपिक में तीन पदक जीतने का ख़ुमार ख़त्म होगा, हम वापस क्रिकेट की दुनिया में गोते लगाने लगेंगे. ओलंपिक खेलों में ग्लैमर नहीं होता, जो क्रिकेट में हमने बना दिया है या यों कहें कि खड़ा कर दिया है. ये एक दीवानगी है, आदत है, जिसे इतनी जल्दी ख़त्म करना कठिन होगा. आजकल क्रिकेट एक सोप-ओपेरा हो गया है, जिसकी लोकप्रियता से किसी खेल की तुलना हमेशा ही कठिन होगी. आज भले ही उद्योग जगत ये कह रहा हो कि वे ओलंपिक खेलों को उतनी ही अहमियत देंगे, वास्तविकता ये है कि वे ऐसा नहीं कर सकते. ये वही लोग है जिन्होंने देश की दीवानगी में करोडों रुपए निवेश किया है. वे नहीं चाहेंगे कि हम किसी अन्य खेल की तुलना क्रिकेट से करें. अगर ये सारी चीजें बदलनी हैं तो भारत को कई और बिंद्रा, सुशील कुमार और विजेंदर पैदा करने होंगे और मीडिया को भी उसी तरह इन खेलों के प्रति उत्साह दिखाना होगा जैसा वे आज दिखा रहे हैं. (लेखक हिंदुस्तान टाइम्स के खेल सलाहकार हैं) |
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