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शुक्रवार, 02 फ़रवरी, 2007 को 14:00 GMT तक के समाचार
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क्रिकेट से पनपा है ख़ास तरह का राष्ट्रवाद

क्रिकेट प्रशंसक
क्रिकेट में जीत के लिए पूजा-पाठ तक की जाती है
ब्रिटेन के मशहूर मंत्री नॉर्मन टेविट ने एक बार कहा था- जब कोई प्रवासी इंग्लैंड आता है, तो यहाँ के समाज में उसके घुलने-मिलने की पहचान इससे होती है कि वह क्रिकेट मैच में किस टीम का समर्थन करता है.

उनके कहने का मतलब ये था कि दूसरे देश से आने वाला व्यक्ति क्रिकेट मैच में इंग्लैंड का समर्थन करता है या अपने देश का, जहाँ से वह आया है.

अगर देखा जाए तो राष्ट्रवाद और क्रिकेट का हमेशा से नाता रहा है. और भारत और पाकिस्तान के मामले में तो ये है ही.

ऐसा नहीं है कि क्रिकेट को लेकर मौजूदा जुनून किसी और खेल में नहीं था. एक समय था जब हॉकी को लेकर भी लोगों में कुछ इसी तरह का उत्साह था.

भारत और पाकिस्तान के बीच जब हॉकी मैच होते थे, तो माहौल काफ़ी गर्म होता था. लेकिन अगर हॉकी को लेकर राष्ट्रवाद नहीं पनप पाया तो उसकी वजह स्पष्ट है.

एक ज़माना था जब हमने सात ओलंपिक गोल्ड एक साथ जीते थे. लेकिन धीरे-धीरे अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में हमारा ये ओहदा गिरता रहा और ये लोगों को बर्दाश्त नहीं हुआ.

दूसरी ओर जब हम क्रिकेट की बात करें और ज़रा पीछे झाँके तो पता चल जाता है कि सत्तर के दशक में क्रिकेट लोकप्रिय तो था लेकिन उसका दायरा इतना बड़ा नहीं था.

कारण

लेकिन आज अगर एक दूर-दराज़ इलाक़े में रहने वाला व्यक्ति भी ट्रांजिस्टर पर क्रिकेट कमेंट्री सुनकर उतना ही उत्साहित होता है, जितना शहर के लोग होते हैं, तो इसके कई कारण हैं.

चेतन शर्मा की गेंद पर जावेद मियाँदाद का छक्का लोग नहीं भूल पाए हैं

एक तो मीडिया का दायरा बढ़ा है. टेलीविज़न ने इसमें एक अहम भूमिका निभाई है. टेलीविज़न ने ना सिर्फ़ क्रिकेट को समझना आसान बनाया है, बल्कि लोगों में रोमांच और उत्साह भी भरा है.

और जहाँ तक राष्ट्रवाद की बात है, तो आप ख़ुद सोचिए कि भारत में कौन सा खेल है जिसमें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की भी एक हैसियत है.

वर्ष 1983 में भारत ने क्रिकेट का विश्व कप जीता और उसी दौर में रंगीन टेलीविज़न भी आया. दरअसल विश्व कप में हमारी जीत ऐन मौक़े पर आई.

यही समय था जब भारत में हॉकी का स्तर गिरना शुरू हो गया था. वैश्वीकरण और उदारीकरण की बात उठने लगी थी और उस समय भारत में क्रिकेट ही ऐसा खेल था जो इसका फ़ायदा उठाने के लिए तैयार था.

 ऐसा नहीं है कि क्रिकेट को लेकर मौजूदा जुनून किसी और खेल में नहीं था. एक समय था जब हॉकी को लेकर भी लोगों में कुछ इसी तरह का उत्साह था. भारत और पाकिस्तान के बीच जब हॉकी मैच होते थे, तो माहौल काफ़ी गर्म होता था. लेकिन अगर हॉकी को लेकर राष्ट्रवाद नहीं पनप पाया तो उसकी वजह स्पष्ट है. एक ज़माना था जब हमने सात ओलंपिक गोल्ड एक साथ जीते थे. लेकिन धीरे-धीरे अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में हमारा ये ओहदा गिरता रहा और ये लोगों को बर्दाश्त नहीं हुआ.

टेलीविज़न और क्रिकेट ने भारत के संदर्भ में लोकप्रियता की एक नई पटकथा लिखी. 1990 के दशक में क्रिकेट ने पूरे देश में अपने पाँव पसारे और जन-जन का खेल बनने की दिशा में महत्वपूर्ण प्रगति हुई.

उसका असर अब देखने को भी मिल रहा है. अब खिलाड़ी ऐसी जगहों से आ रहे हैं, जहाँ क्रिकेट पहले था ही नहीं. जैसे- सुरेश रैना, मोहम्मद कैफ़, इरफ़ान पठान और महेंद्र सिंह धोनी.

