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'बिग ब्रदर' बनने की कोशिश | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में भारत अब एक बड़ी हस्ती बन चुका है. भले ही खेल के मैदान पर नहीं, लेकिन मैदान के बाहर ही सही. इसकी कोशिश है क्रिकेट की दुनिया में अपनी पहचान 'बिग ब्रदर' के रुप में बनाने की. इसके कारण भी हैं. आज क्रिकेट में अग़र पैसा है तो उसकी मुख्य वजह भारत है. यहाँ से काफ़ी राजस्व आ रहा है. इससे अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद यानी आईसीसी को भी कहीं न कहीं लाभ पहुँचता है. हालत ये है कि मैच चाहे दुनिया के किसी कोने में हो लेकिन उसे देखने वाले लोगों की तादाद सबसे अधिक भारत में होती है. इसलिए विज्ञापन देने वाले भी भारत के क्रिकेट बाज़ार को तवज्जो देते हैं. आगे भी यही होने वाला है. भारत में टेलीविज़न देखने वालों की संख्या तेज़ी से बढ़ रही है. युवाओं में क्रिकेट का क्रेज है. इसलिए जब मैच देखेंगे तो विज्ञापन भी देखेंगे और ऐसा होगा तो पैसे का खेल इसी के हाथ में होगा. आईसीसी किसी भी सूरत में ये नहीं चाहेगा कि किसी बात को लेकर भारत को नाराज़ किया जाए जिससे उससे आर्थिक क्षति पहुँचे. लेकिन इसकी आड़ में कई बार भारत की ये कोशिश होती है कि वो जो कह रहा है, वही सही है, बाकी ग़लत है लेकिन फिर वो आईसीसी के सामने झुक भी जाता है. ढुलमुल रवैया ऐसा नहीं होना चाहिए. अग़र आप वाकई अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट के बिग ब्रदर हैं तो क्रिकेट के मामले पर एक स्टैंड लेने का मद्दा होना चाहिए. जैसे आप देख लीजिए ट्वेंटी-20 क्रिकेट पर क्या हुआ. पहले तो बीसीसीआई ने धमकी दी को वो इसमें शामिल नहीं होगा. लेकिन बाद में मान गए. अगर उन्हें लग रहा था कि इस तरह का क्रिकेट भारत के लिए ठीक नहीं है या टीम उसमें शामिल नहीं होगी तो उन्हें इस पर कायम रहना चाहिए था.
तो मतलब यही है कि बिग ब्रदर होते हुए भी बीसीसीआई अंत में दूसरों को ही ख़ुश करने की कोशिश कर रहा है. सत्तर के दशक में इंग्लैंड ने एकदिनी क्रिकेट की शुरुआत की. सिर्फ़ इसलिए कि टेस्ट मैचों में दर्शक नहीं जुट रहे थे. अब भी वही हो रहा है. ट्वेंटी-ट्वेंटी भी इंग्लैंड के दिमाग की उपज है. तो जिस समय इंग्लैंड अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट पर हावी था, उस समय उसकी अगुआई में कुछ नया हो जाए, ये माना जा सकता है, लेकिन अब क्या मज़बूरी थी. भारत के पास पैसा भी है और आईसीसी में अलग पहचान भी. लेकिन तब भी किसी मुद्दे पर डटे रहना इसकी फिदरत में नहीं है. एक ज़माने में आईसीसी को लोग ‘इंपेरियल क्रिकेट काउंसिल’ के नाम से पुकारते थे. तब इंग्लैंड हावी था. अब स्थितियाँ बदल चुकी है. भारत की एक औकात है. लेकिन तब भी क्रिकेट से जुड़े मुद्दों पर स्पष्ट रुख का अभाव दिखता है. सकारात्मक पहल हो मेरे कहने का ये भी मतलब नहीं है कि बिग ब्रदर हो जाएँ तो सबकुछ मनमाने तरीक़े से करें जैसा कि पहले ज़माने में होता था. हमें क्रिकेट को और इसके प्रशासन को साफ सुथरा रखने की कोशिश करनी चाहिए. अभी एक मामला आया कि भारत ने पाकिस्तान से सलाह लिए बिना ही 2011 के विश्व कप का फाइनल भारत में आयोजित करने का फ़ैसला कर लिया. ख़ैर बाद में मामला सुलझ गया. अंपायरिंग के मामले को ही देखिए. जब सचिन तेंदुलकर पर बॉल टैंपरिंग का आरोप लगा तो बीसीसीआई ने काफी हो हल्ला मचाया. लेकिन इंग्लैंड दौरे पर गई पाकिस्तान की टीम के कप्तान इंज़माम उल हक़ ने जब कथित अंपायरिंग के ख़िलाफ़ टीम को मैदान से बाहर बुलाया, उस मामले में भारत चुप्प रहा. तो अगर आप बिग ब्रदर की भूमिका में रहना चाहते हैं, तो तार्किक तरीक़े से सभी मसलों पर एक पक्ष होना चाहिए. अब शरद पवार आईसीसी के अध्यक्ष पद के लिए दावेदार बने हैं. परिस्थितियों को देख कर लगता है कि वो अध्यक्ष बन भी जाएँ. लेकिन अंत में मैं ये कहना चाहूँगा कि बिग ब्रदर का व्यवहार गेम के लिए ठीक नहीं है. हमें सभी को साथ लेकर क्रिकेट की बेहतरी के लिए काम करना चाहिए. (आलोक कुमार से बातचीत पर आधारित) |
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