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शुक्रवार, 02 फ़रवरी, 2007 को 19:49 GMT तक के समाचार
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मीडिया ने नहीं पैदा किया जुनून

टीवी चैनल
मीडिया वर्षों से यह काम कर रहा है
मीडिया अगर क्रिकेट को बढ़ावा दे रहा है तो इसकी कई वजहें हैं. एक वजह तो क्रिकेट की वह लोकप्रियता है जो उसे फ़िल्म और धर्म के बराबर ला खड़ा करती है और क्रिकेट के खिलाड़ी सितारों और देवताओं की तरह दिखाई देते हैं.

जो लोग ये मानते हैं कि क्रिकेट का यह जुनून आज के मीडिया ने पैदा किया, वे भूल जाते हैं कि तीन दशक पहले धर्मयुग के क्रिकेट विशेषांक बिक्री का रिकॉर्ड बनाते रहे और इलेस्ट्रेटेड वीकली जैसी पत्रिका का जो अंक चार लाख से ऊपर बिका, वह क्रिकेट पर केंद्रित था.

उन दिनों खुशवंत सिंह नहीं, एमवी कॉमथ इलेस्ट्रेटेड वीकली के संपादक हुआ करते थे. दरअसल जैसा कि आशीष नंदी ने लिखा है कि अंग्रेज़ों ने भारत को चाय, कॉफ़ी और क्रिकेट दिया और हमने उन्हें अपने रंग में ढाल लिया.

बीते 75 वर्षों का भारतीय क्रिकेट का इतिहास ऐसे सितारों से भरा पड़ा है, जिन्हें हम भगवान जैसा मानते रहे हैं- सीके नायडू, विजय मर्चेंट, वीनू मनकड, पॉली उमरीगर, नवाब मंसूर अली ख़ान पटौदी, बिशन सिंह बेदी, चंद्रशेखर, सुनील गावसकर और कपिल देव की ही वह परंपरा है जिसे आज सचिन तेंदुलकर और महेंद्र सिंह धोनी तक चली आई है.

दिलचस्प टीवी शो

जिस खेल में इतने सारे सितारों की परंपरा चली आ रही हो, उसकी तरफ़ स्वभाविक तौर पर मीडिया जाएगा. दरअसल क्रिकेट के इस जुनून को मीडिया ने अपनी तरफ़ से और हवा दी तो इसलिए कि क्रिकेट हमारे लिए जितना खेल है उतना ही एक दिलचस्प टीवी शो भी.

क्रिकेट में मिली सफलता भी रही एक वजह

बाक़ी खेलों में मामला हार-जीत और खिलाड़ियों के अच्छे-बुरे प्रदर्शन तक सिमट जाता है. क्रिकेट में आँकड़ों का खेल इतने आयामों में पसरा है कि उसमें बल्लेबाज़ी की अलग-अलग तहों, गेंदबाज़ी की रंगतों और क्षेत्ररक्षण के अंदाज़ का जायज़ा लेने की अनगिनत संभावनाएँ निकलती रहती हैं.

ख़ास बात यह है कि क्रिकेट का बदला हुआ स्वरूप भी उसकी लोकप्रियता में नए पंख जोड़ रहा है. अस्सी के दशक तक क्रिकेट एक सुस्त खेल हुआ करता था जिसमें एक दिन में 200 रन बनते, एक दिन का आराम होता और कुल छह दिनों बाद भी फ़ैसला नहीं निकलता.

लेकिन आज क्रिकेट एक आक्रमक खेल हो चुका है- एक दिन में 100 ओवर गेंदबाज़ी होती है- पाँच-सात सौ रन बड़ी आसानी से बन जाते हैं. इससे पहले इसकी कल्पना नहीं की जा सकती थी.

इस तेज़-तर्रार बल्लेबाज़ी का नतीजा यह हुआ है कि विकेट भी बड़ी तेज़ी से गिरते हैं और फ़ैसला टेस्ट मैचों में भी तीसरे-चौथे दिन आ जाता है.

गुंजाइश

इस तेज़ी के बावजूद क्रिकेट में इतनी गुंजाइश होती है कि उसमें मीडिया अपने कार्यक्रम अलग से बना सके. अक्सर कोई मैच शुरू होने से पहले मैच रिपोर्ट, बीच में लंच रिपोर्ट और उसके बाद टी रिपोर्ट.

इन सबसे टीवी चैनलों को एक लोकप्रिय खेल को ठीक से इस्तेमाल करने का मौक़ा मिलता है. क्रिकेट की मौजूदा लोकप्रियता की एक वजह बाक़ी खेलों में भारत की फिसड्डी हैसियत भी है.

कभी हम हॉकी पर गर्व करते थे. हॉकी के उन सुनहरे दिनों की याद दिलाने वाले कुछ खिलाड़ी अब भी मौजूद हैं जिनके पास ओलंपिक के तीन स्वर्ण पदक हैं.