पाकिस्तान के साथ संबंध ने भी क्रिकेट और राष्ट्रवाद को जोड़ा. 60 और 70 के दशक में तो हम पाकिस्तान के साथ काफ़ी कम खेलते थे.

कभी-कभार विश्व कप में दोनों देशों के बीच मुक़ाबला हो जाता था. एक बार तो ऐसा हो गया कि अब्बास अली बेग पाकिस्तान के ख़िलाफ़ मैचों में नहीं चले और भारत हार गया.

लोगों ने अफ़वाह फैला दी कि वे पाकिस्तान के ख़िलाफ़ इसलिए नाकाम हुए क्योंकि वे मुसलमान थे. इस तरह का ज़हर क्रिकेट ने ख़ास तरह के राष्ट्रवाद में फैलाया.

भारत और पाकिस्तान के बीच जब भी क्रिकेट मैच होते हैं, एक अजीब तरह का उन्माद रहता है. शारजाह का वो मैच शायद ही कोई भूले, जिसमें चेतन शर्मा की आख़िरी गेंद पर जावेद मियाँदाद ने छक्का मार कर भारत को हरा दिया था.

वो झटका इसलिए भी ज़्यादा था क्योंकि पाकिस्तान ने भारत को हराया था. और तो और अभी भी जब दोनों देशों के संबंध ख़राब हो जाते हैं, तो असर क्रिकेट पर ही पड़ता है.

पाकिस्तान को लेकर भारत में जो ज़हरीला राष्ट्रवाद है, वो कई बार मैचों का मज़ा किरकिरा कर देता है. हालाँकि अब स्थितियाँ सुधरी हैं और दोनों देशों के बीच क्रिकेट मैचों में उतना उबाल नहीं रहता.

लेकिन मैं नहीं मानता कि यह राष्ट्रवाद पूरी तरह सांप्रदायिक हो गया है. इक्का-दुक्का उदारहण को छोड़ दें तो ऐसा नहीं है. भारतीय टीम में ही आपको हरेक धर्म और जाति के खिलाड़ी मिल जाएँगे.

टीम की कप्तानी हिंदू, मुसलमान, सिख- सभी संभाल चुके हैं. एक बार को बाल ठाकरे ने भी कहा था कि भारत के मुसलमान अज़हरुद्दीन जैसे होने चाहिए.

ये उस ज़माने की बात है जब अज़हरुद्दीन अपने प्रदर्शन की ऊँचाइयों पर थे और एक पर एक शतक ठोंक रहे थे.

मेरे ख़्याल से किसी भी क्रिकेट प्रेमी ने इस आधार पर खिलाड़ियों में भेद नहीं किया है कि वे मुसलमान हैं या हिंदू. क्रिकेट प्रेमी उन खिलाड़ियों का स्वागत करते हैं जो अच्छा प्रदर्शन करते हैं.

जुनून

हाँ एक समय ऐसा था जब शिवसेना और बजरंग दल वालों ने क्रिकेट की पिच खुदवा दी थी. लेकिन ये आदत नहीं बन पाई. क्योंकि उन्हें पता चल गया था कि क्रिकेट एक ऐसा जुनून है जो उनकी लोकप्रियता पर भी भारी पड़ सकता है.

एक बार पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड ने किसी कार्यक्रम के सिलसिले में सुनील गावसकर को अपने यहाँ निमंत्रण दिया था. उस समय भारत-पाकिस्तान के बीच संबंध ठीक नहीं थे.

शिवसेना ने कहा कि गावसकर को वहाँ नहीं जाना चाहिए लेकिन गावसकर वहाँ गए. दरअसल क्रिकेट को लेकर जो उत्साह है, जो राष्ट्रवाद है या जो जुनून है, वो कई बार तो बुरी चीज़ें भी करवा सकता है.

कभी-कभी राष्ट्रवाद ने ज़हरीला रूप भी लिया है

एक बार विश्व कप के दौरान बंगलौर में भारत और पाकिस्तान के बीच मैच चल रहा था, जो जावेद मियाँदाद का आख़िरी मैच था. जब वे आउट होकर वापस पवेलियन जा रहे थे, तो मेरे दोस्त राम गुहा खड़े होकर ताली बजाने लगे.

लेकिन आसपास के लोग उनसे नाराज़ हो गए और कहने लगे कि वे जावेद मियाँदाद के लिए क्यों ताली बजा रहे हैं. मेरा कहना है कि ऐसी भावना समाज में ज़रूर है. लेकिन इसे पूरे समाज के लिए नहीं कहा जा सकता.

पाकिस्तान के ख़िलाफ़ पिछली दो सिरीज़ में स्थितियाँ काफ़ी बदली हैं. दोनों देशों में हार-जीत स्वीकार करने की भावना बढ़ी है. लोग इससे उबरने लगे हैं.

लेकिन इतना तो तय है कि तमाम ख़ूबियों के बावजूद क्रिकेट को लेकर पनपे राष्ट्रवाद ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का प्रतिनिधित्व उन्हीं देशों में किया है, जहाँ क्रिकेट खेला जाता है.

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