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शुक्रवार, 02 फ़रवरी, 2007 को 14:37 GMT तक के समाचार
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'जीवन में ऐसे क्षण एक बार आते हैं'

अमरनाथ और कपिलदेव
विश्व कप जिताने में अमरनाथ की अहम भूमिका थी
जब हम 1983 का विश्व कप जीते थे, तो यह एक सपना सच होने जैसा था. लॉर्ड्स मैदान पर बड़ी संख्या में भारतीय समर्थक मौजूद थे.

विश्व कप जीतने के बाद तो हमारे साथ-साथ भारतीय दर्शकों में ख़ुशी की लहर दौड़ गई. हिंदुस्तानी होने के नाते लोग अपने को गौरवान्वित महसूस कर रहे थे.

हर समुदाय और तबके के लोग वहाँ मौजूद थे. वहाँ का नज़ारा इतना अच्छा था कि वो आज भी जेहन में ताज़ा है.

उसके बाद तो पार्टियों का सिलसिला ही शुरू हो गया. जहाँ जाओ, लोग भारी संख्या में मौजूद रहते थे. कई दिनों तक समारोह चलते रहे. टीम को आमंत्रण पर आमंत्रण मिल रहे थे.

विश्व कप जीतने के बाद वह इंडियन जिमखाना में एक बेनेफ़िट मैच खेलने गए थे. वहाँ भी लोग इतनी संख्या में मौजूद थे कि पूछिए मत.

जब भारतीय टीम स्वदेश लौटी तो मुंबई एयरपोर्ट पर भारी भीड़ जुटी थी. मैंने इतनी भीड़ ज़िंदगी में नहीं देखी थी. टर्मिनल से बाहर तक- ऐसा लगता था जैसा पूरा मुंबई शहर की उमड़ आया हो.

बस तक पहुँचने के लिए सभी खिलाड़ियों को काफ़ी परेशानी हुई. क्योंकि लोग इतनी संख्या में मौजूद थे और सभी आपको छूना चाहते थे. आपको देखना चाहते थे. आपको हार पहनाना चाहते थे. आपकी तस्वीरें उतारना चाहते थे.

भारतीय टीम की जय-जयकार हो रही थी. ये तो ऐसा अनुभव है, जो जीवन में एक बार ही होता है. उसके बाद तो समारोह का सिलसिला शुरू हो गया.

प्रधानमंत्री ने बुलाया, राष्ट्रपति भवन में समारोह हुए. अहमदाबाद में एक समारोह था. मुंबई के वानखेड़े स्टेडियम में हुए कार्यक्रम में तो 50 हज़ार लोगों ने हिस्सा लिया.

एक समय तो स्थिति ऐसी आ गई कि हमारे पास वक़्त कम होता था और कार्यक्रम ज़्यादा थे.

महत्वपूर्ण घटना

मेरा मानना है कि भारत में क्रिकेट की प्रति बढ़ती लोकप्रियता और लगातार बढ़ते जुनून में 1983 का विश्व कप जीतना एक महत्वपूर्ण घटना थी.

भारत की जीत के बाद ऐसा था लॉर्ड्स में नज़ारा

क्योंकि उससे पहले भारतीय टीम ने कोई ख़ास अच्छा खेल नहीं दिखाया था. कभी हम एक मैच जीत जाते थे, तो कभी किसी टीम को हरा लेते थे.

लेकिन विश्व कप जीतने की बात को कभी किसी हिंदुस्तानी ने भी नहीं सोची थी. ज़ाहिर है जब अप्रत्याशित जीत मिली, तो उसकी प्रतिक्रिया काफ़ी ज़्यादा और सकारात्मक होती है.

टेलीविज़न भी पहले इतना बड़ा नहीं था. 1980 के दशक के बाद ही टेलीविज़न का दायरा भी बढ़ा. एक बार भारतीय टीम ने जब विश्व कप में जीत हासिल कर ली, तो प्रायोजक भी आगे आने लगे.

टीवी देखने वालों की संख्या बढ़ी. हालाँकि उन दिनों विज्ञापन में उतने पैसे नहीं थे. विज्ञापन भी उतने नहीं थे क्योंकि टेलीविज़न भी नया-नया ही शुरू हुआ था.

कुछ गिने-चुने खिलाड़ियों को भी विज्ञापन मिलते थे. मुझे भी विज्ञापन मिले थे. लेकिन आज के मुक़ाबले विज्ञापन भी नहीं थे और ना ही पैसा था.

टीवी चैनलये जुनून हमारी देन नहीं
दिबांग मानते हैं कि क्रिकेट का यह जुनून आज के मीडिया ने पैदा नहीं किया.
फ़िल्म लगानक्रिकेट और बॉलीवुड
बॉलीवुड ने क्रिकेट की लोकप्रियता को भुनाने की कई बार कोशिश की है.
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