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भारत का सच्चा धर्म है क्रिकेट | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
दूसरे विश्व युद्ध के बाद अंग्रेज़ बेमन से ही सही भारत छोड़ने को तैयार थे और उस समय देश के प्रमुख राष्ट्रवादियों ने अंग्रेज़ों के साथ-साथ क्रिकेट के भी भारत छोड़ने की बात कही. जुलाई 1946 में बांबे वीकली में छपे एक लेख में वरिष्ठ कांग्रेसी राजनेता डॉक्टर बालाकृष्ण केसकर ने क्रिकेट को यह कहकर ख़ारिज कर दिया था कि क्रिकेट संस्कृति और भावना दोनों से पूरी तरह इंग्लिश है. उन्होंने अपने लेख में इस बात पर ज़ोर दिया था कि क्रिकेट सिर्फ़ अंग्रेज़ी संस्कृति, अंग्रेज़ी भाषा और अंग्रेज़ी शासन का माहौल बनाएगा. केसकर ने तो यहाँ तक कह दिया था कि क्रिकेट खेलना उन्हीं लोगों को पसंद है, जिनकी चमड़ी का रंग भले ही भुरा हो लेकिन उनकी भावना गोरों वाली है- यानी महाराजा, धनी और उनके जैसा बनने की कोशिश करने वाले लोग. बालाकृष्ण केसकर को भरोसा था कि ब्रितानी शासन की समाप्ति के बाद भारत में क्रिकेट नहीं रह पाएगा और फ़ुटबॉल, एथलेटिक्स सरीखे खेलों की लोकप्रियता बढ़ेगी. लेकिन जनता की सोच इससे बिल्कुल अलग थी. डॉक्टर केसकर की भविष्यवाणी के छह दशक बाद क्रिकेट की लोकप्रियता ना सिर्फ़ बढ़ी है बल्कि अब यह जन-जन का खेल बन गया है. क्रिकेट का नशा महाराजाओं को है, तो एक दूधवाले को भी है. क्रिकेट को लेकर एक हाँ, सच ये भी है कि क्रिकेट को लेकर राष्ट्रीय उन्माद के बावजूद क्रिकेट राष्ट्रीय खेल नहीं बन पाया है. भारत के सफल क्रिकेटरों का क़द इतना बड़ा है कि पूछिए मत. उनका दर्जा देवी-देवताओं जैसा है. भाषा, वर्ग, परंपरा और अन्य कई मुद्दों पर विभाजित भारत क्रिकेट को लेकर एक है. जैसा कि एक पत्रकार ने कहा- क्रिकेट भारत का सच्चा धर्म है. भारत में क्रिकेट की सफलता की वजह क्या है? पहला कारण ये कि कृषि पर आधारित सभ्यता में यह आसानी से फ़िट बैठता है. एक अंग्रेज़ टेस्ट मैच और एक दिवसीय मैच की हाई लाइट्स देखकर ही संतुष्ट हो जाता है लेकिन भारतीय हर गेंद देखना चाहता है और वो भी लाइव. ये तथ्य कि फ़ुटबॉल और टेनिस के मुक़ाबले क्रिकेट एक धीमा खेल है, हमारे लोकाचार से मेल आता है. भारतीय मैच किसी के ड्राइंग रूम में देख रहे हों या स्टेडियम में. गपशप, वाद-विवाद और मिल-जुलकर मैच देखने में भारतीयों को आनंद आता है. दूसरे खेलों में इतनी तेज़ी होती है कि उसमें इसकी गुंजाइश काफ़ी कम होती है. लेकिन जहाँ तक क्रिकेट की बात है आम भारतीय विकेट गिरने पर और ओवरों के बीच में गपशप और वाद-विवाद जारी रख सकता है. संस्कृति से मेल के अलावा क्रिकेट को राष्ट्रीय गर्व से भी जोड़ा जाता है. खेल के मैदान पर मिली जीत उस तथ्य को किनारे कर देती है कि संयुक्त राष्ट्र मानव विकास रिपोर्ट में भारत बहुत नीचे है. क्रिकेट और राष्ट्रवाद की व्याख्या मुंबई के मशहूर आलोचक सीपी सुंदरन से बेहतर किसी ने नहीं किया. वर्ष 1998 में सचिन तेंदुलकर ने ऑस्ट्रेलिया के ख़िलाफ़ लगातार कई शतक लगाए थे. सचिन की इस पारी को लाखों लोगों ने टीवी पर देखा. सुंदरन ने लिखा, "जब भी सचिन तेंदुलकर विकेट पर चहलक़दमी कर रहे थे, पूरा राष्ट्र रणक्षेत्र में उनके साथ चल रहा था. दीन-हीन लोग राहत के लिए दुआ कर रहे थे, भारतीय होने की जीनव भर की परेशानी से मुक्ति होने की प्रार्थना कर रहे थे. एक बल्ले से वे अपनी मुक्ति की आस लगाए बैठे थे." क्रिकेट प्रेम पेशवर क्रिकेट लेखक भी मानते हैं कि हम भारतीय क्रिकेट को कुछ ज़्यादा ही प्यार करते हैं. क्रिकेट प्रेम की गहराई और प्रगाढ़ता को लेकर कोई सवाल नहीं हो सकता.
दिसंबर 1960 में भारत और पाकिस्तान के बीच मुंबई में एक क्रिकेट मैच हो रहा था. पाकिस्तान ने पहले बल्लेबाज़ी की और हनीफ़ मोहम्मद ने पारी की शुरुआत की. दूसरे दिन मुंबई के ब्रेबॉर्न स्टेडियम में क़रीब 40 हज़ार लोग मौजूद थे. स्टेडियम के बाहर एक ईरानी रेस्टोरेंट में भी बड़ी संख्या में मौजूद थे. कारण था समाजवादी नेता डॉक्टर राममनोहर लोहिया ने इसी रेस्टोरेंट को एक प्रेस कॉन्फ़्रेंस के लिए चुना था. उस समय राम मनोहर लोहिया जिनसे नफ़रत करते थे, वे थे तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू, अंग्रेज़ी भाषा और क्रिकेट. लोहिया जी ने पत्रकारों से कहा कि कैसे क्रिकेट का खेल अभी भी उपनिवेशवाद का प्रतीक बना हुआ है और कैसे हैरो और कैम्ब्रिज से पढ़े-लिखे जवाहरलाल नेहरू इसमें सहभागी हैं. उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री को हटा दीजिए और हम ख़ुशी-ख़ुशी अपना भारतीय खेल कबड्डी और कुश्ती खेलने लगेंगे. प्रेस कॉन्फ़्रेंस के बाद पत्रकार अपनी स्टोरी करने के लिए चले गए. उनके जाने के बाद लोहिया जी पास की एक सिगरेट दूकान पर पहुँचे और अपनी पसंदीदा सिगरेट कैप्स्टेन की मांग की. रेडियो की रनिंग कमेंट्री के बीच लोहिया जी ने पूछा- क्या हनीफ़ अभी खेल रहा है क्या? जवाब मिला- हाँ. |
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