 जो लोग ये मानते हैं कि क्रिकेट का यह जुनून आज के मीडिया ने पैदा किया, वे भूल जाते हैं कि तीन दशक पहले धर्मयुग के क्रिकेट विशेषांक बिक्री का रिकॉर्ड बनाते रहे और इलेस्ट्रेटेड वीकली जैसी पत्रिका का जो अंक चार लाख से ऊपर बिका, वह क्रिकेट पर केंद्रित था.

लेकिन आज हॉकी में हम शुरू की 10 टीमों में नहीं हैं. पचास के दशक में भारतीय फ़ुटबॉल की एक हैसियत हुआ करती थी, लेकिन आज हम फ़ुटबॉल खेलने वाले सवा सौ देशों में बिल्कुल आख़िरी सिरे पर हैं.

टेनिस में इक्का-दुक्का प्रतिभाएँ उभरी हैं, लेकिन बड़े ख़िताब उनके हिस्से में नहीं आए हैं. सानिया मिर्ज़ा का समूचा संघर्ष ख़ुद को 50 टॉप सीडेड खिलाड़ियों के बीच बनाए रखने का है.

निशानेबाज़ी जैसी प्रतियोगिताओं में कुछ सफलताएँ हैं. साथ ही बैडमिंटन, बिलियर्ड्स, स्नूकर और शतरंज ने हमें कुछ बड़े खिलाड़ी दिए लेकिन ये अपने चरित्र में खेल कम, व्यक्तिगत स्पर्धाएँ ज़्यादा हैं जिनकी वजह से वे बहुत लोकप्रिय नहीं हो पाते.

इनसे वह सामूहिक उल्लास भी नहीं बनता जो टीमों से जुड़े खेल बनाते हैं. ऐसे में सिर्फ़ क्रिकेट बचता है जिसमें हम अपने राष्ट्रीय गर्व की अभिव्यक्ति देखते हैं.

यह अनायास नहीं है कि 1983 का विश्व कप जीतने के बाद क्रिकेट अचानक दूसरे खेलों से अपने यहाँ बड़ा हो गया. अब यही खेल बचा है जिसमें हम उम्मीद करते हैं कि विश्व कप जीत सकते हैं या सबसे बेहतर टीमों को हरा सकते हैं.

हाल के वर्षों में जो नवदौलतिया हिंदुस्तान है, उसे भी यह खेल अपनी तरफ़ खींचता है- क्योंकि तब उसके पास दुनिया को बताने और दिखाने को कुछ होता है.

बाज़ार में भारत की बढ़ती हैसियत उसके क्रिकेटरों में दिखाई पड़ती है. सबसे बड़ी बात यह है कि हाल के दिनों में क्रिकेट सच्चे अर्थों में अखिल भारतीय और लोकतांत्रिक खेल साबित हो रहा है.

छोटे-छोटे शहरों से...

एक ज़माने में क्रिकेटर सिर्फ़ मुंबई से निकला करते थे और आधी से ज़्यादा टीम वहीं के खिलाड़ियों से बन जाती थी. आज हालात ये है कि ज़्यादातर बड़े क्रिकेटर छोटे शहरों या फिर बेहद आम घरों से आ रहे हैं.

छोटे शहरों से आए धोनी जैसे क्रिकेटर छाए हुए हैं

आज की भारतीय टीम में वडोदरा के इरफ़ान पठान दिखते हैं, भडूँच के मुनाफ़ पटेल, कोच्चि के श्रीसंत, राँची के महेंद्र सिंह दोनी, मुरादाबाद के पीयूष चावला, रायबरेली के आरपी सिंह और गाज़ियाबाद के सुरेश रैना दिखते हैं.

इनमें इलाहाबाद के मोहम्मद कैफ़ और जालंधर के हरभजन सिंह को जोड़ा जा सकता है. दिल्ली के बेहद आम इलाक़े नजफ़गढ़ के वीरेंदर सहवाग को और मुंबई का होने के बावजूद आम परिवार के वसीम जाफ़र को भी शामिल किया जा सकता है.

ये सूची लगातार लंबी होती जा रही है. छोटे-छोटे शहरों से आया यह नौजवान हिंदुस्तान के क्रिकेट का असली चेहरा बनता जा रहा है.

इस चेहरे में ख़ुद को साबित करने की लगत है, चुनौती उठाने का दुस्साहस है और दूसरों को हराने का आत्मविश्वास है. वह समाज की मायूसियों और राजनीति की नाकामियों के बीच हमें जश्न मनाने का, ख़ुद पर इठलाने का एक मौक़ा देता है.

यही वजह है कि क्रिकेट मीडिया के लिए कामयाबी की ऐसी दास्तानें बनाता है, जिनमें आज के भारत की तस्वीर नज़र आती है.

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