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मंगलवार, 06 फ़रवरी, 2007 को 10:01 GMT तक के समाचार
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यादें याद आती हैं.....
क्रिकेट प्रशंसक
क्रिकेट को लेकर कई यादें हैं
भारत में क्रिकेट का जुनून किस तरह सिर चढ़कर बोलता है. ये बात किसी से छिपी नहीं. क्रिकेट को लेकर सभी के मन में ढ़ेर सारी यादें हैं.

किसी ने बचपन में पिताजी की मार खाने के बावजूद क्रिकेट खेला था. स्कूल से भाग कर क्रिकेट मैच खेला था और बल्ला-गेंद ख़रीदने के लिए पैसे कैसे जुटाए थे- ये भी एक कहानी है.

टेलीविज़न के आगे या फिर रेडियो से कान सटाए एक-एक गेंद का आनंद लेना भी एक अलग क़िस्म का अनुभव है. और फिर क्रिकेट पर विश्लेषण का अधिकार तो हर भारतीय का है.

आइए कुछ इसी तरह के अनुभव हम आपके साथ बाँटते हैं, जो बीबीसी हिंदी के हमारे सहयोगियों ने आपके लिए कलमबद्ध किए हैं.


भूल नहीं पाती वो क्रिकेट कमेंट्री

सलमा ज़ैदी

क्रिकेट की पुरानी यादों के साथ उस घर की भी यादें जुड़ी हैं जहाँ मेरे दादा, दादी और फुफेरे भाई वग़ैरह रहते थे.

साठ के दशक की बात होगी. गर्मी की छुट्टियों में हम सब भाई बहन अपने दादा के यहाँ लखनऊ पहुँच जाते थे.

यह वह ज़माना है जब टेलीविज़न का चलन नहीं था. क्रिकेट मैच की कमेंट्री रेडियो पर सुनने का रिवाज था.

आज भी टेलीविज़न पर मैच देखा जाता है. जोशो-ख़रोश आसमान छू रहा होता है. लेकिन रेडियो की उस कमेंट्री के दौरान जो माहौल होता था, वो नहीं भूलता.


क्रिकेट, कालीचरण और कल्लन

राजेश प्रियदर्शी

क्रिकेट,कालीचरण और कल्लन. ये तीनों मेरे जीवन में तब आए जब मेरी निकर अक्सर नीचे सरक जाया करती थी. मैं अपने छोटे भाई के साथ बरामदे में रबर की गेंद और कपड़े धोने वाले डंडे से क्रिकेट खेला करता था.

यह 1970 के दशक के अंतिम वर्षों की बातें हैं, पापा बड़े से ट्रांजिस्टर पर घर्र-घुर्र मिश्रित जोश भरी कमेंटरी सुनते थे, हम तब शायद दुसरी या तीसरी क्लास में होंगे.

बड़े अफ़सोस के साथ पापा ने कहा, "बेचारा कालीचरण चला गया." उनकी आवाज़ में कुछ ऐसी उदासी थी और कालीचरण नाम पहली बार सुनने पर इतना दिलचस्प लगा कि यह वाक्य दिमाग़ में छप-सा गया.


क्रिकेट का चस्का और बैंक की परीक्षा

महबूब ख़ान

मेरी पैदाइश और परवरिश दूरदराज के एक ऐसे गाँव में हुई है जहाँ से कोई ब्लॉक या तहसील शहर कम से कम आठ-दस किलोमीटर की दूरी पर थे.

गाँव में कोई टेलीविज़न होना तो दूर की बात है, रेडियो भी गिने चुने थे. जैसा मुझे बताया गया था कि मेरे दादा 1960 के दौर में जब हज करने गए थे तो वहाँ से एक बड़ा सा रेडियो लाए थे जो किसी अचंभे से कम नहीं था और लोग उसके इर्द-गिर्द जमा होकर कार्यक्रम सुना करते थे.

जब मैंने होश संभाला तो पहले तो मरफ़ी रेडियो घर में पाया जिसका काफ़ी नाम था उस ज़माने में. बाद में पैरामाउंट रेडियो आया तो उसमें भी आवाज़ साफ़ सुनाई देती थी...


