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शुक्रवार, 02 फ़रवरी, 2007 को 18:07 GMT तक के समाचार
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क्रिकेट, कालीचरण और कल्लन

कालीचरण
कालीचरण की लोकप्रियता भारत में भी ख़ूब थी
क्रिकेट,कालीचरण और कल्लन. ये तीनों मेरे जीवन में तब आए जब मेरी निकर अक्सर नीचे सरक जाया करती थी. मैं अपने छोटे भाई के साथ बरामदे में रबर की गेंद और कपड़े धोने वाले डंडे से क्रिकेट खेला करता था.

यह 1970 के दशक के अंतिम वर्षों की बातें हैं, पापा बड़े से ट्रांजिस्टर पर घर्र-घुर्र मिश्रित जोश भरी कमेंटरी सुनते थे, हम तब शायद दुसरी या तीसरी क्लास में होंगे.

बड़े अफ़सोस के साथ पापा ने कहा, "बेचारा कालीचरण चला गया." उनकी आवाज़ में कुछ ऐसी उदासी थी और कालीचरण नाम पहली बार सुनने पर इतना दिलचस्प लगा कि यह वाक्य दिमाग़ में छप-सा गया.

उदासी ऐसी थी मानो अपना कोई रिश्तेदार हो कालीचरण, कई साल बाद पता चला कि बात वेस्टइंडीज़ के धुरंधर खिलाड़ी एल्विन कालीचरण की बात हो रही थी.

डाँट-फ़टकार

बरामदे की दीवार पर अगर गेंद बिना टप्पा खाए टकराए तो छह रन और टपककर जाए तो चार रन, क्रिकेट तो मैं कॉलेज और यूनिवर्सिटी तक खेलता रहा लेकिन मेरी सारी यादगार पारियाँ अपने बरामदे की हैं.बरामदे में न जाने कितने दोहरे-तिहरे शतक लगाए हैं.

गर्मी की छुट्टी में तपती दुपहरी में डाँट-मार के बावजूद क्रिकेट खेलना हमारे मुहल्ले के बच्चों का ख़ास शौक़ था. आज गर्मी के दिनों में घर से बाहर निकलने के लिए हिम्मत जुटाना पड़ता है और क्रिकेट की दीवानगी थी कि हम लू के थपेड़ों के बीच जमकर खेलते थे.

गर्मी के दिनों में मैदान इतनी बुरी तरह सूख जाता था कि विकेट गाड़ना असंभव हो जाता था, ऐसे कई बार पानी न मिलने पर टीम के सबसे छोटे लड़के को जल्दी से पिच गीला करने का आदेश मिलता ताकि विकेट लगाया जा सके.

क्रिकेट के लिए पिटाई भी बहुत खाई है, वैसे तो बरामदे से बाहर गेंद जाने पर बल्लेबाज़ आउट हो जाता था क्योंकि बरामदे के बाहर एक नाली बहती थी, गेंद का नाली में जाना बहुत आम बात थी, आम तौर पर हम दो लकड़ियों का चिमटा बनाकर उससे गेंद निकाल लेते थे,हमारे क्रिकेट प्रेम के इस पहलू का पता घर के लोगों को नहीं था.

एक दिन पापा ने देख लिया और दो थप्पड़ खाने के बाद दोबारा नहाना पड़ा. यह उस दौर की बात है जब क्रिकेट के सितारे ड्राइंग रूम में आकर पेप्सी या कोक पीने को नहीं कहते थे बल्कि वे हमारी कल्पनाओं पर राज करते थे.

उनका चेहरा हमारे लिए उतना ही परिचित था जितना अख़बारों और पत्रिकाओं की ब्लैक एंड व्हाइट तस्वीरों से हो सकता था. जब तक मैंने गावसकर की तस्वीर नहीं देखी थी मुझे लगता था कि कोई बहुत ही लंबा-तगड़ा पहलवाननुमा आदमी होगा जो बहुत ताक़त से तेज़ शॉट लगाता है.

क्रिकेट की दीवानगी क्या होती है हमें सबसे पहले बताया कल्लन ने, कल्लन का गोलगप्पे बेचने का करियर अच्छा-भला चल रहा था लेकिन शराब और क्रिकेट ने उसे कहीं का न छोड़ा, लेकिन उसने क्रिकेट को कभी नहीं छोड़ा.

कल्लन का ठेला

जिस दिन भारत का कोई मैच होता था उस दिन कल्लन का ठेला नहीं लगता था, वह कंधे पर ट्रांजिस्टर रखकर बीच चौराहे पर आ जाता था, आवाज़ पूरे चौराहे पर सुनाई देती थी लेकिन कल्लन ट्रांजिस्टर कान से अलग नहीं होने देता था. चौके, छक्के और आउट की ख़बर मिलने पर वह अंपायर की भूमिका में आ जाता हाथ लहराकर इशारा करता.

गाँवों में ख़ास तरह से खेली जाती है क्रिकेट

उसका प्रिय खिलाड़ी था बेंग संकर, हमें उसके प्रिय खिलाड़ी के नाम पर बहुत हँसी आती थी क्योंकि बिहार में कई इलाक़ों में मेढ़क को बेंग कहते हैं.

उसका मानना था कि बेंग संकर से बड़ा बल्लेबाज़ गावसकर भी नहीं है. वह अनपढ़ आदमी ब्रेडमैन, बोर्डर और एंडी रॉबर्ट्स जैसे खिलाड़ियों के नाम से अच्छी तरह वाकिफ़ था.

किशोरावस्था की जितनी बड़ी घटनाएँ हैं, मेरी स्मृति में उनका सीधा संबंध क्रिकेट से है, मिसाल के तौर पर जिस दिन संजय गाँधी की मौत हुई उस दिन मेरे जीवन का पहला बल्ला टूटा था, इमरजेंसी के बाद जिस दिन इंदिरा गाँधी के चुनाव हारने की ख़बर आई थी उस दिन क्रिकेट की गेंद अचार की हांडी में गिर गई थी और पिटाई हुई थी...वग़ैरह...

क्रिकेट से परिचय कब हुआ, कैसे हुआ बिल्कुल याद नहीं, याद हो भी कैसे सकता है. भारत में क्रिकेट से आपका परिचय नहीं होता, भारत में हम जिस हवा में साँस लेते हैं उसमें ऑक्सीज़न, नाइट्रोजन, कार्बन डाइऑक्साइड के साथ क्रिकेट भी है.

टीवी चैनलये जुनून हमारी देन नहीं
दिबांग मानते हैं कि क्रिकेट का यह जुनून आज के मीडिया ने पैदा नहीं किया.
क्रिकेट प्रशंसकक्रिकेट परमो धर्म:
भारत और क्रिकेट के बीच एक ख़ास रिश्ता है. बीबीसी हिंदी की विशेष पेशकश.
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