शास्त्री की आउडी में जैसे हम भी घूमे थे

मुकेश शर्मा

क्रिकेट में एक रन कब हुआ या चौके और छक्के का मतलब क्या हुआ ये कभी किसी ने बैठाकर समझाया नहीं और न ही ये जानने के लिए कभी क़िताब खोलने की ज़रूरत हुई.

पता नहीं कब चौकों और छक्कों पर तालियाँ बजाना शुरू किया था, टेलिविज़न पर मैच देखकर नहीं रेडियो पर कान लगाए कमेंट्री सुनते हुए.

क्रिकेट देखने की पहली याद बड़े भैया के मैच देखने की है. लखनऊ में निराला नगर के पटेल पार्क में बड़े भैया मैच खेलने जाते थे.


दादाजी ने सिखाया क्रिकेट का ककहरा

आलोक कुमार

क्रिकेट, जितना मुझे याद है ये नाम मेरे जेहन में तब से है जब मैं लगभग आठ साल का था. इससे पहले तक गाँव के गलियारों में बेहद लोकप्रिय गिल्ली-डंडा ही चलाता रहा. गोली या कंचे खेलने में ख़ासी दिलचस्पी रही.

मेरे पिता जी को तो क्रिकेट में कोई दिलचस्पी नहीं है, लेकिन मेरे बाबा पर इस खेल का भूत सवार था. मुझे भी क्रिकेट का ककहरा उन्हीं से समझ में आया. गाँव के मैदान में हर साल क्रिकेट प्रतियोगिता आयोजित होती थी जो अब भी जारी है.

इस प्रतियोगिता का मैच देखने मैं भी जाया करता था. इसे देखते देखते ही क्रिकेट के प्रति मेरी दिलचस्पी बढ़ी. सबसे पहला बल्ला बनाया ताड़ के पत्ते के डंठल से.


...अब मैं क्रिकेट नहीं खेलता

पाणिनी आनंद

मेरे जीवन में क्रिकेट की शुरुआत हुई एक रुपए में मेले में मिलने वाले प्लास्टिक के बैट-बॉल से. लड़खड़ाते क़दमों से आंगन में गिरते हुए इसे खेलना बहुत ही मज़ेदार था.

पता नहीं इतना मज़ा सचिन को भी आज का खेल खेलते हुए आ पाता होगा या नहीं. फिर बड़े हुए और फ़ुटबॉल, गुल्ली-डंडा, बैडमिंटन और हॉकी पर भी हाथ साफ़ किया.

पिताजी हॉकी के अच्छे खिलाड़ी थे इसलिए क्रिकेट को ज़्यादा पसंद नहीं करते थे. फिर भी इन सबके बीच क्रिकेट जमकर खेला, इसके लिए होमवर्क छोड़ा, गेंद के लिए पैसों की जोड़-तोड़ की, घर पर मार खाई, घुटने छिलवाए पर क्रिकेट चालू रहा.


नहीं बदला है क्रिकेट को लेकर दीवानापन

सचिन गौड़

अब तो मैं चाय की चुस्कियां लेते हुए क्रिकेट पर गर्मागर्म बहस में भी हिस्सा लेता हूँ और मैच हारने पर टीम की रणनीति में ख़ामियां निकाल कर अपने “ क्रिकेट ज्ञान“ का प्रदर्शन भी करता हूँ.

लेकिन एक समय था जब मेरे लिए क्रिकेट का अर्थ मित्र मंडली के साथ भरी दोपहरी में छत पर बैट-बाल खेलना ही था.

पड़ोस में रहने वाले एक भैया अंपायर का रूप धारण करते और व्यर्थ के विवादो से हमारा बचाव कराते. वैसे मौक़ा मिलने पर छत फाँद कर हमारी गेंदो को अपने बल्ले से दूर तक पहुँचाने से उन्होनें कभी गुरेज़ नहीं किया.


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भारत और क्रिकेट के बीच एक ख़ास रिश्ता है. बीबीसी हिंदी की विशेष पेशकश.
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